भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

४२४ मार्क्सवाद और रामराज्य हीगेलके अनुसार 'इतिहास ईश्वरकी आत्मकथा है। वह मनुष्योंको अपनी रुचि- के अनुसार कार्य करने देता है। उनका फल वही होता है, जो ईश्वर चाहता है।' इंग्लैण्ड- के डिल्टन मेरका मत है कि 'संसार अज्ञातरूपसे, पर बड़े कष्टपूर्वक ईश्वरकी ओर बढ़ रहा है—मेरे लिये इतिहासका यही अर्थ है।' यह भी एक पक्ष है कि इतिहास- में निष्पक्षता हो ही नहीं सकती । लेखक जिस देशकालमें रहता है, उसका प्रभाव उसपर अवश्य होता है । अतः वह अतीतको भी वर्तमानके चश्मेसे देखता है। जर्मन इतिहासज्ञों- का कहना है कि 'जर्मनीके जंगलो, पहाड़ों, नदियो तथा जर्मन वीर-गाथाओंका गौरव- पूर्ण वर्णन ही इतिहास है।' एक इटालियनका कहना है—'यदि प्राचीन इतिहासके अध्ययनसे हममें उत्साह नहीं बढ़ता तो फिर गड़े मुर्दे खोदनेकी क्या आवश्यकता ?' कुछ लोगोंका मत है कि इतिहास अपनेको दोहराता रहता है । दूसरे कहते हैं— 'प्राचीन घटनाओंकी पुनरावृत्ति असम्भव है।' कुछ लोग 'विशिष्ट ऐतिहासिक व्यक्तियोंका विस्तृत वर्णन ही इतिहास' समझते हैं । कुछ लोग छोटी-से-छोटी घटनाओंका भी इतिहासपर प्रभाव मानते हैं । मेरके अनुसार सार्वजनिक घटनाओं- का क्रम-बद्ध वर्णन ही इतिहास है । प्रो० हॉर्नशॉकी रायमें विश्व-घटनाओंकी गति या उसके कुछ अंशका वर्णन इतिहास है। लार्ड ऐक्टनका कहना है कि विश्व- का इतिहास राष्ट्रोंके इतिहासका संग्रह नहीं, किंतु वह लगातार विकास है। वह स्मरण-शक्तिके लिये भार न होकर आत्माके लिये प्रकाश है। 'स्टडी आफ हिस्ट्री' के अनुसार 'इतिहासका आधार राष्ट्र नहीं हो सकता । अपने राष्ट्रको ही विश्व मान लेना भूल है। वह तो विश्वका अङ्गमात्र है, इसी दृष्टिसे उसका इतिहास लिखा जाना चाहिये।' मिस्टर वेल्सके अनुसार मानव जाति ही राष्ट्र है। इस तरह इतिहासके सम्बन्धमें अनेक प्रकारकी धारणा होनेपर भी इतिहासका उद्देश्य सत्यकी खोज अवश्य होना चाहिये। इससे भिन्न उद्देश्य होनेपर घटनाओं- की खींचा-तानी तोड़-मरोड़ अवश्य करनी पड़ेगी । 'आई फाउण्ड नो पीस' के लेखक मिस्टर वेन मिलरका कहना है कि आँखों देखी घटना भी ठीक नहीं बतायी जा सकती । दो आदमी उसे भिन्नरूपसे देखते हैं । प्रत्येक व्यक्तिकी कल्पना अलग ही चलती है। पत्रों, सरकारी लेखोंमे भी भाव बदले जाते हैं। फिर हजारों वर्ष पुराने इतिहासका वर्णन सत्य कैसे हो सकता है ?' वस्तुतः इसीलिये रामायण, महाभारत आदि आर्ष इतिहासके लेखक वाल्मीकि, व्यास आदि ऋषि प्रत्यक्षा- नुमान या संवाददाताओंके तारों, पत्रोंके आधारपर नहीं, किंतु समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञाके अनुसार घटनाओंको पूर्णतया जानकर ही इतिहास लिखनेमें संलग्न हुए थे। वैदिकोंके यहाँ वेदार्थ जाननेमें इतिहास-पुराणका अत्यन्त उपयोग है—'इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्', पुराणमितिवृत्तमाख्यायिको- दाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रञ्चेतीतिहासः । (कौ० अर्थ० १ । ५ । १४) ब्रह्मादिपुराण, रामायण महाभारतादि इतिहास, वृहतकथादिआख्यायिका, मीमांसादि उदाहरण, मनु

ऐतिहासिक भौतिकवाद ४२५ याज्ञवल्क्यादि धर्मशास्त्र, औशनस बार्हस्पत्यादि अर्थशास्त्र-ये सभी कौटल्यके अनुसार इतिहास हैं । शुक्रके मतानुसार किसी राजचरित्र वर्णनके व्याजसे प्राचीन घटनाओं- का वर्णन ही इतिहास है— 'प्राग्वृत्तकथनं चैकराजकृत्यमिषादितः । यस्मिन् स इतिहासः स्यात् पुरावृत्त. स एव हि ॥' (शुक्र नी० ४।२९३) इतिहासके साथ पुराणोंका भी सम्बन्ध अनिवार्य है; क्योंकि पुराणमें सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रजापतियोंके बादकी सृष्टि), वंश (कुल), मन्वन्तर (प्रत्येक मनुके अधिकारका समय), वंश्यानुचरित (कुलवृत्त) का वर्णन विशेषरूपसे होता है। इतिहास केवल घटनाओंका वर्णन मात्र हो तब तो केवल गड़े मुर्दोंके उखाड़नेके अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाता, अतः उसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षोपदेश आवश्यक है । इस तरहका कथायुक्त वृत्त ही इतिहास है— धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् । पूर्ववृत्तं कथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ॥ (का० मीमां० म० टी० १।२) धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षके उपदेशोंसे समन्वित कथायुक्त पूर्ववृत्तका वर्णन ही इतिहास है । मानवजातिकी प्रगति ऐतिहासिक क्रमसे इसी ओर होती रही है । इतिहासकी मार्क्सीय व्याख्या मार्क्सके अनुसार 'इतिहास छः युगोंमें विभक्त है । प्रथम युगमें अति प्राचीन मनुष्य साम्यवादी संघोंमें रहता था । उस समय उत्पादन, वितरण आदि समाजवादी ढंगसे होता था । दूसरा युग दासताका है । कृषि-प्रथा गोपालनके फलस्वरूप व्यक्तिगत सम्पत्तिका जन्म हुआ । सम्पत्तिके स्वामियोंने अन्य सम्पत्ति- रहित लोगोंको अपना दास बनाया । राज्य एवं तत्सम्बन्धी अन्य संस्थाओंका जन्म हुआ । तीसरा सामन्तशाही युग हुआ, इसमें सामन्त भूमिके स्वामी होते थे । गरीब किसान इन सामन्तोंके अधीन रहते थे, पर दास नहीं । चौथा युग आधुनिक पूँजीवादी युग है । इस युगका प्रादुर्भाव व्यवसायों एवं कारखानोंके फलस्वरूप हुआ है । इसमें अर्थ, समाज एवं राज्यके स्वामी पूँजीपति होते हैं । श्रमिक अपना जीवन-निर्वाह श्रमके द्वारा करते हैं। पाँचवाँ युग सर्वहाराके अधिनायकत्वका होगा । इसमें अर्थ, समाज एवं राज्यकी बागडोर श्रमिकोंके हाथमें होगी । यह समाजवादी एवं शोषणरहित युग होगा । इसके बाद मानव-जाति छठे युगमें प्रवेश करेगी । उसमें राज्यविहीन समाज होगा । वास्तविक स्वतन्त्रता तभी होगी, यह सुवर्णयुग होगा ।' मार्क्सका अति प्राचीन युग रूसोकी प्राकृतिक स्थितिके समान है । रूसो- की भाँति ही मार्क्सके मतमें भी व्यक्तिगत सम्पत्ति सभ्यताकी धात्री है । मार्क्सका आधुनिक पूँजीवादी युगका चित्रण रूसो-जैसा ही है । रूसोका 'आदर्श प्रत्यक्ष जन- तन्त्र' और 'सामान्येच्छाके सिद्धान्त'की तुलना मार्क्सके 'साम्यवाद' से की जा सकती है। जैसे रूसोकी सामान्येच्छाद्वारा एक नयी स्वतन्त्रता सम्भव होती है, वैसे ही मार्क्सके

