भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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४३२ मार्क्सवाद और रामराज्य है, उत्पन्न वस्तुओके वितरण-सम्बन्धी नियमोमे भी रद्दोबदल कर लेनेका हक है—ये सब बाते अपने पापको, अन्यायोंको पुण्य या न्यायसिद्ध करनेका असफल वागाडम्बरमात्र है, जिसमें कुछ भी दम नहीं है। कोई भी व्यसनी या अपराधी, अपनी प्रवृत्ति या रुचिके अनुसार ही अधार्मिक धार्मिक सामाजिक राज- नीतिक नियम चाह सकता है। मार्क्सका कहना है कि 'मनुष्य स्वयं अपने इतिहासका निर्माण करता है। वह यह कार्य अपनी इच्छाके अनुसार अभिलषित मार्गसे नहीं कर सकता, किंतु उसे उस मार्गके अनुसार कार्य करना पडता है, जो कि उसके सामने प्रस्तुत होता है और जिसे वह प्राप्त कर सकता है। उदाहरणार्थ अति प्राचीन युगमे थोड़े-थोड़े मनुष्य गिरोह बनाकर रहते थे, रक्त-सम्बन्धके आधारपर संघटित होते थे। उनके देवता भी उनकी परिस्थितिके अनुसार बनाये गये। इससे प्रकट होता है कि उस परिस्थितिका प्रभाव उन जंगली लोगोंकी मानसिक अवस्था, उनके मजहब, उनके चरित्र और उनके सामाजिक नियमोंपर कैसा पड़ता था। सर्पों, सिंहों आदिकी पूजा उस कालकी निशानी है। इसी तरह मध्यकालके क्षत्रिय सरदारों, जमींदारोंका आधार भूमि-सम्बन्धी अधिकार और शहरोंकी दस्तकारीपर था। उस परिस्थितिके अनुसार उन लोगोंके धार्मिक विचार बदल गये और नवीन मतोंकी स्थापना हुई, जो कि इस युगके अधिकार प्राप्त लोगोंके हितके अनुकूल थे। जो नैतिक, धार्मिक, दार्शनिक विचार इस हितके विरोधी थे, उन्हे दबा दिया गया। 'इसी प्रकार वर्तमान पूँजीवादी समाज व्यक्तिगत पूँजीके आधारपर रचा गया है और वह सामूहिक तथा सहयोगमूलक भावोके उच्छेदनाथं प्रयत्नशील है। यह स्वार्थसिद्धिके लिये व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका प्रचार करता है तथा श्रम- जीवियो और सम्पत्तिका एक स्थानपर संग्रह करता है, जमींदारी, जागीरदारीकी प्रथा और उसके समर्थक विश्वासों (राजाको ईश्वररूपमें मानना) को नष्ट करता है और उनके स्थानपर धार्मिक स्वतन्त्रता, व्यक्तिगत विवेकके सिद्धान्तका विस्तार करता है। यह समाज व्यक्तिगत अधिकारोंका प्रचार करता है, प्राचीन राजाओके एकतन्त्र शासनके विरुद्ध युद्ध करता है, राष्ट्रियताका भाव फैलाकर व्यापार व्यवसायका विस्तृत क्षेत्र प्राप्त करनेका प्रयत्न करता है तथा जमींदारी आदि- के विरोधार्थ ही वह एकतन्त्र सत्ताका समर्थन करता है। एकतन्त्र सत्ता भी जब पूँजीवादमें बाधक होती है, तब उसके विरुद्ध भी वह संग्राम करता है और एकतन्त्र शासनको नष्ट कर वैध राज्य-सत्ता या प्रजातन्त्रकी स्थापना करता है। यह सब काम इसलिये नहीं सम्पन्न किये जाते कि कोई विलक्षण बुद्धिमान् मनुष्य प्रवल विचार शक्तिद्वारा या नवीन ज्ञानोदयद्वारा या ईश्वरीय प्रेरणाद्वारा करता है,