भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 738

ऐतिहासिक भौतिकवाद ४२५ याज्ञवल्क्यादि धर्मशास्त्र, औशनस बार्हस्पत्यादि अर्थशास्त्र-ये सभी कौटल्यके अनुसार इतिहास हैं । शुक्रके मतानुसार किसी राजचरित्र वर्णनके व्याजसे प्राचीन घटनाओं- का वर्णन ही इतिहास है— 'प्राग्वृत्तकथनं चैकराजकृत्यमिषादितः । यस्मिन् स इतिहासः स्यात् पुरावृत्त. स एव हि ॥' (शुक्र नी० ४।२९३) इतिहासके साथ पुराणोंका भी सम्बन्ध अनिवार्य है; क्योंकि पुराणमें सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रजापतियोंके बादकी सृष्टि), वंश (कुल), मन्वन्तर (प्रत्येक मनुके अधिकारका समय), वंश्यानुचरित (कुलवृत्त) का वर्णन विशेषरूपसे होता है। इतिहास केवल घटनाओंका वर्णन मात्र हो तब तो केवल गड़े मुर्दोंके उखाड़नेके अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाता, अतः उसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षोपदेश आवश्यक है । इस तरहका कथायुक्त वृत्त ही इतिहास है— धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् । पूर्ववृत्तं कथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ॥ (का० मीमां० म० टी० १।२) धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षके उपदेशोंसे समन्वित कथायुक्त पूर्ववृत्तका वर्णन ही इतिहास है । मानवजातिकी प्रगति ऐतिहासिक क्रमसे इसी ओर होती रही है । इतिहासकी मार्क्सीय व्याख्या मार्क्सके अनुसार 'इतिहास छः युगोंमें विभक्त है । प्रथम युगमें अति प्राचीन मनुष्य साम्यवादी संघोंमें रहता था । उस समय उत्पादन, वितरण आदि समाजवादी ढंगसे होता था । दूसरा युग दासताका है । कृषि-प्रथा गोपालनके फलस्वरूप व्यक्तिगत सम्पत्तिका जन्म हुआ । सम्पत्तिके स्वामियोंने अन्य सम्पत्ति- रहित लोगोंको अपना दास बनाया । राज्य एवं तत्सम्बन्धी अन्य संस्थाओंका जन्म हुआ । तीसरा सामन्तशाही युग हुआ, इसमें सामन्त भूमिके स्वामी होते थे । गरीब किसान इन सामन्तोंके अधीन रहते थे, पर दास नहीं । चौथा युग आधुनिक पूँजीवादी युग है । इस युगका प्रादुर्भाव व्यवसायों एवं कारखानोंके फलस्वरूप हुआ है । इसमें अर्थ, समाज एवं राज्यके स्वामी पूँजीपति होते हैं । श्रमिक अपना जीवन-निर्वाह श्रमके द्वारा करते हैं। पाँचवाँ युग सर्वहाराके अधिनायकत्वका होगा । इसमें अर्थ, समाज एवं राज्यकी बागडोर श्रमिकोंके हाथमें होगी । यह समाजवादी एवं शोषणरहित युग होगा । इसके बाद मानव-जाति छठे युगमें प्रवेश करेगी । उसमें राज्यविहीन समाज होगा । वास्तविक स्वतन्त्रता तभी होगी, यह सुवर्णयुग होगा ।' मार्क्सका अति प्राचीन युग रूसोकी प्राकृतिक स्थितिके समान है । रूसो- की भाँति ही मार्क्सके मतमें भी व्यक्तिगत सम्पत्ति सभ्यताकी धात्री है । मार्क्सका आधुनिक पूँजीवादी युगका चित्रण रूसो-जैसा ही है । रूसोका 'आदर्श प्रत्यक्ष जन- तन्त्र' और 'सामान्येच्छाके सिद्धान्त'की तुलना मार्क्सके 'साम्यवाद' से की जा सकती है। जैसे रूसोकी सामान्येच्छाद्वारा एक नयी स्वतन्त्रता सम्भव होती है, वैसे ही मार्क्सके