४२६ मार्क्सवाद और रामराज्य

क्रान्ति और सर्वहाराके अधिनायकत्वमें एक नयी साम्यवादी व्यवस्थाका जन्म होगा। रूसोकी यह स्वतन्त्रता प्राचीन प्राकृतिक स्थितिके स्वतन्त्रतासे भिन्न थी। वैसे ही मार्क्सका साम्यवाद भी अति प्राचीन साम्यवादसे भिन्न है। भेद इतना ही है कि रूसो आदर्शवादी था और मार्क्स भौतिकवादी। मार्क्सके अनुसार 'मानव-इतिहास वर्ग संघर्षका इतिहास है। यह संघर्ष युगानुरूप होता है। कभी प्रत्यक्ष, कभी अप्रत्यक्ष भी रहा है। कभी विजेताद्वारा नये समाजका निर्माण हुआ, तो कभी दोनों वर्गोंका विध्वंस हुआ है। सर्वहाराकी क्रान्तिद्वारा ही इस वर्ग-संघर्षका अन्त होगा; क्योंकि इसके द्वारा वर्गका अन्त होकर एक वर्गविहीन समाज बनेगा।' आधुनिक लोगोंकी दुनिया ही छः हजार वर्षकी है। इसके ही भीतर इन्हें अनेकों युगोंकी कल्पना करनी पड़ती है। परंतु भारतीय महर्षियोंकी दृष्टिसे वर्तमान सृष्टि ही दो अरब वर्षकी मानी जाती है। आधुनिक वैज्ञानिक भी अब सृष्टिकी प्राचीनताकी ओर बढ रहे हैं। इस दृष्टिसे धर्म-राज्य राम-राज्य और सोपद्रव, क्षुद्रराज्य—तीन ही प्रकारका युग प्रतीत होता है। मार्क्सके छः युग सोपद्रव क्षुद्रराज्यके भीतर ही हैं। अनेक दार्शनिक हाब्सके प्राकृतिक खूँखार मानव एवं उसके द्वारा अनु- बन्धपूर्वक 'दीर्घकाय'को सर्वाधिकार समर्पण आदि-जैसे ही मार्क्सके ऐतिहासिक वर्णनको भी अप्रामाणिक समझते हैं। अतीत घटनाओंके सम्बन्धमें प्रत्यक्षकी प्रवृत्ति हो ही नहीं सकती, अतः अनुमान या आगमद्वारा ही उस सम्बन्धमें कुछ जानकारी हो सकती है। आगमोंपर मार्क्सका विश्वास नहीं था। अपुष्ट कारणोंके आधारपर इतिहासके सम्बन्धमें अटकल लगाकर किसीने तीन, किसीने पाँच तो किसीने छः युगकी कल्पना कर डाली। ये कल्पनाएँ निराधार हैं। रूसोकी प्राकृतिक स्थितिमें स्वर्णयुग ही था, उसी प्रकार मार्क्सकी भी अति प्राचीन मनुष्योंकी साम्यवादी संघकी स्थिति थी। फिर उसका अन्त क्यों हुआ ? जिस तरह उसका अन्त हुआ उसी तरह मार्क्ससम्मत सर्वहाराके डिक्टेटरशिपमें होनेवाली क्रान्ति- द्वारा वर्गहीन राज्यका भी अन्त क्यो न होगा ? हीगेलके अनुसार कोई भी संवाद अन्तमें वाद बन जाता है; क्योंकि कुछ-न-कुछ लोग उस संवादके भी विरोधी रहते ही हैं। उन्हींका समुदाय उस संवादका प्रतिवादी बन जाता है। जब अति प्राचीन साम्यवादी संघवादी बन सका तो अन्तिम वर्गविहीन समाज क्या स्थायी- रूपसे हो सकेगा ? और उसका विरोधी कोई न होगा ? फिर हिगेलका आदर्श राज्य भी द्वन्द्वमानके अनुसार अन्तिम ही है। इसमे भी सिवा अन्धविश्वासके और क्या प्रमाण है ? फिर यह भी तो कहा जा सकता है कि जैसे रूसोकी सामान्ये- च्छाद्वारा प्राप्त स्वतन्त्रताका स्वप्न पूरा नहीं हुआ, उसी तरह मार्क्सके भी वर्गविहीन राज्यका स्वप्न पूरा होनेवाला नहीं। धर्मनियन्त्रित शासन-तन्त्रवादीके यहाँ ह्रास-

विकासका चक्र चलता रहता है । अतः कृतयुगमें धर्म-राज्य एवं दण्ड आदिसे विहीन धर्मनियन्त्रित राज्य था और वह स्वर्णयुग था—यह आर्ष इतिहासोंसे विदित है । पुनश्च रजोगुण-तमोगुणके विस्तारसे उसमें गड़बड़ी हुई । फिर धर्म- नियन्त्रित राज-तन्त्र हुआ, तमोगुण बढनेसे फिर और विविध विवादमय राज्य हुए । पुनश्च 'चक्रनेमिक्रमेण' धर्मनियन्त्रित लोकतन्त्र, धर्मनियन्त्रित राजतन्त्र एवं पुनः शुद्ध राजादि विहीन धर्मनियन्त्रित राज्य हो सकता है । जैसे प्रतिवर्ष वसन्त, ग्रीष्म आदि ऋतुओंका प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही यह भी सम्भव है। मार्क्सका 'वर्ग-संघर्ष' कोई वास्तविक तथ्य नहीं है । यह तो एक विकार है । मात्स्य- न्यायका फैलना धर्म-नियन्त्रण घटनेपर ही बढ़ता है । धर्म-नियन्त्रण बढ़नेपर घट जाता है । यो तो प्रत्येकव्यक्तिके भीतर देवासुर-संग्राम चलता ही रहता है। रजोगुण, तमोगुणके अनुकूल वृत्तियाँ, चेष्टाएँ, भावनाएँ तथा उनसे युक्त व्यक्ति, समुदाय, आसुर समुदाय है । सत्त्वगुणके अनुकूल वृत्तियाँ, भावनाएँ, चेष्टाएँ तथा उनसे युक्त व्यक्ति, समुदाय दैवी समुदाय है । इनका संघर्ष सदा ही चलता है, परंतु कभी व्यक्त कभी अव्यक्त । भीतरका ही संघर्ष कभी-कभी बाह्यरूप धारण कर लेता है । कभी कोई पक्ष जीत जाता है तो कभी कोई पक्ष । तमोगुणपर सत्त्वगुणकी विजय ही अनृतपर सत्यकी, दानवतापर मानवताकी, आसुर-शक्तिपर दैवीशक्तिकी विजय है । यही जडवादीपर अध्यात्मवादीकी विजय है । यही व्यष्टिवादपर समष्टि- वादकी, संकीर्णतापर उदारताकी जीत है । आदर्शवादी दार्शनिक हाब्स आदिके प्राकृतिक मनुष्य और अनुबन्धद्वारा राज्य-कल्पनाको अप्रामाणिकएव अनैतिहासिक कहते हैं । ठीक इसी तरह अति प्राचीन साम्यवादी समाज और वर्ग-भेद आदिकी मार्क्सय कल्पना भी अप्रामाणिक एवं अनैतिहासिक ही है ।

भौतिकवादी व्याख्या

कहा जाता है कि हीगेलके ऐतिहासिक आदर्शवादके मुकाबलेमें ही मार्क्सने अपनी प्रणालीका नाम 'ऐतिहासिक भौतिकवाद' रखा था । इस प्रणालीद्वारा मार्क्स विभिन्न परिवर्तनों, क्रान्तियो एव मानसिक, सामाजिक घटनाओंको उत्पन्न करनेवाले मूलस्रोतोंका पता लगाना चाहता था, इसलिये इतिहास सञ्चालन करनेवाले नियमोंका उसने पता लगाया । उसका कहना था—'मनुष्योंके विवेक एव विचारोंमें परिवर्तन करने- वाली तथा विभिन्न सामाजिक प्रणालियों और पारस्परिक विरोधकी सृष्टि करनेवाली प्रधानशक्ति, विचारो, भावनाओं या विश्वव्यापी ज्ञानसे अथवा सर्वव्यापी आत्माके ज्ञानसे नहीं हुआ, किंतु वह जीवनकी भौतिक अवस्था एवं नियमोंद्वारा ही हुआ है । इसलिये मनुष्यजातिके इतिहासका आधार भौतिक है, अर्थात् जिस मार्गमे मनुष्य एक सामाजिक प्राणीकी हैसियतसे, प्राकृतिक परिस्थितियो, आन्तरिक, शारीरिक और मानसिक शक्तियोंकी सहायतासे अपने सासारिक या भौतिक जीवनका निर्माण

करता है और अपनी आवश्यकताओकी पूर्तिके लिये वस्तुओंको उत्पन्न करता, बाँटता और बदलता है, वही नियम, मार्ग या तरीका जीवनका भौतिक विषय या अवस्था है। पर यहाँ यह विचारणीय है कि यदि विभिन्न परिवर्तनों, क्रान्तियों, मानसिक- सामाजिक रचनाओको उत्पन्न करनेवाला कोई मूल स्रोत ढूँढना आवश्यक है और उसका कारण मार्क्सके मतानुसार भौतिक अवस्था और भौतिक नियम ही है, तो भौतिक अवस्था एवं भौतिक नियमोंका भी कारण क्या है—यह भी 'जिज्ञासा स्वाभाविक तथा अनिवार्य है। व्यावहारिक बात तो यह है कि विचारशील, विवेकी पुरुष ही जड भौतिक वस्तुओंमें रद्दोबदल करता रहता है; जड वस्तु स्वयं न अपनेको जान सकती है, न अन्यको ही। हिताहित सोचना, किसी उद्देश्यसे प्रवृत्त होना यह शुद्ध चेतनका ही धर्म है, अचेतनका नहीं। इसीलिये जैसे रेल, तार, रेडियो, वायुयान, विभिन्न शस्त्रास्त्र, कल-कारखाने, बड़े-बड़े बाँध, पुल, महान् दुर्ग—सब चेतनके विचार एवं इच्छाके ही परिणाम हैं, इसी प्रकार अन्यान्य आकाश, पृथिवी आदिकी उत्पत्ति एवं उसके नियम एवं अवस्थाओंमें भी अवश्य ही किसी सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् समष्टि चेतनकी इच्छा एवं विचारोंको कारण मानना अनिवार्य है । किसी भी विचारमे विचार्य कुछ भौतिक वस्तुएँ एवं उनकी अवस्थाएँ भी कारण हो सकती हैं । परंतु इसका अभिप्राय इतना ही है कि जैसे घटज्ञानमें विषयरूपसे घट भी हेतु है, परंतु इतने मात्रसे चक्षुमे घटका संनिकर्ष तथा मन या अन्तःकरणका चक्षुद्वारा घटाकार परिणत होना और चेतन आत्माद्वारा उन सबका प्रकाश होना गौण या मुख्य है—यह नहीं कहा जा सकता है। किंतु ज्ञानमें तो ज्ञाता ही मुख्य है, ज्ञेय एवं प्रमाण आदि ज्ञाताके अङ्ग होकर ही ज्ञानके साधन हैं। विवेकी ज्ञाता जीवनकी भौतिक अवस्थाओंमें रद्दोबदल करता ही रहता है । यद्यपि भौतिकवादी किसी भी सिद्धान्त, सत्य, न्याय, धार्मिक या सामाजिक नियमको शाश्वत या नित्य नहीं मानते, फिर भी अचेतन भूतोंमें अनेक शाश्वत नियम मानना अनिवार्य है, पृथ्वीका गन्धवत्त्व एवं विभिन्न बीजोंद्वारा विभिन्न प्रकारकी वस्तुओ- का उत्पन्न होना, विविध प्रकारके बीजोंसे विभिन्न पुष्प, स्तवक, कुड्मल, वृक्ष एवं विभिन्न रूप, रस, गन्धसे युक्त फलोंका उत्पन्न होना, जलका निम्न प्रदेशकी ओर बहना, अग्निका ऊर्ध्वमुख प्रज्वलन, वायु एवं आकाशके निश्चित धर्म शाश्वत ही हैं । समुद्रमें विभिन्न तिथियोंमें नियन्त्रित समयपर ज्वारभाटाका आना, चन्द्रमाका नियमित ह्रास-विकास कितना शाश्वत है—यह सुस्पष्ट है। जिस प्रकार भौतिक नियम शाश्वत हैं, वैसे ही ज्ञाता, चेतन एवं ईश्वरादिके नियम शाश्वत हैं, अतएव धार्मिक, सामाजिक एवं न्यायसम्बन्धी अपरिगणित धर्म भी शाश्वत है। ईश्वरीय नियम, धार्मिक सिद्धान्त, न्याय एवं सत्यके अनुसार विवेकी

