मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐतिहासिक भौतिकवाद ४२९ प्राणी शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक परिस्थितियोंकी सहायतासे अपनी आवश्यकताओंकी पूर्तिके लिये वस्तुओंको उत्पन्न करता, बाँटता तथा रद्दोबदल भी करता है। परंतु जहाँ आध्यात्मिक धार्मिक दृष्टिसे तथा विवेकके विरुद्ध शारीरिक मानसिक तथा बाह्य भौतिक परिस्थितियाँ, परस्त्री, परधन-हरणके अनुकूल भली ही हों, तथापि एक विवेकी पुरुष उनका विरोध ही करता है। नदीके तीव्र प्रवाहमें पड़ा हुआ मुर्दा ही निर्विरोध धाराका अनुसरण करता है, परंतु जीवित प्राणी अवश्य ही विरोध करता है, प्रवाह चीरकर लक्ष्यकी ओर बढ़ता है। प्रवाहका किंचित् अनुसरण भी प्रवाह अतिक्रमणके ही अभिप्रायसे करता है। समुद्रमे नाव डालकर वायुके अनुसार भटकनेवाला प्राणी निरुद्देश्य ही होता है। जिसका कोई लक्ष्य होता है, वह विरुद्ध भीषण झंझावातका भी मुकाबला करके लक्ष्यकी ओर चढता है, यदि उसमें सर्वथा असमर्थ रहा तो उसी जगह लंगर डालकर नावको रोक देता है—'जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजै' का दुरुपयोग करनेवाले अवसरवादी सर्वथा अविश्वसनीय ही हुआ करते हैं। उत्पादन-शक्तियाँ और नियम कहा जाता है कि उत्पादन-शक्तियाँ दो प्रकारकी हैं-एक चेतन, दूसरी अचेतन। अचेतन शक्तियोंके अन्तर्गत भूमि, जल, वायु, कच्चा माल, औजार, मशीनें आदि आ जाती हैं। चेतन शक्तियोंमें मजदूर, आविष्कारक, अन्वेषक, इंजीनियर आदि आ जाते हैं। जातिगत गुणों अर्थात् किसी मनुष्य-समूहकी जन्मसिद्ध योग्यताका भी चेतन शक्तियोंमें अन्तर्भाव है। सबसे अधिक महत्त्व शारीरिक और मानसिक श्रम करनेवाले श्रम-जीवियोंका है। उनके द्वारा ही पूँजीवादी समाजमे विनिमय मूल्यकी सृष्टि होती है। दूसरा महत्त्व आधुनिक यन्त्रविद्याका है, जिसके कारण आज समाजमें उथल-पुथल हो रहा है। मार्क्सके मतानुसार 'मनुष्य उत्पादक कार्य और उसकी आवश्यकताके प्रभावानुसार अपने समाज, राज्य, धर्म-दर्शन और विधानसम्बन्धी सिद्धान्तोंकी रचना करता है। भौतिक, आर्थिक अवस्था इसकी आधार-भित्ति स्वरूप है। उससे उत्पन्न होनेवाली धार्मिक राजनीतिक, दार्शनिक आदि प्रणालियाँ उसके ऊपर बने हुए भवनोंके समान होती हैं। ये भवन जितने अंशोंमें अपनी आधारभित्तिके अनुरूप होते हैं, उतने ही दृढ होते हैं, उतनी ही उन्नति और समृद्धि होती है। सामाजिक दशाओंके द्वारा सम्पत्ति सम्बन्धी नियम बनाये जाते हैं और मनुष्योंके उन पारस्परिक सम्बन्धोंका निर्णय किया जाता है, जिनसे उत्पत्तिका कार्य चलता है। उत्पादनके नियमोंका निर्णय समाजके मनुष्य ही करते हैं, जैसे और नियमोंका निर्णय समाजके मनुष्य ही करते हैं। जैसे मनुष्य प्राकृतिक सामग्री और शक्तियोंकी सहायतासे भाँति-भाँतिकी वस्तुओंका निर्माण करते हैं, उसी प्रकार मस्तिष्कपर उत्पादक शक्तियोंकी प्रतिक्रियाके फलस्वरूप सामाजिक, राजनीतिक