मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै । छोटे-छोटे व्यवसायोंद्वारा स्वावलम्बी ढंगसे बेकारी दूर करके व्यापक- रूपसे रोजगारोंकी व्यवस्था की जाती है। कम्युनिष्ट यद्यपि बड़ी-बड़ी पुस्तकोंमें कल- कारखानोंके द्वारा गरीबोंके रोजगार छिन जानेकी चीख-पुकार मचाते हैं, परंतु उन्हीं कल-कारखानोंका वे समर्थन भी करते हैं। इतना ही क्यो, वे कल-कारखानों- के विस्तारसे ही लाखोंकी संख्यामें मजदूरोका एकत्रित एवं संगठित हो सकना और मजदूर-आन्दोलनोके द्वारा कम्युनिष्टराज्य-स्थापनाका भी स्वप्न देखते हैं। ईश्वर एव धर्मकी भावना दृढ़ होनेसे वैभव एवं सम्पत्तिवाले अपनी सम्पत्तिका सदुपयोग राष्ट्रके पोषण तथा जीवन-स्तर उन्नत करनेमें करेंगे। बेकारी दूर करनेके काममें उनकी सम्पत्ति उपयुक्त होगी । इसीलिये प्राचीनकालमे आजकी अपेक्षा कहीं अधिक सम्पत्ति, शक्ति, बल, विद्या और दक्षताके रहनेपर भी असंतुलित विषमता, बेकारी, कलह आदि नहीं थे। ईश्वर एवं धर्मकी भावना घटनेसे ही मात्स्य न्याय, परस्पर भक्ष्य-भक्षकभाव, शोषक-शोषितभाव बढ़ता है और उसे ही मार्क्सवादी गुण मानते हैं। वर्ग-कलह, वर्ग-विद्वेष तथा वर्ग-विध्वंस ही जिस संस्थाके सिद्धान्त एव आधार हों, वे ही जिसके जीवन एव उन्नतिके एक- मात्र साधन हों, उससे विश्वशान्ति एवं विश्वमें समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ताकी स्थापनाकी आशा करना व्यर्थ ही है । उत्पादन-विस्तारसे इस तरह कुछ भौतिक परिवर्तन होनेपर भी धर्म, दर्शन एव राजनीतिक-नियमों, स्वत्वोंमें रद्दोबदलका कोई प्रसङ्ग नहीं होता । अमेरिका आदिकोंमें बिना मौलिक रद्दोबदलके भी काम चलता ही है। आर्थिक दशा सामाजिक, धार्मिक नियमोंका नींव ही नही है, जिससे कि आर्थिक दशामें परिवर्तन होनेसे सामाजिक, धार्मिक नियमरूपी भवन ढह पड़े और उनमें रद्दोबदल करना आवश्यक हो । जो यह कहा जाता है कि 'जिन लोगोंने उत्पादन-साधनोंमें रद्दोबदल कर लिया, उन्हे उत्पन्न हुई वस्तुओंके वितरण- सम्बन्धी नियमोंमें भी परिवर्तन कर लेनेका अधिकार मानना न्यायसङ्गत है। अतः पुत्र-पौत्र आदिका पिता-पितामहकी सम्पत्तिपर दायभूतसे बपौती-सम्पत्तिके रूपमें अधिकार माननेके नियममे भी हेरफेर करके तथा सभी स्वत्व-सम्बन्धी पुराने नियमोंमें परिवर्तन करके समाजीकरण या राष्ट्रीयकरणका सिद्धान्त माना जाना ठीक ही है।' परंतु यह बात विचारणीय है कि उत्पादन-साधनोंमें परिवर्तन करनेका मुख्य श्रेय किसको है ? क्या साधारण मजदूर-समुदायको ? नही, मानना पड़ेगा कि इसका पहला श्रेय बडे वैज्ञानिको एव अन्वेषकोको है । फिर ऐसे भी बहुतसे शाश्वत नियम हैं, जिनमें परिवर्तन असम्भव है। ऐसी दशामें यह सब कथन भी निस्सार है। इसपर विस्तृत विचार आगेके ४२८ से ४३२ पृष्ठोंपर देखना चाहिये।