ऐतिहासिक भौतिकवाद ४२९ प्राणी शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक परिस्थितियोंकी सहायतासे अपनी आवश्यकताओंकी पूर्तिके लिये वस्तुओंको उत्पन्न करता, बाँटता तथा रद्दोबदल भी करता है। परंतु जहाँ आध्यात्मिक धार्मिक दृष्टिसे तथा विवेकके विरुद्ध शारीरिक मानसिक तथा बाह्य भौतिक परिस्थितियाँ, परस्त्री, परधन-हरणके अनुकूल भली ही हों, तथापि एक विवेकी पुरुष उनका विरोध ही करता है। नदीके तीव्र प्रवाहमें पड़ा हुआ मुर्दा ही निर्विरोध धाराका अनुसरण करता है, परंतु जीवित प्राणी अवश्य ही विरोध करता है, प्रवाह चीरकर लक्ष्यकी ओर बढ़ता है। प्रवाहका किंचित् अनुसरण भी प्रवाह अतिक्रमणके ही अभिप्रायसे करता है। समुद्रमे नाव डालकर वायुके अनुसार भटकनेवाला प्राणी निरुद्देश्य ही होता है। जिसका कोई लक्ष्य होता है, वह विरुद्ध भीषण झंझावातका भी मुकाबला करके लक्ष्यकी ओर चढता है, यदि उसमें सर्वथा असमर्थ रहा तो उसी जगह लंगर डालकर नावको रोक देता है—'जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजै' का दुरुपयोग करनेवाले अवसरवादी सर्वथा अविश्वसनीय ही हुआ करते हैं। उत्पादन-शक्तियाँ और नियम कहा जाता है कि उत्पादन-शक्तियाँ दो प्रकारकी हैं-एक चेतन, दूसरी अचेतन। अचेतन शक्तियोंके अन्तर्गत भूमि, जल, वायु, कच्चा माल, औजार, मशीनें आदि आ जाती हैं। चेतन शक्तियोंमें मजदूर, आविष्कारक, अन्वेषक, इंजीनियर आदि आ जाते हैं। जातिगत गुणों अर्थात् किसी मनुष्य-समूहकी जन्मसिद्ध योग्यताका भी चेतन शक्तियोंमें अन्तर्भाव है। सबसे अधिक महत्त्व शारीरिक और मानसिक श्रम करनेवाले श्रम-जीवियोंका है। उनके द्वारा ही पूँजीवादी समाजमे विनिमय मूल्यकी सृष्टि होती है। दूसरा महत्त्व आधुनिक यन्त्रविद्याका है, जिसके कारण आज समाजमें उथल-पुथल हो रहा है। मार्क्सके मतानुसार 'मनुष्य उत्पादक कार्य और उसकी आवश्यकताके प्रभावानुसार अपने समाज, राज्य, धर्म-दर्शन और विधानसम्बन्धी सिद्धान्तोंकी रचना करता है। भौतिक, आर्थिक अवस्था इसकी आधार-भित्ति स्वरूप है। उससे उत्पन्न होनेवाली धार्मिक राजनीतिक, दार्शनिक आदि प्रणालियाँ उसके ऊपर बने हुए भवनोंके समान होती हैं। ये भवन जितने अंशोंमें अपनी आधारभित्तिके अनुरूप होते हैं, उतने ही दृढ होते हैं, उतनी ही उन्नति और समृद्धि होती है। सामाजिक दशाओंके द्वारा सम्पत्ति सम्बन्धी नियम बनाये जाते हैं और मनुष्योंके उन पारस्परिक सम्बन्धोंका निर्णय किया जाता है, जिनसे उत्पत्तिका कार्य चलता है। उत्पादनके नियमोंका निर्णय समाजके मनुष्य ही करते हैं, जैसे और नियमोंका निर्णय समाजके मनुष्य ही करते हैं। जैसे मनुष्य प्राकृतिक सामग्री और शक्तियोंकी सहायतासे भाँति-भाँतिकी वस्तुओंका निर्माण करते हैं, उसी प्रकार मस्तिष्कपर उत्पादक शक्तियोंकी प्रतिक्रियाके फलस्वरूप सामाजिक, राजनीतिक

४३० मार्क्सवाद और रामराज्य और न्यायसम्बन्धी विधानों तथा धार्मिक, चारित्रिक, दार्शनिक सिद्धान्तोंका भी निर्णय वे ही करते हैं।' उत्पादक-उत्पादन-शक्तियो और उनके द्वारा होनेवाले परिणामोंपर विचार करते हुए यह कभी न भूलना चाहिये कि उच्चावच अनन्तानन्त सब भौतिक पदार्थ भोग्य हैं। वे अपने लिये नहीं, किंतु भोक्ताके लिये होते हैं। भोक्ता भोग्यके लिये नहीं होता, किंतु भोग्य भोक्ताके लिये होता है। पलंग अपने लिये नहीं, किंतु सोनेवाले भोक्ताके लिये होता है। करोड़ों रुपयोंकी माला, मालाके लिये नही, अपितु पहननेवालेके लिये होती है, अतएव पलंग यदि छोटी पड जाय तो पलंगमें सुधार होना चाहिये, न कि सोनेवालेको काट-पीटकर पलंगके लायक बनाना चाहिये । माला छोटी पड़ती है, सिरसे गलेमें नहीं उतरती, तो मालाको तोड़कर सुधारना ठीक है, पहननेवालेका सिर छीलकर मालाका गले उतारना बुद्धिमानी नही। ठीक इसी प्रकार भोक्ता नित्य, चेतन, आत्माके लौकिक पारलौकिक हित- की दृष्टिसे भौतिक वैभव एवं उनके रद्दोबदलका उपयोग किया जा सकता है, परंतु आत्माके लौकिक, पारलौकिक हितोंके विपरीत असर डालनेवाले भौतिक प्रभावोंको हर प्रकार रोकना ही उचित है। जैसे स्थूल देह सूक्ष्म मनके अधीन रहता है, वैसे ही देह, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सभी संहत आत्माके लिये होते हैं, वैसे ही देहादिसंघात स्वविलक्षण स्वप्रकाश असंहत आत्माके लिये हैं। रथादि अचेतनकी प्रवृत्ति सारथि चेतनसे अधिष्ठित होती है, वैसे ही जड देहादिकी प्रवृत्ति चेतन आत्मासे अधिष्ठित होती है। देहादि यदि आत्माके अधीन न हो तो भारभूत हो जाते हैं, इसी तरह अचेतन भौतिक सभी व्यवस्थाएँ भी समष्टि चेतन- नियन्त्रित रहकर ही सुख-साधक हो सकती हैं। आधुनिक वैज्ञानिक लोग जड प्रकृति- वशीकारके लिये प्रयत्नशील होते हैं। आधिभौतिक बड़ी-से-बड़ी उन्नति यदि आत्माके अनुकूल है, आत्माके नियन्त्रणमें है तभी उसका महत्त्व है, अन्यथा वह भार- भूत दुःखरूप ही है। इस तरह भौतिक अवस्थाके अनुसार चेतनके सब नियमोंमें रद्दोबदल अत्यन्त असंगत है, आंशिक रूपसे भौतिक अवस्थाओका उपयोग एवं अनुसरण मान्य है ही। फिर भी चेतनपर अचेतनका हावी हो जाना कथमपि उचित नहीं है, चेतन उत्पादक होनेसे एव भोक्ता भी होनेसे महत्त्वपूर्ण है, वह पूँजी एवं यन्त्र दोनोंपर ही अधिकारी होता है, अतः चेतनसे अचेतनकी तुलना ही नहीं हो सकती। फिर भी श्रमजीवीको श्रमका फल जैसे मिलना आवश्यक है, वैसे ही पूँजीपतिको पूँजीका फल भी मिलना आवश्यक है और यह कम्युनिष्टको भी मानना ही होगा, भले ही उसकी दृष्टिमें ही यह फल व्यक्तिको न मिलकर समाजको मिले। यहाँ रामराज्यके अनुसार आधुनिक शोषक पूँजीवाद या व्यक्तियोंका अधि- नायकवाद या निःस्वत्ववाद नहीं मान्य है, किंतु वह पूँजी सबको मान्य है, जिसके द्वारा यन्त्र एवं आविष्कारक, अन्वेषक एव श्रमजीवियोंका भी काम चला है।

