भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सवादियोंका यह आरोप पाश्चात्त्य पूँजीवादियोंके लिये सही हो सकता है कि पैदावार समाजके हितार्थ नहीं होता, मुनाफा कमानेके लिये ही होता है, किंतु रामराज्यवादियोंके लिये यह आरोप सर्वथा निराधार ही है, क्योंकि रामराज्यवादीके मतमें तो बलवान्‌का बल शोषणके लिये नहीं रक्षणके लिये है। धनवान्‌का धन शोषणके लिये नहीं दानके लिये होता है। उत्पादनसे समाजको वस्तु मिलेगी। उत्पादकको लाभ भी मिल सकता है। आम्रका सिञ्चन भी हो जाय, पितरोंका तर्पण भी हो जाय—‘एकक्रिया द्व्यर्थकरी’का उदाहरण स्पष्ट है। मार्क्सवादियोंका यह कथन भी सही नहीं कि ‘आर्थिक शोषणके कारण ही संग्राम होते हैं।’ सदा अनेकों कारणोंसे संग्राम होते ही रहे हैं। जैसे समान लक्ष्य रहनेपर भी कम्युनिष्टोंमें पदाधिकार-लिप्सासे मारकाट होती रहती है, उसी तरह सार्वभौम बननेकी इच्छासे भी अनेको युद्ध हुए हैं। मनुष्योंमें ही क्या, पशु-पक्षियोंमें भी तो विभिन्न कारणोंको लेकर सघर्ष तथा युद्ध होते रहते हैं, कहीं सम्पत्तिके लिये, कहीं भूमिके लिये, कहीं कन्याके लिये, कभी धर्मके लिये, कभी मान-प्रतिष्ठा, इज्जत-आबरूके नामपर भी संग्राम हुए हैं। देवताओं-असुरोंका संग्राम कौरव-पाण्डवोंका संग्राम, राम-रावणका संग्राम केवल आर्थिक विषमताके लिये नहीं हुए। संसारमें प्रतिस्पर्धासे उन्नति होती है। आजकल भी अन्नोत्पादनमें, पशुपालनमें, तैरनेमें, उड़नेमें, चलनेमें—हरबातोंमें प्रतियोगिता चलती है। प्रतियोगिता उन्नति- का मूल है, एतदर्थ पुरस्कार भी वितरण किया जाता है। प्राणीका यह स्वभाव भी है कि लाभके लोभ और हानिके भयसे उत्प्रेरित होकर वह तन्मयतासे काम करता है, अतः उत्पादनमें होड़ होना अनुचित नहीं है। फिर भी रामराज्यकी नीतिका अनुवर्तन करनेसे आर्थिक असंतुलन नहीं हो सकता। धनका धर्मार्थ, यशोऽर्थ, अर्थार्थ, कामार्थ और स्वजनार्थ इस तरह पञ्चधा विभाग होनेमे आर्थिक असंतुलन अवश्य ही दूर हो सकता है। यज्ञादि प्रसङ्गसे भी अर्थका वितरण होनेसे आर्थिक असंतुलन दूर होता है। रामराज्यकी दृष्टिमें एक वर्ग दूसरे वर्गका पोषक होता है, शोषक नहीं। रामराज्यमे कोई भी दरिद्र, दुखी, अबुध और लक्षणहीन नहीं था— नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥ सब प्राणी परस्पर प्रेम करते थे, सब स्वधर्म निरत थे, और सब श्रुतिके अनुसार चलते थे— सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥ हाथी और शेर प्रेमसे साथ-साथ विहार करते थे— चरहिं एक सँग गज पंचानन। धन, विद्वान् और शक्तिमानोंका बाहुल्य होना राष्ट्रका भूषण है, दूषण नहीं। जब सभी समानरूपसे बलवान्, बुद्धिमान् एव समान क्रियावान् नहीं होते, तब सभीके