भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 743

४३० मार्क्सवाद और रामराज्य और न्यायसम्बन्धी विधानों तथा धार्मिक, चारित्रिक, दार्शनिक सिद्धान्तोंका भी निर्णय वे ही करते हैं।' उत्पादक-उत्पादन-शक्तियो और उनके द्वारा होनेवाले परिणामोंपर विचार करते हुए यह कभी न भूलना चाहिये कि उच्चावच अनन्तानन्त सब भौतिक पदार्थ भोग्य हैं। वे अपने लिये नहीं, किंतु भोक्ताके लिये होते हैं। भोक्ता भोग्यके लिये नहीं होता, किंतु भोग्य भोक्ताके लिये होता है। पलंग अपने लिये नहीं, किंतु सोनेवाले भोक्ताके लिये होता है। करोड़ों रुपयोंकी माला, मालाके लिये नही, अपितु पहननेवालेके लिये होती है, अतएव पलंग यदि छोटी पड जाय तो पलंगमें सुधार होना चाहिये, न कि सोनेवालेको काट-पीटकर पलंगके लायक बनाना चाहिये । माला छोटी पड़ती है, सिरसे गलेमें नहीं उतरती, तो मालाको तोड़कर सुधारना ठीक है, पहननेवालेका सिर छीलकर मालाका गले उतारना बुद्धिमानी नही। ठीक इसी प्रकार भोक्ता नित्य, चेतन, आत्माके लौकिक पारलौकिक हित- की दृष्टिसे भौतिक वैभव एवं उनके रद्दोबदलका उपयोग किया जा सकता है, परंतु आत्माके लौकिक, पारलौकिक हितोंके विपरीत असर डालनेवाले भौतिक प्रभावोंको हर प्रकार रोकना ही उचित है। जैसे स्थूल देह सूक्ष्म मनके अधीन रहता है, वैसे ही देह, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सभी संहत आत्माके लिये होते हैं, वैसे ही देहादिसंघात स्वविलक्षण स्वप्रकाश असंहत आत्माके लिये हैं। रथादि अचेतनकी प्रवृत्ति सारथि चेतनसे अधिष्ठित होती है, वैसे ही जड देहादिकी प्रवृत्ति चेतन आत्मासे अधिष्ठित होती है। देहादि यदि आत्माके अधीन न हो तो भारभूत हो जाते हैं, इसी तरह अचेतन भौतिक सभी व्यवस्थाएँ भी समष्टि चेतन- नियन्त्रित रहकर ही सुख-साधक हो सकती हैं। आधुनिक वैज्ञानिक लोग जड प्रकृति- वशीकारके लिये प्रयत्नशील होते हैं। आधिभौतिक बड़ी-से-बड़ी उन्नति यदि आत्माके अनुकूल है, आत्माके नियन्त्रणमें है तभी उसका महत्त्व है, अन्यथा वह भार- भूत दुःखरूप ही है। इस तरह भौतिक अवस्थाके अनुसार चेतनके सब नियमोंमें रद्दोबदल अत्यन्त असंगत है, आंशिक रूपसे भौतिक अवस्थाओका उपयोग एवं अनुसरण मान्य है ही। फिर भी चेतनपर अचेतनका हावी हो जाना कथमपि उचित नहीं है, चेतन उत्पादक होनेसे एव भोक्ता भी होनेसे महत्त्वपूर्ण है, वह पूँजी एवं यन्त्र दोनोंपर ही अधिकारी होता है, अतः चेतनसे अचेतनकी तुलना ही नहीं हो सकती। फिर भी श्रमजीवीको श्रमका फल जैसे मिलना आवश्यक है, वैसे ही पूँजीपतिको पूँजीका फल भी मिलना आवश्यक है और यह कम्युनिष्टको भी मानना ही होगा, भले ही उसकी दृष्टिमें ही यह फल व्यक्तिको न मिलकर समाजको मिले। यहाँ रामराज्यके अनुसार आधुनिक शोषक पूँजीवाद या व्यक्तियोंका अधि- नायकवाद या निःस्वत्ववाद नहीं मान्य है, किंतु वह पूँजी सबको मान्य है, जिसके द्वारा यन्त्र एवं आविष्कारक, अन्वेषक एव श्रमजीवियोंका भी काम चला है।