आधुनिक रूपमें आजकल भी व्यक्ति बैंकोंमें रुपया जमा करता है और उसका सूद भी प्राप्त करता है । माली हालत या भौतिक अवस्था भले ही तत्सम्बन्धित नियमोंकी आधार- भित्ति हो, परन्तु 'दार्शनिक धार्मिक सभी नियमोंकी आधारभित्ति या नींव भी माली हालत ही है'—यह कहना सर्वथा असंगत है । भले पुरुष चाहे निष्किञ्चन हों या धनवान्; किंतु अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदिका आदर सभी करते हैं । प्राचीन कालमें जैसे अकिंचन ब्रह्मचर्यका, तपस्याका सम्भावन करते थे, वैसे ही एक सर्वसाधन- सम्पन्न सम्राट् भी सब त्यागकर ब्रह्मचर्य एवं त्याग-तपमें परिनिष्ठित होता था । आज भी भले लोग धनी हों या गरीब, धर्मका आदर करते हैं । बुरे चाहे धनी हों या गरीब, धर्मकी उपेक्षा करते हैं । देह-भिन्न आत्माका अस्तित्व तथा ईश्वर सदा, राजा, रङ्क, अमीर, गरीब सभी मानते हैं, फिर माली हालतमें रद्दोबदल होनेसे धर्म एवं दर्शनमें रद्दोबदल होना कहाँतक संगत है ? कथंचित् भावनाओंपर वातावरणका किंचित् प्रभाव पड सकता है, परन्तु तत्त्वज्ञान एवं वस्तुस्थितिसे सम्बन्ध रखनेवाले धर्म-दर्शनोंमें भी माली हालतके रद्दोबदल होनेसे रद्दोबदल मानना अत्यन्त मूर्खता है । लूट, खसूट, चोरी, हत्या, कभी भी धर्म बन जायेंगे, परोपकार, दया, सत्य, कभी अधर्म बन जायेंगे, तब तो कभी संखियाका अमृतरूपसे और अमृतका संखियारूपमें बदलना भी मान लिया जायगा । तत्त्वज्ञानकी व्यवस्था ही लीजिये—रज्जुमें रज्जुज्ञान ही यथार्थ ज्ञान है, रज्जुमें सर्प, धारा, माला आदिका ज्ञान सदा ही अयथार्थ रहेगा, चाहे माली हालतमें रद्दो-बदल हो, चाहे कितना ही भौतिक परिवर्तन हो, परंतु किसी भी हालतमें रज्जुमें रज्जुज्ञानकी अयथार्थता नहीं हो सकती । वस्तुतः मार्क्सवादी व्यक्तिगत भूमि सम्पत्ति, खानो, कल-कारखानोंपर राष्ट्रीयकरणके नामपर अधिकार करनेके लिये आदिपरम्पराप्राप्त शास्त्रीय नियमोंका अपलाप करके अपने कृत्योंका समर्थन करना चाहते हैं । परस्त्री, पर-धनका अपहरण, हत्या एवं जाल- धोखेको भी उचित या न्यायसिद्ध करनेके लिये यह वाग्जाल फैलाते हैं और कहते हैं कि ईश्वरीय या शास्त्रीय कोई भी सत्य न्याय अथवा धर्म नहीं है । माली हालत, भौतिक अवस्थाके अनुसार ही धर्म, सत्य, न्याय बनते हैं, अतः सभी नियमोंकी नींव माली हालत या भौतिक अवस्था ही है । इस दृष्टिसे वे कहते हैं कि 'पुरानी माली हालत या भौतिक अवस्था बदल गयी तो पुराने सब नियम धरा- शायी हो गये । इसलिये पुराने नियमोंके अनुसार जो पहले अधर्म था, वह अब अधर्म नहीं है । अतः हमलोगोंका पर-धन, पर-स्त्री-हरण, हत्या, जाल-फरेब आदि अधर्म या अन्याय नहीं है । जिन लोगोंने उत्पादन साधनों एवं उत्पादनोंमें रद्दोबदल कर लिया, उन्हें धर्म एवं न्यायमें भी रद्दोबदल कर लेनेका हक

४३२ मार्क्सवाद और रामराज्य है, उत्पन्न वस्तुओके वितरण-सम्बन्धी नियमोमे भी रद्दोबदल कर लेनेका हक है—ये सब बाते अपने पापको, अन्यायोंको पुण्य या न्यायसिद्ध करनेका असफल वागाडम्बरमात्र है, जिसमें कुछ भी दम नहीं है। कोई भी व्यसनी या अपराधी, अपनी प्रवृत्ति या रुचिके अनुसार ही अधार्मिक धार्मिक सामाजिक राज- नीतिक नियम चाह सकता है। मार्क्सका कहना है कि 'मनुष्य स्वयं अपने इतिहासका निर्माण करता है। वह यह कार्य अपनी इच्छाके अनुसार अभिलषित मार्गसे नहीं कर सकता, किंतु उसे उस मार्गके अनुसार कार्य करना पडता है, जो कि उसके सामने प्रस्तुत होता है और जिसे वह प्राप्त कर सकता है। उदाहरणार्थ अति प्राचीन युगमे थोड़े-थोड़े मनुष्य गिरोह बनाकर रहते थे, रक्त-सम्बन्धके आधारपर संघटित होते थे। उनके देवता भी उनकी परिस्थितिके अनुसार बनाये गये। इससे प्रकट होता है कि उस परिस्थितिका प्रभाव उन जंगली लोगोंकी मानसिक अवस्था, उनके मजहब, उनके चरित्र और उनके सामाजिक नियमोंपर कैसा पड़ता था। सर्पों, सिंहों आदिकी पूजा उस कालकी निशानी है। इसी तरह मध्यकालके क्षत्रिय सरदारों, जमींदारोंका आधार भूमि-सम्बन्धी अधिकार और शहरोंकी दस्तकारीपर था। उस परिस्थितिके अनुसार उन लोगोंके धार्मिक विचार बदल गये और नवीन मतोंकी स्थापना हुई, जो कि इस युगके अधिकार प्राप्त लोगोंके हितके अनुकूल थे। जो नैतिक, धार्मिक, दार्शनिक विचार इस हितके विरोधी थे, उन्हे दबा दिया गया। 'इसी प्रकार वर्तमान पूँजीवादी समाज व्यक्तिगत पूँजीके आधारपर रचा गया है और वह सामूहिक तथा सहयोगमूलक भावोके उच्छेदनाथं प्रयत्नशील है। यह स्वार्थसिद्धिके लिये व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका प्रचार करता है तथा श्रम- जीवियो और सम्पत्तिका एक स्थानपर संग्रह करता है, जमींदारी, जागीरदारीकी प्रथा और उसके समर्थक विश्वासों (राजाको ईश्वररूपमें मानना) को नष्ट करता है और उनके स्थानपर धार्मिक स्वतन्त्रता, व्यक्तिगत विवेकके सिद्धान्तका विस्तार करता है। यह समाज व्यक्तिगत अधिकारोंका प्रचार करता है, प्राचीन राजाओके एकतन्त्र शासनके विरुद्ध युद्ध करता है, राष्ट्रियताका भाव फैलाकर व्यापार व्यवसायका विस्तृत क्षेत्र प्राप्त करनेका प्रयत्न करता है तथा जमींदारी आदि- के विरोधार्थ ही वह एकतन्त्र सत्ताका समर्थन करता है। एकतन्त्र सत्ता भी जब पूँजीवादमें बाधक होती है, तब उसके विरुद्ध भी वह संग्राम करता है और एकतन्त्र शासनको नष्ट कर वैध राज्य-सत्ता या प्रजातन्त्रकी स्थापना करता है। यह सब काम इसलिये नहीं सम्पन्न किये जाते कि कोई विलक्षण बुद्धिमान् मनुष्य प्रवल विचार शक्तिद्वारा या नवीन ज्ञानोदयद्वारा या ईश्वरीय प्रेरणाद्वारा करता है,

ऐतिहासिक भौतिकवाद ४३३

किन्तु यह सब उस प्रभावसे सम्पन्न होता है, जो मनुष्यके भौतिक आधार या आर्थिक आधारके परिवर्तन होनेसे मनुष्योंके मस्तिष्कपर पड़ता है । मार्क्सका कहना है कि 'मनुष्यके अस्तित्वका आधार उसके विवेक या अन्तरात्माके आदेश- पर नहीं होता, किंतु अन्तरात्माका आधार उसकी सामाजिक स्थिति या दशापर होता है। कोई भी मनुष्य सामाजिक जीवनका निर्माण नहीं कर सकता और न उसके अनुकूल कानून ही बना सकता है। वह तो केवल एक नौकर या कार्य- कर्ताके समान होता है, जो समाजके भौतिक आधार या आर्थिक दशासे उत्पन्न होनेवाली प्रवृत्तियो और विचारधाराओका अनुसरण करता है । तथापि कार्यकर्ता व्यापक ज्ञानवान्, उद्योगी एव अधिक योग्य हो तो अपनी सीमाके भीतर महान् कार्य कर सकते हैं, की गयी उन्नतिको बहुत दूरतक बढ़ा सकते हैं । ईसा, मुहम्मद आदि इसी कोटिके थे ।' अवश्य भौतिक परिस्थितियाँ कभी-कभी प्राणीको अपने अनुसार चलनेके लिये बाध्य करती हैं, फिर भी लक्ष्य एव सिद्धान्तके अनुसार महापुरुष परिस्थितियों- को ही बदल देते हैं, परिस्थितियोके दास नहीं बनते, परिस्थितियोंके वशीभूत होकर भी अपना धर्म नहीं छोड़ते, भले प्राण छोड़ना पड़े तो प्राण छोड़ देते हैं । अति प्राचीन युगका मार्क्सय इतिहास भी सर्वथा अप्रामाणिक है । गिरोह बनाकर रहना' पहले भी अच्छा था, आज भी अच्छा है । रक्त-सम्बन्धसे विशिष्ट समूह आज भी होता ही है । 'परिस्थितिके अनुसार सर्प, सिंह आदिको देवता बनाने' की बात प्रलाप है । शास्त्रविश्वासी आज भी शेषनाग एवं नृसिंह भगवान्को परमे- श्वरके अवताररूपमे पूजते ही हैं । इसी तरह 'मध्यकालमे धार्मिक विचार बदल गये' यह कहना भी असगत है । अनादि अपौरुषेय शास्त्रोंका प्रामाण्य मानने- वालोंका जैसा विचार करोड़ों वर्ष पूर्व रामायणके रामराज्यमें था, हजारों वर्ष पूर्व महाभारतके युधिष्ठिर राज्यमें था, वैसा अब भी है । शास्त्रप्रमाण न माननेवाले जैसे आज हैं वैसे पहले भी थे । उनके मत सदा ही बदलते रहते हैं । शास्त्र अति प्राचीन कालके मालिकों, मध्य कालके सरदारों एव अर्वाचीन कालके पूँजीपतियोके बनाये नहीं हैं । वे आप्तकाम, पूर्णकाम, वीतराग, महातपा, अरण्य- वासी, कन्दमूलफलाशी, वल्कलवसनधारी महर्षियोंद्वारा रचे गये है, सो भी स्वतन्त्र- रूपसे नही, अपितु अनादि, अपौरुषेय, परमेश्वरीय वेदादि शास्त्रोंके आधारपर रचे गये हैं । उनकी व्यवस्थाओंमें आधुनिक ढुलमुल पन्थियोंकी अवसरवादिताका स्पर्श भी नहीं है । बायबिलमें भी कहा गया है कि सूईके छेदसे ऊँटका निकल जाना सम्भव है, पर धनिकोका स्वर्गीय राज्यमें प्रवेश करना कठिन है ।' इसी प्रकार न केवल भारतीय धर्मग्रन्थ अपितु ससारके सभी धर्मग्रन्थ वीतराग, अकिंचनो एव साधारण श्रेणीके लोगोंद्वारा बनाये गये हैं और उन मेधावियोंका कोई पक्षपात नहीं है । मनु यद्यपि सम्राट थे, फिर भी उन्होने अकिंचनोंका ही मा० रा० २८-

