मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२४ मार्क्सवाद और रामराज्य हीगेलके अनुसार 'इतिहास ईश्वरकी आत्मकथा है। वह मनुष्योंको अपनी रुचि- के अनुसार कार्य करने देता है। उनका फल वही होता है, जो ईश्वर चाहता है।' इंग्लैण्ड- के डिल्टन मेरका मत है कि 'संसार अज्ञातरूपसे, पर बड़े कष्टपूर्वक ईश्वरकी ओर बढ़ रहा है—मेरे लिये इतिहासका यही अर्थ है।' यह भी एक पक्ष है कि इतिहास- में निष्पक्षता हो ही नहीं सकती । लेखक जिस देशकालमें रहता है, उसका प्रभाव उसपर अवश्य होता है । अतः वह अतीतको भी वर्तमानके चश्मेसे देखता है। जर्मन इतिहासज्ञों- का कहना है कि 'जर्मनीके जंगलो, पहाड़ों, नदियो तथा जर्मन वीर-गाथाओंका गौरव- पूर्ण वर्णन ही इतिहास है।' एक इटालियनका कहना है—'यदि प्राचीन इतिहासके अध्ययनसे हममें उत्साह नहीं बढ़ता तो फिर गड़े मुर्दे खोदनेकी क्या आवश्यकता ?' कुछ लोगोंका मत है कि इतिहास अपनेको दोहराता रहता है । दूसरे कहते हैं— 'प्राचीन घटनाओंकी पुनरावृत्ति असम्भव है।' कुछ लोग 'विशिष्ट ऐतिहासिक व्यक्तियोंका विस्तृत वर्णन ही इतिहास' समझते हैं । कुछ लोग छोटी-से-छोटी घटनाओंका भी इतिहासपर प्रभाव मानते हैं । मेरके अनुसार सार्वजनिक घटनाओं- का क्रम-बद्ध वर्णन ही इतिहास है । प्रो० हॉर्नशॉकी रायमें विश्व-घटनाओंकी गति या उसके कुछ अंशका वर्णन इतिहास है। लार्ड ऐक्टनका कहना है कि विश्व- का इतिहास राष्ट्रोंके इतिहासका संग्रह नहीं, किंतु वह लगातार विकास है। वह स्मरण-शक्तिके लिये भार न होकर आत्माके लिये प्रकाश है। 'स्टडी आफ हिस्ट्री' के अनुसार 'इतिहासका आधार राष्ट्र नहीं हो सकता । अपने राष्ट्रको ही विश्व मान लेना भूल है। वह तो विश्वका अङ्गमात्र है, इसी दृष्टिसे उसका इतिहास लिखा जाना चाहिये।' मिस्टर वेल्सके अनुसार मानव जाति ही राष्ट्र है। इस तरह इतिहासके सम्बन्धमें अनेक प्रकारकी धारणा होनेपर भी इतिहासका उद्देश्य सत्यकी खोज अवश्य होना चाहिये। इससे भिन्न उद्देश्य होनेपर घटनाओं- की खींचा-तानी तोड़-मरोड़ अवश्य करनी पड़ेगी । 'आई फाउण्ड नो पीस' के लेखक मिस्टर वेन मिलरका कहना है कि आँखों देखी घटना भी ठीक नहीं बतायी जा सकती । दो आदमी उसे भिन्नरूपसे देखते हैं । प्रत्येक व्यक्तिकी कल्पना अलग ही चलती है। पत्रों, सरकारी लेखोंमे भी भाव बदले जाते हैं। फिर हजारों वर्ष पुराने इतिहासका वर्णन सत्य कैसे हो सकता है ?' वस्तुतः इसीलिये रामायण, महाभारत आदि आर्ष इतिहासके लेखक वाल्मीकि, व्यास आदि ऋषि प्रत्यक्षा- नुमान या संवाददाताओंके तारों, पत्रोंके आधारपर नहीं, किंतु समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञाके अनुसार घटनाओंको पूर्णतया जानकर ही इतिहास लिखनेमें संलग्न हुए थे। वैदिकोंके यहाँ वेदार्थ जाननेमें इतिहास-पुराणका अत्यन्त उपयोग है—'इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्', पुराणमितिवृत्तमाख्यायिको- दाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रञ्चेतीतिहासः । (कौ० अर्थ० १ । ५ । १४) ब्रह्मादिपुराण, रामायण महाभारतादि इतिहास, वृहतकथादिआख्यायिका, मीमांसादि उदाहरण, मनु