मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधुनिक रूपमें आजकल भी व्यक्ति बैंकोंमें रुपया जमा करता है और उसका सूद भी प्राप्त करता है । माली हालत या भौतिक अवस्था भले ही तत्सम्बन्धित नियमोंकी आधार- भित्ति हो, परन्तु 'दार्शनिक धार्मिक सभी नियमोंकी आधारभित्ति या नींव भी माली हालत ही है'—यह कहना सर्वथा असंगत है । भले पुरुष चाहे निष्किञ्चन हों या धनवान्; किंतु अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदिका आदर सभी करते हैं । प्राचीन कालमें जैसे अकिंचन ब्रह्मचर्यका, तपस्याका सम्भावन करते थे, वैसे ही एक सर्वसाधन- सम्पन्न सम्राट् भी सब त्यागकर ब्रह्मचर्य एवं त्याग-तपमें परिनिष्ठित होता था । आज भी भले लोग धनी हों या गरीब, धर्मका आदर करते हैं । बुरे चाहे धनी हों या गरीब, धर्मकी उपेक्षा करते हैं । देह-भिन्न आत्माका अस्तित्व तथा ईश्वर सदा, राजा, रङ्क, अमीर, गरीब सभी मानते हैं, फिर माली हालतमें रद्दोबदल होनेसे धर्म एवं दर्शनमें रद्दोबदल होना कहाँतक संगत है ? कथंचित् भावनाओंपर वातावरणका किंचित् प्रभाव पड सकता है, परन्तु तत्त्वज्ञान एवं वस्तुस्थितिसे सम्बन्ध रखनेवाले धर्म-दर्शनोंमें भी माली हालतके रद्दोबदल होनेसे रद्दोबदल मानना अत्यन्त मूर्खता है । लूट, खसूट, चोरी, हत्या, कभी भी धर्म बन जायेंगे, परोपकार, दया, सत्य, कभी अधर्म बन जायेंगे, तब तो कभी संखियाका अमृतरूपसे और अमृतका संखियारूपमें बदलना भी मान लिया जायगा । तत्त्वज्ञानकी व्यवस्था ही लीजिये—रज्जुमें रज्जुज्ञान ही यथार्थ ज्ञान है, रज्जुमें सर्प, धारा, माला आदिका ज्ञान सदा ही अयथार्थ रहेगा, चाहे माली हालतमें रद्दो-बदल हो, चाहे कितना ही भौतिक परिवर्तन हो, परंतु किसी भी हालतमें रज्जुमें रज्जुज्ञानकी अयथार्थता नहीं हो सकती । वस्तुतः मार्क्सवादी व्यक्तिगत भूमि सम्पत्ति, खानो, कल-कारखानोंपर राष्ट्रीयकरणके नामपर अधिकार करनेके लिये आदिपरम्पराप्राप्त शास्त्रीय नियमोंका अपलाप करके अपने कृत्योंका समर्थन करना चाहते हैं । परस्त्री, पर-धनका अपहरण, हत्या एवं जाल- धोखेको भी उचित या न्यायसिद्ध करनेके लिये यह वाग्जाल फैलाते हैं और कहते हैं कि ईश्वरीय या शास्त्रीय कोई भी सत्य न्याय अथवा धर्म नहीं है । माली हालत, भौतिक अवस्थाके अनुसार ही धर्म, सत्य, न्याय बनते हैं, अतः सभी नियमोंकी नींव माली हालत या भौतिक अवस्था ही है । इस दृष्टिसे वे कहते हैं कि 'पुरानी माली हालत या भौतिक अवस्था बदल गयी तो पुराने सब नियम धरा- शायी हो गये । इसलिये पुराने नियमोंके अनुसार जो पहले अधर्म था, वह अब अधर्म नहीं है । अतः हमलोगोंका पर-धन, पर-स्त्री-हरण, हत्या, जाल-फरेब आदि अधर्म या अन्याय नहीं है । जिन लोगोंने उत्पादन साधनों एवं उत्पादनोंमें रद्दोबदल कर लिया, उन्हें धर्म एवं न्यायमें भी रद्दोबदल कर लेनेका हक