महत्त्व गाया है । यह कहना नितान्त मूर्खता है कि 'शास्त्रकार ऋषि धनिकोके एजेण्ट थे । उनके हितोंकी रक्षाके लिये ये लोग पाप-पुण्यके चक्करमे जनसाधारण- को फँसाये रखनेका प्रयत्न करते रहते थे।' भला, जो राजान्नग्रहणको घोर पाप समझते थे, 'कुसूल-धान्यक' ब्राह्मणकी अपेक्षा जो अश्वस्तनिक ( कलके लिये कुछ न रखनेवाले ) ब्राह्मणको ही श्रेष्ठ मानते थे, महात्यागको ही सर्वस्व मानते थे, वे किस प्रलोभनसे ऐसा निष्ठुर कर्म करते ? आज भी तो धनिकवर्ग नास्तिकप्राय है । वह किस भारतीय विद्वान्का सम्मान करता है ? यह वर्ग जितना उच्छृङ्खलो- की पूजा करता है, उतना आस्तिक पक्षकी प्रतिष्ठा करता तो आस्तिक पुरुषों एवं आस्तिक संस्थाओको आर्थिक संकटके कारण कार्य करनेमें बाधा क्यो पडती ? फिर भी शास्त्रविश्वासी शास्त्र, युक्ति एवं लोकसिद्ध न्यायके अनुसार उचित होनेसे व्यक्तिगत भूमि, सम्पत्ति आदिका समर्थन करते हैं । इसी तरह आस्तिकपक्ष- का राजाओंके एकतन्त्र शासनसे न विरोध है और न आधुनिक लोकतन्त्रके साथ कोई राग है। धर्म-नियन्त्रित एकतन्त्र-शासन भी लाभदायक होता है । धर्म- नियन्त्रित होनेसे ही लोकतन्त्र या प्रतिनिधितन्त्र लाभदायक हो सकता है । उच्छृङ्खल, धर्मशून्य, रावण, वेन आदिका एकतन्त्र भी हानिकारक हुआ था । वैसे उच्छृङ्खल लोकतन्त्र आजकल भी देशके लिये खतरनाक है । शास्त्रोंके अनुसार कोई भी कार्य विचारशील ईश्वर, महर्षियों, बुद्धिमान् व्यक्तियो अथवा व्यक्तिसमूहोकी गम्भीर विवेचनाओ एवं लोकहित भावनाओसे होता है । भले कामोंका मूल भले विचार, भली प्रेरणाएँ तथा सावधानी और बुरे कामोंके मूल कारण बुरे विचार, बुरी प्रेरणाएँ एवं प्रमाद आदि होते हैं । इस तरह सिद्ध है कि बुद्धिपूर्वक कार्यकारी पुरुष विचारपूर्वक ही कोई कार्य करता है। शास्त्र भी 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' ( ब्रह्मसूत्र १।१।५) इत्यादि सूत्रोसे कहते हैं कि जड प्रकृतिसे विलक्षण विश्वका निर्माण नहीं होता, क्योकि विलक्षण कार्य ईक्षण अर्थात् विचारपूर्वक होता है । जड प्रकृतिमें विचारशक्ति नहीं है । अतः वह विश्वसृष्टिका स्वतन्त्र कारण नहीं है । प्रत्यक्ष, अन्वय-व्यतिरेकसिद्ध चेतनोंके सावधानी एवं प्रमादके आधारपर होनेवाले कार्योंकी भलाई-बुराईका प्रत्यक्ष कार्यकारण-भाव छोड़कर अचेतन भौतिक अवस्थाओके अनुसार यन्त्रसंचालित ढंगसे घटनाओंका परिवर्तन मानना सर्वथा निराधार है । एक तरफ बुद्धिसङ्गत ईश्वर-प्रेरणा, शुभाशुभ कर्मरूप प्रारब्ध या दैवकी प्रेरणाको अन्धविश्वास बतलाना और दूसरी तरफ बुद्धिपूर्वक चेतनद्वारा होनेवाले कार्योंको यन्त्रसचालित ढगसे भौतिक अवस्थाओं या भौतिक ऐतिहासिक प्रभावोंका परिणाम मानना, यह कितनी उपहासास्पद वात है ? यदि चेतन प्राणी अपना, और समाजका लौकिक- पारलौकिक हिताहित सोच-विचारकर बुद्धिपूर्वक कार्य नहीं करता, किसी भौतिक

ऐतिहासिक भौतिकवाद ४३५ प्रवाहके परतन्त्र होकर ही कार्य करने एवं सोचनेको बाध्य होता है', तो फिर व्यक्तियों या समूहोंका गुण दोष क्यों माना जाय ? फिर तो कानूनोंके द्वारा किन्हीं गुणोंका विधान या निषेध भी क्यों होना चाहिये ? कोई भी विधान एवं निषेध स्वतन्त्रके लिये ही सम्भव होता है । लोहशृङ्खलासे निगडित हस्तपादादियुक्त व्यक्तिको जलादि लानेके लिये कौन बुद्धिमान् आदेश देगा ? ऐसे ही बलात् नियोजित कार्यसे किसीको कोई कैसे रोक सकता है, तथा विहिताकरण, निषिद्धा- नुष्ठानके लिये दण्ड एव शुभानुष्ठानके लिये पुरस्कारकी व्यवस्था कौन करेगा ? 'स्वतन्त्रः कर्त्ता' पाणिनिके इस सूत्रके अनुसार-'कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ' को ही कर्ता कहा जाता है। अश्वसे चलने, पाँवसे चलने या न चलनेमे जो स्वतन्त्र होता है, वही कर्ता होता है । उसीके लिये अश्वसे जाना चाहिये या पैरसे जाना चाहिये यह विधान तथा अश्वादिस न चलना चाहिये यह निषेध सार्थक होता है । उसीके लिये दण्ड एवं पुरस्कारकी व्यवस्था होती है । भूत, भौतिक अवस्था तथा उसका प्रवाह सब-के-सब जड ह । वे अपने-आपको नहीं जानते । समाजका हानि-लाभ सोच नहीं सकते । प्रेरणा भी कर नहीं सकते । फिर उनके आधारपर किन्हीं भी घटनाओं, प्रवृत्तियो या आन्दोलनोंको मानना कहाँतक उचित है ? प्रवाह प्रवाहीसे भिन्न नहीं होता । जैसे पिपीलिकाओसे भिन्न पिपीलिकाओं- की पङ्क्ति नहीं होती, सैनिकोसे भिन्न सेना नहीं होती, एक-एक वृक्षोंसे भिन्न वन नहीं होता, वैसे जड भूतोंसे भिन्न उसका प्रवाह भी नहीं होता है । साथ ही जट भूतोंमें या उनके प्रवाहमें विचार्यकारिता भी नहीं होती । अतः उनके परतन्त्र चेतन बुद्धिमान्‌को कार्य करने एव सोचनेको बाध्य होना पड़े, यह असंगत है। अवश्य सम्पत्तिया विपत्तिके रूपमें आनेवाली भूत या भौतिक घटनाएँ विचारणीय होती हैं। विचारशील शक्तिशाली प्राणी शक्ति रहनेपर भूतो या भौतिक घटनाओको अनुकूल बनाता है, शक्ति न रहनेपर लाचारीसे सहन करता है । यदि प्रवाह-परतन्त्र ह सब घटनाएँ हों तो भलाई-बुराईका उत्तरदायित्व भी चेतन व्यक्तियों या समुदायपर न होना चाहिये और न तो उन्हें उसका फल ही भोगना चाहिये । फिर तो किसी परिस्थितिके अनुसार ही हिटलर एव उसके साथियोका जन्म हुआ, युद्ध छिड़ा एव अभूतपूर्व विश्वव्यापी सग्राम हुआ । फिर उसके साथियोंको युद्धा- पराधी बनाकर फाँसीपर लटकानेका क्या अर्थ है ? कहा जाता है, गान्धीजी बडे प्रभावशाली थे । फिर भी उनके यन्त्रीकरण- के विरुद्ध खद्दर आदिकी योजना प्रवाहविरुद्ध होनेसे सफल नहीं हुई । पर इससे यही क्यो न माना जाय कि उस योजनाके पीछे जितनी शक्ति अपेक्षित थी, गान्धीजीके पास उतनी शक्ति न थी । इसके विरुद्ध यह भी कहा जा सकता है कि

