मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Page header] माक्र्सीय अर्थ-व्यवस्था ४२१
भाव आ ही जाता है । अफसर और मातहत लोगोंमें भी वही भावनाएँ चलती हैं । धर्म और ईश्वरपर विश्वास होनेसे ही प्राणी अत्याचार, पापाचार आदिसे- बचता है । अन्यथा शासकोंकी आँखमें धूल डालकर लोग मनमाना अनाचार, दुराचार कर सकते हैं । धर्म और ईश्वरकी कल्पना न होनेसे ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र परस्पर एक दूसरेसे जाल-फरेब करते हैं । धर्म और ईश्वरपर विश्वास होनेसे प्राणिमात्रमें परमेश्वरका अस्तित्व दिखायी देता है । सब प्राणी परमेश्वरकी संतान हैं (‘अमृतस्य पुत्राः’), फिर किससे विग्रह और किससे वैर ? यह भावना सिवा अध्यात्मवादके जडवादमें कभी पनप ही नहीं सकती । अध्यात्मवादमें ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का पाठ पढाया जाता है । जडवादमें तो थोड़ा-सा ही मतभेद होनेपर एक दूसरेको मौतके घाट उतार देनेकी बात सोची जाती है । रामराज्य ही महायन्त्रोंका निर्माण रोकना और उद्योग-धंधोंका विकेन्द्रीकरण करना चाहता है, परंतु कम्युनिज्ममें तो यन्त्रीकरणका विस्तार ही अभीष्ट है, फिर छोटे-छोटे कारीगरों या बैलों, ऊँटों, गधों आदिकी समस्या कम्युनिज्ममें कैसे हल होगी ? रामराज्य-परिषद्की दृष्टिमें आर्थिक असंतुलन दूर करनेकी पूर्ण योजना है ही । पूँजी और श्रम दोनोंही उत्पादनके मूल हैं । दोनोंकी उचित कदर की जायगी । विविध प्रकारके करों तथा आयात-निर्यातोंके सम्बन्धमें सदा ही समष्टि तथा व्यष्टिके हितोंका ध्यान रखा जाता है । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व—सभी आत्मोन्नतिके उपाय कर सकते हैं, परंतु समष्टिके परस्पर हितका सामञ्जस्य रखना उनका अनिवार्य कर्त्तव्य है । यह केवल कम्युनिस्टोंकी ही बात नहीं है, किसी भी शासनमें समूचा राष्ट्र ही एक कुटुम्ब माना जाता है । सर्वत्र राष्ट्रके उन्नायकों, नेताओं तथा प्रबन्धकोंकी योग्यता और ईमानदारीके अनुसार- ही उत्पादन एवं वितरणकी ठीक-ठीक व्यवस्था होती है । खपतके अनुरूप ही माल पैदा करनेका नियम रामराज्य-पद्धतिमें रहता है, क्योकि समष्टि-हितके अविरुद्ध ही व्यष्टिको प्रत्येक कार्य करनेकी स्वाधीनता मान्य है । शास्त्रों एवं तर्कोंसे किसीकी बपौती, मिल्कियत एवं गाढे पसीनेकी कमाई और दान या पुरस्कारमें पायी हुई सम्पत्तिका अपहरण करना अन्याय एव पाप है । अवश्य ही उत्पत्तिके पुराने साधनों एव पद्धतियोंमें रद्दोबदल होनेसे उत्पादनमें विस्तार हो जाता है । उत्पन्न वस्तुओंमें सस्तापन भी आता है, आमदनी- में भी वृद्धि हो जाती है । खपतके लिये बाजारोंकी आवश्यकता, माल भेजने, मँगानेके लिये एवं कारखानोंके लिये कोयले, पेट्रोल आदिके खानोंकी आवश्यकता, बाजारों एवं कोयले, पेट्रोल आदिके लिये संघर्ष और बेकारीकी समस्या आदि भी खडी हो जाती हैं । इसीलिये रामराज्यमें उद्योगोंका विकेन्द्रीकरण ही अभीष्ट