मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐतिहासिक भौतिकवाद ४३३
किन्तु यह सब उस प्रभावसे सम्पन्न होता है, जो मनुष्यके भौतिक आधार या आर्थिक आधारके परिवर्तन होनेसे मनुष्योंके मस्तिष्कपर पड़ता है । मार्क्सका कहना है कि 'मनुष्यके अस्तित्वका आधार उसके विवेक या अन्तरात्माके आदेश- पर नहीं होता, किंतु अन्तरात्माका आधार उसकी सामाजिक स्थिति या दशापर होता है। कोई भी मनुष्य सामाजिक जीवनका निर्माण नहीं कर सकता और न उसके अनुकूल कानून ही बना सकता है। वह तो केवल एक नौकर या कार्य- कर्ताके समान होता है, जो समाजके भौतिक आधार या आर्थिक दशासे उत्पन्न होनेवाली प्रवृत्तियो और विचारधाराओका अनुसरण करता है । तथापि कार्यकर्ता व्यापक ज्ञानवान्, उद्योगी एव अधिक योग्य हो तो अपनी सीमाके भीतर महान् कार्य कर सकते हैं, की गयी उन्नतिको बहुत दूरतक बढ़ा सकते हैं । ईसा, मुहम्मद आदि इसी कोटिके थे ।' अवश्य भौतिक परिस्थितियाँ कभी-कभी प्राणीको अपने अनुसार चलनेके लिये बाध्य करती हैं, फिर भी लक्ष्य एव सिद्धान्तके अनुसार महापुरुष परिस्थितियों- को ही बदल देते हैं, परिस्थितियोके दास नहीं बनते, परिस्थितियोंके वशीभूत होकर भी अपना धर्म नहीं छोड़ते, भले प्राण छोड़ना पड़े तो प्राण छोड़ देते हैं । अति प्राचीन युगका मार्क्सय इतिहास भी सर्वथा अप्रामाणिक है । गिरोह बनाकर रहना' पहले भी अच्छा था, आज भी अच्छा है । रक्त-सम्बन्धसे विशिष्ट समूह आज भी होता ही है । 'परिस्थितिके अनुसार सर्प, सिंह आदिको देवता बनाने' की बात प्रलाप है । शास्त्रविश्वासी आज भी शेषनाग एवं नृसिंह भगवान्को परमे- श्वरके अवताररूपमे पूजते ही हैं । इसी तरह 'मध्यकालमे धार्मिक विचार बदल गये' यह कहना भी असगत है । अनादि अपौरुषेय शास्त्रोंका प्रामाण्य मानने- वालोंका जैसा विचार करोड़ों वर्ष पूर्व रामायणके रामराज्यमें था, हजारों वर्ष पूर्व महाभारतके युधिष्ठिर राज्यमें था, वैसा अब भी है । शास्त्रप्रमाण न माननेवाले जैसे आज हैं वैसे पहले भी थे । उनके मत सदा ही बदलते रहते हैं । शास्त्र अति प्राचीन कालके मालिकों, मध्य कालके सरदारों एव अर्वाचीन कालके पूँजीपतियोके बनाये नहीं हैं । वे आप्तकाम, पूर्णकाम, वीतराग, महातपा, अरण्य- वासी, कन्दमूलफलाशी, वल्कलवसनधारी महर्षियोंद्वारा रचे गये है, सो भी स्वतन्त्र- रूपसे नही, अपितु अनादि, अपौरुषेय, परमेश्वरीय वेदादि शास्त्रोंके आधारपर रचे गये हैं । उनकी व्यवस्थाओंमें आधुनिक ढुलमुल पन्थियोंकी अवसरवादिताका स्पर्श भी नहीं है । बायबिलमें भी कहा गया है कि सूईके छेदसे ऊँटका निकल जाना सम्भव है, पर धनिकोका स्वर्गीय राज्यमें प्रवेश करना कठिन है ।' इसी प्रकार न केवल भारतीय धर्मग्रन्थ अपितु ससारके सभी धर्मग्रन्थ वीतराग, अकिंचनो एव साधारण श्रेणीके लोगोंद्वारा बनाये गये हैं और उन मेधावियोंका कोई पक्षपात नहीं है । मनु यद्यपि सम्राट थे, फिर भी उन्होने अकिंचनोंका ही मा० रा० २८-