४३६ मार्क्सवाद और रामराज्य

बढ़े-चढ़े बौद्ध-धर्मको रोकनेके लिये कुमारिल एवं शंकराचार्य सफल हुए । अतः चेतन शक्तिशाली पुरुष भौतिक प्रवाहको मोड़ते हैं, वे प्रवाहमें नहीं बहते । इसी- लिये भारतीय सिद्धान्त है कि 'कालो वा कारणं राज्ञः राजा वा कालकारणम् । इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम् ॥ (महा०) काल राजाका कारण है या राजा कालका कारण है, यह संशय नहीं होना चाहिये—राजा ही कालका कारण होता है । काल प्रवाह, भौतिक प्रवाह या इतिहासचक्रको चेतन प्राणी, राजा, विशिष्ट महापुरुष तथा ईश्वर अवश्य ही बदल सकते हैं । कहा जाता है कि 'उत्पत्ति और समाजका एक रूप नष्ट होता है तो उसका स्थान दूसरा रूप ले लेता है। इस क्रान्तिकारी परिवर्तनका कारण दो प्रकारके घटना- समूह होते हैं । दोनों यद्यपि कभी संयुक्त रूपसे दिखायी देते हैं, फिर भी दोनों- पृथक् रूपसे काम करते हैं । इनमें एक यन्त्र विद्यासम्बन्धी है, जिसके फलस्वरूप उत्पादन-शक्तियोंमें परिवर्तन होता है । दूसरा घटनासमूह व्यक्तिसम्बन्धी है, जिसका सम्बन्ध सामाजिक वर्गों और दलोंसे होता है । काम करनेवाले मजदूरोंकी बढ़ती हुई दक्षता, नवीन कच्चे माल और बाजारोंका अन्वेषण, माल बनानेकी नवीन पद्धति, औजारों और मशीनोंका आविष्कार व्यापार तथा विनिमयके अधिक उत्तम संघटनके फलसे जब उत्पादक शक्तियोंकी वृद्धि हो जाती है और समाजका भौतिक आधार अथवा आर्थिक नींव बदल जाती है, तब उत्पत्तिकी पुरानी प्रणालीसे माल तैयार करनेका पुराना तरीका लाभदायक नहीं रह जाता; क्योंकि माल बनानेका पुराना तरीका, पुराने सामाजिक विभाग, पुराने कानून, पुरानी शासनसंस्थाएँ, पुराने विद्यासम्बन्धी सिद्धान्त (ऐसी उत्पादक शक्तियोंके अनुकूल जो या तो लुप्त हो चुकी हैं या लुप्त हो रही हैं) रह नहीं जाते ? अतः अब वह समाजरूपी भवन उसकी आर्थिक दशारूपी नींवके सदृश नहीं रह जाता । इस प्रकार उत्पादक शक्तियाँ और उत्पत्तिकी प्रणाली एक दूसरेके विरुद्ध हो जाती हैं । प्राचीनता, नवीनताका यह विरोध धीरे-धीरे मनुष्यके विचारोंपर प्रभाव डालता है । मनुष्य एक नवीन युगका आरम्भ अनुभव करने लगता है । इस घटनासे समाजका संघटन भी बदलने लगता है । जो वर्ग पहले तुच्छ समझे जाते थे, वे ही महत्त्वपूर्ण और सम्पत्तिके स्वामी बन जाते हैं । जिन वर्गोंकी पहले प्रधानता थी, उनका पतन होने लगता है । इस प्रकार समाजके मूल आधारमें परिवर्तन होनेसे प्राचीन धार्मिक, कानूनी, दार्शनिक और राजनीतिक प्रणालियाँ पहले तो अपने अस्तित्व कायम रखनेके लिये हाथ-पैर मारती हैं, परंतु समय-परिवर्तनके कारण वे अव्यव- हार्य और निकम्मी हो जाती हैं, लोगोंके उपयोगार्ह नहीं रह जातीं । मनुष्योंके विचार भी प्रायः परिवर्तनविरोधी स्थितिपालक होते हैं, पर फिर वे भी धीरे-धीरे घट- नाओंका अनुसरण करने लगते हैं । महान् विचारक उत्पन्न होते हैं, वे नवीन परिस्थितिका रहस्य समझाते हैं । उसके अनुसार नवीन भावनाओं, विचारधाराओं-

का जन्म देते हैं। फिर मनुष्योमें विवेक जाग्रत् होता है। संदेह और प्रश्नोकी परम्परासे नवीन सत्य सिद्धान्तोका उदय होता है। फलस्वरूप मतभेद, वादविवाद, फूट, वर्गकलह और क्रान्ति उत्पन्न होती है।' पूर्वके तर्कोंसे ही उपर्युक्त मार्क्सीय मन्तव्यका भी खण्डन हो जाता है। उनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि काल या परिस्थिति एव भौतिक अवस्थाओके कारण सिद्धान्तोमें परिवर्तन नहीं हो सकता। पैदल चलने, बैलगाडियोंद्वारा चलने एवं वायुयानद्वारा चलनेके जमानेमें भले ही भेद हो गया हो, परंतु उनमें रहने- वाले नित्य आत्मा एव परमेश्वरमें भेद नहीं हो गया। इस तरह चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल, नक्षत्रमण्डल, आकाशमण्डलमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। अग्निका दहन, प्रकाशन-धर्म, पृथ्वीके अन्नादि उत्पन्न करनेके स्वभावमें रद्दोबदल नहीं हुआ। अग्नि, सूर्य, वायु एव आकाशके धर्ममे रद्दोबदल नही हुआ। चन्द्रमाके घटने बढने एव तदनुसार समुद्रके ज्वारभाटेमें भी रद्दोबदल नही हुआ। भोजनसे भूख मिटानेके सिद्धान्तमें, पानीसे प्यास बुझानेके सिद्धान्तमें, सन्तानोत्पादन कार्यादिमें भी उल्लेख्य परिवर्तन नही हुआ। अतएव सत्य-अहिंसा, स्तेयादि धर्मो- का भी महत्त्व घटा नहीं है। मशीनो एव बड़े-बडे कलकारखानोंके बननेसे या मज- दूरोमें कार्यक्षमता, दक्षता बढ जानेसे सम्पत्तिमें, सुख-सुविधा आदिमें वृद्धि हो जानी अलग बात है, परंतु इससे धार्मिक, दार्शनिक या राजनीतिक सिद्धान्तोमें अन्तर पड़नेका कोई भी कारण नही है। पुनश्च आधुनिक लोगोके मतानुसार जो छः हजार वर्षके भीतर ही ससारका ऐतिहासिक एव प्रागैतिहासिक काल मानते हैं, उनके लिये यह भले ही कोई नवीन अद्भुत विकास हो, परंतु जो अरबो वर्षकी दुनिया मानते हैं, वे लाखो वर्ष पहले महायन्त्रोका निर्माण करके उनका दुष्प- रिणाम भी जान चुके हैं। अतएव उनके निर्माणको पाप तथा अवैध घोषित कर चुके हैं। रामायणके पुष्पकयान तथा देवताओके दिव्य विमानोका मुकाबला करनेमें आजके विमान कुछ हैं ही नहीं। कथासरित्सागर, बृहत्कथामें वर्णित विमानोका भी आधुनिक विमान मुकाबला नहीं कर सकते। उनमें एक कीलके दबानेसे एक बारकी उड़ानमें आठ हजार योजनतक जानेकी क्षमता थी, खतरेकी तो तो कोई सम्भावना थी ही नहीं। यन्त्रचालित नगर एव बाजार आदिको और उनके शासन आदिकी सम्पूर्ण व्यवस्था एक कारीगरके हाथमे होना कितना महत्त्वपूर्ण आविष्कार था*।


  • राजा भोजके पास एक काष्ठमय अश्वाकार यन्त्र था, जिसकी एक घडीमें ११ कोसकी गति थी—'घट्येकया क्रोशदशेकनञ्च सुकृत्रिमो गच्छति चारुगत्या। वायु दधाति व्यञ्जन सुपुष्कल विना मनुष्येण चलत्यजस्रम् ॥' (समरा० सूत्र०)। उज्जैनके राजा प्रद्योतने राजा उदयनको फँसानेके लिये एक यन्त्रमय हाथी बनाया था, जिसपर

४३८ मार्क्सवाद और रामराज्य महाभारतके ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, पाशुपतास्त्र-जैसे अस्त्र-शस्त्रोंकी बराबरी आजकलके हाईड्रोजन बम आदि भी नहीं कर सकते हैं। वे अस्त्र प्रयुक्त किये जाते थे, साथ ही मध्यसे ही लौटाये भी जा सकते थे और पाशुपतास्त्र तो क्षण- भरमें ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंका संहार कर सकता था। धन, रत्न, मणियोंकी कमी रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर आदिके राज्यमें न थी। उनकी बुद्धि, शक्तिकी भी आजके लोगोंसे तुलना नहीं की जा सकती। विश्वकर्मा, मय एव नल- नीलकी कारीगरी, हनुमान्, अंगद, वालि, अर्जुन, भीमकी शक्तिका आज कौन बराबरी कर सकता है ? तथापि उन लोगोंने अपौरुषेय शास्त्रों एव तदाश्रित धर्म, दर्शन एव आर्ष नीतियोंमें कोई परिवर्तन आवश्यक नहीं समझा एवं आज भी जिन अमेरिका आदि राष्ट्रोंने पचासो तल्ले ऊँचे भवन बनाये, पंद्रह सौ मील प्रति घंटे चलनेवाले वायुयान बनाये, परमाणु बम, हाईड्रोजन बम-जैसे शस्त्रास्त्र बनाये हैं, वे भी ईसाईमतकी ही पुकार मचा रहे हैं, धर्म एव ईश्वरका सम्मान ही कर रहे हैं। मार्क्स एवं इतिहास मार्क्सवादी समाजके विचारों, सिद्धान्तो तथा राजनीतिक संस्थाओको समाज- की सत्ता और उसकी भौतिक परिस्थितियोके ही अनुकूल मानते हैं और समाजकी सत्ता एव भौतिक परिस्थितियाँ उनके मतमें उत्पादन-शक्तियो तथा उत्पादन- सम्बन्धोंपर निर्भर रहती हैं। इन्हीपर समाजका ढाँचा स्थिर होता है। दास- युगमे सामाजिक रीतियाँ अन्य युगोंसे भिन्न थीं। यही बात सामन्तवादी तथा ६० योद्धा बैठते थे (कथासरित्सागर)। भरद्वाजकृत अंशबोधिनीके 'शक्त्युद्गमाद्यष्टौ' इस सूत्रकी 'बौधायनवृत्ति' में शक्त्युद्गम आदि आकाशगामी विमानके आठ प्रकार इस तरह बतलाये गये हैं—(१) शक्त्युद्गम (बिजलीसे चलनेवाला), (२) भूतवाह (अग्नि, जल, वायुसे चलनेवाला), (३) धूमयान (वाष्पसे चलनेवाला), (४) शिखोद्गम (तेलसे चलनेवाला), (५) अंशुवाह (सूर्यकिरणोंसे चलनेवाला), (६) तारामुख (उल्कारस अर्थात् चुम्बकसे चलनेवाला), (७) मणिवाह (चन्द्रकान्त- सूर्यकान्त आदिसे चलनेवाला) और (८) मरुत्सख (केवल वायुमे चलनेवाला)। पुष्पकविमानका वर्णन वाल्मीकिरामायणमें सुप्रसिद्ध है—'ब्रह्मणोऽर्थे कृतं दिव्यं दिवि यद् विश्वकर्मणा । विमानं पुष्पकं नाम सर्वरत्नविभूषितम् ॥' 'भागवत'में शाल्वके विमान- का भी वर्णन इन शब्दोंमें आया है—'स लब्ध्वा कामगं यानं तमोधाम दुरासदम् । ययौ द्वारवतीं शाल्वो वैरं वृष्णिकृतं स्मरन् ॥ क्वचिद् भूमौ क्वचिद् व्योम्नि गिरिमूर्धनि जले क्वचित् ।' (१०।७६।८, २२) कुबेरका पुष्पकयान, कर्दमका दिव्ययान और शाल्वका विमान जल, स्थल, पर्वत तथा आकाशमें सर्वत्र चलता था। शुक्रनीतिके चौथे अध्यायमें तोप-बन्दूक आदिका विशेषरूपसे उल्लेख है—'नालिकं द्विविधं ज्ञेयं बृहत् क्षुद्रविभेदतः । तिर्यगूर्ध्वच्छिद्रमूलं नालं पञ्चवितस्तिकम् ॥ मूलाग्रयोर्लक्ष्यभेदि तिलविन्दुयुतं सदा । यन्त्राघाताग्निकृद् द्रावचूर्णदृक्तकर्णकम् ॥ शुक्रनी० ४।१०२८-२९)।'

ऐतिहासिक भौतिकवाद ४३९

पूँजीवादी युगके लिये भी कही जा सकती है। इन भिन्नताओंका कारण उत्पादन- शक्तियाँ और उत्पादनके सम्बन्ध हैं। मार्क्सने कहा है कि 'मनुष्यकी सत्ता उसकी चेतनाद्वारा नहीं निश्चित होती; किंतु उसकी चेतना ही सामाजिक सत्ताद्वारा निश्चित होती है।' अध्यात्मवादी रामराज्यमें विचारशील, सावधान मनुष्य शास्त्र तथा शिष्ट सज्जनोंके समागमसे सच्छिक्षा, सद्बुद्धि एवं सदिच्छा प्राप्त करके तत्परतासे सत्प्रयत्न करता है और सत्फलका भागी होता है। सत्प्रयत्नद्वारा चेतन प्राणी समाजकी सत्ता एवं परिस्थितियोंमें भी परिवर्तन कर सकता है। उत्पादन-शक्तियों एवं उत्पादन-सम्बन्धोंमें भी विचारवान् मनुष्यने ही परिवर्तन किये हैं और अब भी उसीके द्वारा परिवर्तन किये जा सकते हैं। सामान्य स्थितिमें मनुष्य भी आदत, स्वभाव या प्रकृतिके परतन्त्र होकर ही सब चेष्टा करता है। इसीलिये गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञानवान् प्राणी भी अपनी प्रकृतिके अनुसार ही चेष्टा करता है। सभी प्राणी प्रकृतिका ही अनुसरण करते हैं, उसमें किसीका निग्रह कुछ नहीं कर सकता—'सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥' (३।३३) भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम्हारा यह उद्योग व्यर्थ है, प्रकृति तुम्हें नियुक्त करेगी। मोहवश जो तुम नहीं करना चाहते हो, उसे भी प्रकृति हठात् तुमसे करायेगी—'मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥' 'कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥' (गी० १८।५९ ६०) इत्यादि। परंतु जब शास्त्रोंमें तथा लोकमें भी विधि-निषेध मान्य होते हैं, तब सुतरां यह मानना पडता है कि प्राणी किसी कार्यके करने, न करने या अन्यथा करनेमें स्वतन्त्र होता है। स्वतन्त्र होनेपर ही वह कर्ता होता है, तभी उसके लिये विधि-निषेध सम्भव होते हैं। किसी जकड़े हुए, बँधे हुए, परतन्त्र प्राणीको कोई भी समझदार व्यक्ति किसी कार्यके करनेका आदेश नहीं दे सकता। 'स्वतन्त्रः कर्त्ता' इस पाणिनि-सूत्रकी बात हम पहले लिख ही चुके हैं। (पृष्ठ ४३५)। प्रकृति, स्वभाव, आदत या परिस्थिति सभीके सामने है। यदि सभी परतन्त्र ही हैं, तो प्रकृति या परिस्थितिसे परतन्त्र प्राणीद्वारा होनेवाले अपराधका उत्तरदायित्व उस प्राणीपर नहीं होना चाहिये, अतएव उसे दण्डभागी भी न होना चाहिये। इसी तरह किसी प्राणीसे शुभकर्म बन जानेपर उसे अनुग्रहभागी भी न होना चाहिये, परंतु यह बात लोक तथा शास्त्र सबके विरुद्ध है। इसके अतिरिक्त निम्न दशासे निकलकर उच्चस्थितिकी ओर चलनेका प्रयत्न भी कभी सफल नहीं हो सकेगा। फिर तो जैसी प्रकृति या परिस्थिति होगी, तदनुसार ही प्राणी पतित होने या उन्नत होनेके लिये वाध्य होगा। परंतु यह बात लोकानुभवमें विरुद्ध ही है। गीताचार्य भगवान्ने इसका समाधान

करते हुए बतलाया है कि सामान्यरूपसे इन्द्रियोंका अपने विषयोंमें स्वाभाविक राग-द्वेष होता है । अनुकूल विषयमें राग और प्रतिकूल विषयमें द्वेष होता है । उन राग-द्वेषोंके वश न होना ही पुरुषार्थका सार है अर्थात् राग-द्वेषरूप सहकारी कारणसे युक्त होकर ही प्रकृति प्राणीको स्वानुरूप कार्यमें प्रवृत्त करती है— इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ (गीता ३।३४) काम तथा प्रकृति काम्य—रागवान्‌को ही काम्यकर्ममें प्रवृत्त कर सकते हैं । काम, प्रकृति भी रागहीन द्वेषास्पद पदार्थमें प्राणीको प्रवृत्त नहीं कर सकते । सिंहकी हिंसा-प्रकृति द्वेषास्पद प्राणियोंकी हिंसामें ही उसे प्रवृत्त करती है, द्वेषानास्पद अपने शिशुकी हिंसामें सिंहकी हिंसा-प्रकृति भी उसे नहीं प्रवृत्त कर सकती । अतः जैसे मृत्तिकासे घट बननेमें जल सहकारी कारण है, जल न रहनेपर मृत्तिकासे घट नहीं बनता, वैसे ही प्रकृतिके प्रवर्त्तनमें राग- द्वेष सहकारी कारण हैं । राग-द्वेषके विघटित कर देनेपर प्रकृति या परिस्थिति व्यर्थ हो जाती है । अतः सच्छास्त्रोंके अभ्यास एवं सत्पुरुषोंके समागमसे आवश्यक, उचित, शास्त्रीय राग-द्वेष बनाकर स्वाभाविक पाशविक राग-द्वेषको विघटित कर देना चाहिये । इससे प्रकृति या परिस्थिति व्यर्थ हो जाती है। यही प्राणीका पुरुषार्थ है । इसीमें प्राक्तन सुकृत एवं ईश्वरानुग्रहका भी उपयोग होता है । इस पुरुषार्थके ही बलपर समाज एवं उसकी परिस्थितियाँ, उत्पादन- शक्तियाँ तथा उत्पादन-सम्बन्ध बनाये-बिगाड़े जाते हैं । अनुचित परिस्थितियोंके विघटन एवं उचित परिस्थितिके सम्पादनमें चेतन प्राणीकी ही स्वाधीनता होती है। व्यवहारमें स्पष्ट ही देखा जाता है कि चेतन अचेतनका गुलाम नहीं है; किंतु अचेतन ही चेतनका गुलाम है । दृष्टानुसारिणी ही कल्पना उचित होती है । इसके अनुसार पुरुषार्थपरायण महापुरुष इतिहासको, परिस्थितियोंको बदलते हैं, वे परिस्थितियोंके दास नहीं होते । किसी भी युगमें दुर्गुण, दुर्व्यवस्था, कुविचार एवं आलस्य प्रमादके परिणाम होते हैं, वे सदा ही त्याज्य माने जाते हैं। सद्‌विचार एवं तत्परतामूलक किसी भी युगकी अच्छाइयाँ सदा ग्राह्य होती हैं। खलोंके लिये विद्या, धन और शक्ति सदा ही विवादार्थ, मदार्थ, तथा परपीडनार्थ थी, सत्पुरुषोंके लिये उक्त तीनों ही वस्तुएँ सदा ही ज्ञानार्थ, दानार्थ एवं रक्षणार्थ थीं । भूत-संघातमय मनुष्य तथा मनुष्य संघातप्राय समाज सभीकी सत्ता अनन्त, अखण्ड व्यापक बोधसे ही निर्धारित होती है । जड़ स्वयं अपनेको ही सिद्ध नहीं कर सकता, तो फिर उसके द्वारा चेतनकी सिद्धि कैसे कही जा सकती है ? प्रकाशके द्वारा घटादिका निश्चय तो होता है, परंतु घटादिके बलपर प्रकाशका निश्चय कोई बुद्धिमान् व्यक्ति माननेको तैयार नहीं होगा।

ऐतिहासिक भौतिकवाद ४२१ परिवर्तनके कारण मार्क्सके मतानुसार 'परिवर्तनका कारण न तो भौगोलिक अवस्था ही है न जनसङ्ख्या ही, क्योंकि यूरोप सदियोंसे अपरिवर्तनशील रहा है, फिर भी वहाँ पंचायती व्यवस्था, दासप्रथा, सामन्तवादी, पूँजीवादी व्यवस्था आदि अनेक परिवर्तन हुए । जनसङ्ख्या भारतमें इंग्लैंड, अमेरिकासे अधिक होनेपर भी वहाँ इतने परिवर्तन नहीं हुए ।' स्टालिनका कहना है कि 'ऐतिहासिक भौतिकवादके अनुसार आवश्यक जीवन-साधनोंको प्राप्त करनेकी प्रणाली ही सामाजिक परिवर्तन- की नियामक शक्ति है । व्यक्तिको जीवित रहनेके लिये भौतिक मूल्यों (वस्तुओं) की आवश्यकता पड़ती है । उत्पादनके सिलसिलेमें वह अन्य व्यक्तियोंसे सम्बन्ध स्थापित करता है । यह उत्पादन स्वेच्छापर आश्रित नहीं होता, किंतु उत्पादन- शक्तियोंके रूपपर ही आश्रित रहता है । उत्पादन किसी अवस्थामें देरतक स्थिर नहीं रहता, अपितु विकासकी दिशामें उसका परिवर्तन होता रहता है । उत्पादन-पद्धतिमें परिवर्तन होनेसे सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था, विचारों, राजनीतिक मतों और राजनीतिक संस्थाओंमें परिवर्तन अवश्यम्भावी हो जाता है ।' मार्क्सके शब्दोंमें 'सामाजिक सम्बन्ध उत्पादक शक्तियोंसे जुड़े हुए होते हैं । नयी उत्पादक शक्तियोंके अर्जनमें मनुष्य अपनी उत्पादन-पद्धति बदल देते हैं । अपनी उत्पादन-पद्धति तथा अपनी जीविकोपार्जनकी प्रणाली बदलनेमें वे सभी सामाजिक सम्बन्धोंको परिवर्तित करते हैं । हाथकी चक्कीकी अवस्थामें सामन्तशाही सामाजिक सम्बन्ध व्याप्त होते हैं । भापसे चलनेवाली चक्कीमें वह समाज बनता है, जिसमें औद्योगिक पूँजीपतियोंका प्रभुत्व होता है । सामाजिक प्रगति- में विचारों, सिद्धान्तों, मतों और संस्थाओंका भी स्थान होता है । ये सब भौतिक जीवनपर तो अवश्य आश्रित होते हैं, किंतु इनका सामाजिक शक्तियोंके समेटने, संघटित करनेमें महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । नये विचार, नये सिद्धान्त और नयी भौतिक परिस्थितियोंमें उत्पन्न इनके द्वारा जनसाधारणको भौतिक त्रुटियोंका ज्ञान होता है । यह विचार सामाजिक परिवर्तनमें बहुमूल्य होते हैं । इन्हींके आधारपर जनता उन शक्तियोंका विध्वंस करती है, जो प्रगतिमें बाधक होती हैं ।' अध्यात्मवादी रामराज्यके मतानुसार कोई मौलिक सिद्धान्त एवं विचार नये नहीं होते हैं । असत्का अर्थात् अत्यन्त अविद्यमानका कभी भाव नहीं होता, सत्का अर्थात् विद्यमानका कभी अभाव नहीं होता—'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।' (गी० २ । १६) तिलमें तेल है तभी वह प्रकट होता है । सिकतामें तेल नहीं होता है, अतः लाख प्रयत्न करनेपर भी सिकतासे कभी तेल प्रकट नहीं होता । मार्क्सवादी कुछ प्रादेशिक घटनाओंके आधारपर कार्य-कारण-भाव निश्चित

करते हैं और उन्हींके आधारपर सिद्धान्त गढ़ते हैं । परंतु घटनाएँ अनुकूल-प्रतिकूल, इष्ट-अनिष्ट दोनों ही ढंगकी होती हैं। चोरी, हिंसा, दुराचार आदिका भी कभी विकास होता है, उसमें भी क्रम होता है, फिर भी वह सिद्धान्त नहीं बन जाता । व्यक्तिगत रूपसे तथा समाजगतरूपसे कभी विकास होता है और कभी ह्रास भी होता है, इसीमें प्रमाद एवं पुरुषार्थका उपयोग होता है । जिस मजदूर-समाजको मार्क्सने विकासोन्मुख माना है, उसकी ही अनुभूयमान हालत बहुत ही चिन्तनीय है । मशीनयुगके कारण बेकारीकी भी समस्या खड़ी हुई समझी जाती है । विद्या- बुद्धिका भी विकास नहीं कहा जा सकता है । फिर भी मार्क्स सर्वहाराका राज्य अवश्यम्भावी कहता है । वह किसानको उदीयमान वर्ग नहीं मानता था । परंतु चीनकी क्रान्तिमें किसानवर्ग उदीयमान वर्ग सिद्ध हो गया । यदि इसी प्रकार किसी अन्य वर्गका उदय हो जायगा तो मार्क्सकी अन्य भविष्यवाणियाँ भी झूठी सिद्ध हो जायेंगी । मार्क्सकी ऐतिहासिक कल्पनाएँ और तदनुसारी नियम-निर्धारण सहस्रों नहीं सैकड़ों वर्षोंके ऐतिहासिक अनुभवोंके आधारपर हैं, परंतु अध्यात्मवादियोकी धरित्री और उसका इतिहास सहस्रों, लक्षों नहीं अपितु अरबों वर्षोंके हैं । वहाँका यह व्यापक नियम है कि शुभ कर्मोंसे सुख एवं तत्साधनोंकी समृद्धि होती है और अशुभ कर्मोंसे दुःख एवं तत्साधनोंकी समृद्धि होती है । बुद्धिमानी, सावधानी एवं तत्परतासे कर्तव्यपरायण होनेपर समृद्धि बढ़ती है और अविवेक, असावधानी तथा प्रमादसे असमृद्धि बढ़ती है । धन-धान्य-समृद्धि बढ़नेसे जीवनस्तर उन्नत होता है । प्रमादहीन होनेसे समृद्धिके कारण विद्या, विवेक, कला, काव्य, संस्कृतिका विकास होता है । प्रमादयुक्त होनेसे समृद्धिके परिणामस्वरूप अनाचार, दुराचार, भ्रष्टाचारकी वृद्धि होती है । असमृद्धिमें भी प्रमाद होनेपर अनाचार, दुराचार आदि बढ़ते हैं और प्रमादहीन होनेसे असमृद्धि-दशामें भी विद्या, विवेक, तपस्याका विस्तार होता है । विश्वकर्मा एवं मयकी शिल्पकला शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है । 'समराङ्गण-सूत्रधार' के रचयिता भोजका काल ईसाकी १० वीं शतीमें माना जाता है । उस ग्रन्थमें अनेक प्रकारके कला-कौशल, वायुयान आदिका वर्णन मिलता है । राज्यधर तक्षा ( बढ़ई ) के द्वारा निर्मित वायुयान एक कीलके आघातसे आठ सौ योजन चल सकता था । उस तक्षाद्वारा निर्मित यन्त्रमय महानगरके सभी व्यवहार यन्त्रसे ही होते थे, तो भी तत्कालीन लोगोंके विचारों, सिद्धान्तोंमें कोई अन्तर नहीं पड़ा । इसका उल्लेख 'कथासरित्सागर' में मिलता है । 'रामायण' 'महाभारत' के अनुसार बहुत विशाल पुष्पकयान आधुनिक सभी वायुयानोंसे अधिक विशाल, कलापूर्ण, द्रुतगामी तथा निरापद था । ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र आदि अस्त्र-शस्त्रोंका मुकाविला तो आधुनिक हाइड्रोजन बमसे करोड़ोंगुना अधिक घातक अस्त्र बनाया जाय, तो भी नहीं किया जा सकता । तब भी उन

ऐतिहासिक भौतिकवाद ४४३

ब्रह्मास्त्रादिके निर्माताओंके धर्म, सिद्धान्तों, विचारों, आचारोंमें कोई भी रद्दो- बदल नहीं हुआ । ब्रह्मलोककी दिव्य ब्रह्मपुरीमें, इन्द्रलोककी दिव्य अमरावतीपुरीमें और विष्णुकी दिव्य वैकुण्ठपुरीमे जो विचार, जो सिद्धान्त, जो आचार आदरणीय थे, वे ही परम अकिञ्चन, वल्कलवसनधारी, कन्दमूल-फलाशी, अरण्यवासी, वीतराग महर्षियोंके यहाँ भी माननीय थे । सप्तदीपा मेदिनीके सम्राट् और अकिंचन दरिद्र ब्राह्मणके आचार, विचार, सिद्धान्त, धर्म एक-से ही होते थे । इन्द्रादि देवगणोंके दिव्य विमान, दिव्य भोग तथा दिव्य शक्तिसे सम्पन्न होनेपर भी उनके सिद्धान्तो एव विचारोंमें कोई भेद नहीं होता था । पीछे बतलाया जा चुका है कि प्राचीन कालमें महायन्त्रोका प्रचलन हुआ था, परतु उसके बेकारी आदि दुष्परिणामोंको देखकर ही आस्तिकोंद्वारा उसपर प्रतिबन्ध लगाया गया था। कुछ धनिकोंको शोषक देखकर 'धनवान् होना ही शोषक होनेका कारण है' यह समझना नितान्त भ्रम है। कुछ बलवानोंको अन्यायी, अत्याचारी देखकर 'बलवान् होना अन्यायी होनेमें हेतु है' यह समझना और कुछ विद्वानोंको दुराचारी देखकर 'विद्वान् होना दुराचारी होनेका कारण है' यह समझना निरा भ्रम ही है। यह बतलाया जा चुका है कि सत्पुरुषोके यहाँ धन, बल एव विद्या सर्वथा दान, रक्षण एव ज्ञान-प्रकाशके लिये होती है । जैसे किसी मक्खीको घी हजम न होते देखकर कोई यह कल्पना करे कि घी किसीको हजम नहीं होता, तो यह भ्रम ही है। पानीसे आग बुझती हुई देखकर यदि कोई पानी-जैसी ही वस्तु पेट्रोलसे अग्नि बुझाना चाहेगा तो यह उसकी मूर्खता ही समझी जायगी । इसी तरह किसी राजा या धनवान्‌को नास्तिक, प्रमादी एव दुराचारी देखकर यदि कोई वैसी व्याप्ति (नियम) बनाना चाहे तो यह उसका भ्रम ही कहा जायगा । चकमक पत्थरसे अग्नि निकाल लेना, अरणिमन्थनसे अग्नि निकाल लेना, दीपशलाका (दियासलाई) से अग्नि निकाल लेना या और भी किसी आधुनिक साधनसे अग्नि निकाल लेना, इनसे अग्निके दाहकत्व, प्रकाशकत्व सिद्धान्तमें कोई अन्तर नही पडता । हाथकी चक्कीसे आटा पीस लेने या यन्त्रकी चक्कीसे आटा पीस लेनेसे भोजन करके भूख मिटानेके सिद्धान्तमें कोई फरक नहीं पडा है, बल्कि आज भी स्वास्थ्यके विचारसे हाथकी चक्कीका आटा श्रेष्ठ समझा जाता है। आज भी अग्निहोत्रके लिये अरणि-मन्थनसे ही अग्नि प्रकट की जाती है । शमशानकी अग्निसे भी चावल पक सकता है और अग्नि- होत्रकी अग्निसे भी भोजन बन सकता है । फिर भी सस्कारकी दृष्टिसे शमशान- की अग्नि अशुद्ध होती है, उससे पकाये गये अन्नको आस्तिक व्यक्ति ग्रहण नही करते । प्राचीन कालमे अनन्त धन-धान्यसम्पन्न विपुल वैभवयुक्त सार्वभौम सम्राट् सामन्त, साधारण व्यापारी एवं किसान तथा उञ्छशिल वृत्तिवाला परम अकिंचन तपस्वी, सभी शास्त्रानुसारी, समान सिद्धान्त और समान विचारके होते रहे हैं ।