मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४३३
किन्तु यह सब उस प्रभावसे सम्पन्न होता है, जो मनुष्यके भौतिक आधार या आर्थिक आधारके परिवर्तन होनेसे मनुष्योंके मस्तिष्कपर पड़ता है । मार्क्सका कहना है कि 'मनुष्यके अस्तित्वका आधार उसके विवेक या अन्तरात्माके आदेश- पर नहीं होता, किंतु अन्तरात्माका आधार उसकी सामाजिक स्थिति या दशापर होता है। कोई भी मनुष्य सामाजिक जीवनका निर्माण नहीं कर सकता और न उसके अनुकूल कानून ही बना सकता है। वह तो केवल एक नौकर या कार्य- कर्ताके समान होता है, जो समाजके भौतिक आधार या आर्थिक दशासे उत्पन्न होनेवाली प्रवृत्तियो और विचारधाराओका अनुसरण करता है । तथापि कार्यकर्ता व्यापक ज्ञानवान्, उद्योगी एव अधिक योग्य हो तो अपनी सीमाके भीतर महान् कार्य कर सकते हैं, की गयी उन्नतिको बहुत दूरतक बढ़ा सकते हैं । ईसा, मुहम्मद आदि इसी कोटिके थे ।' अवश्य भौतिक परिस्थितियाँ कभी-कभी प्राणीको अपने अनुसार चलनेके लिये बाध्य करती हैं, फिर भी लक्ष्य एव सिद्धान्तके अनुसार महापुरुष परिस्थितियों- को ही बदल देते हैं, परिस्थितियोके दास नहीं बनते, परिस्थितियोंके वशीभूत होकर भी अपना धर्म नहीं छोड़ते, भले प्राण छोड़ना पड़े तो प्राण छोड़ देते हैं । अति प्राचीन युगका मार्क्सय इतिहास भी सर्वथा अप्रामाणिक है । गिरोह बनाकर रहना' पहले भी अच्छा था, आज भी अच्छा है । रक्त-सम्बन्धसे विशिष्ट समूह आज भी होता ही है । 'परिस्थितिके अनुसार सर्प, सिंह आदिको देवता बनाने' की बात प्रलाप है । शास्त्रविश्वासी आज भी शेषनाग एवं नृसिंह भगवान्को परमे- श्वरके अवताररूपमे पूजते ही हैं । इसी तरह 'मध्यकालमे धार्मिक विचार बदल गये' यह कहना भी असगत है । अनादि अपौरुषेय शास्त्रोंका प्रामाण्य मानने- वालोंका जैसा विचार करोड़ों वर्ष पूर्व रामायणके रामराज्यमें था, हजारों वर्ष पूर्व महाभारतके युधिष्ठिर राज्यमें था, वैसा अब भी है । शास्त्रप्रमाण न माननेवाले जैसे आज हैं वैसे पहले भी थे । उनके मत सदा ही बदलते रहते हैं । शास्त्र अति प्राचीन कालके मालिकों, मध्य कालके सरदारों एव अर्वाचीन कालके पूँजीपतियोके बनाये नहीं हैं । वे आप्तकाम, पूर्णकाम, वीतराग, महातपा, अरण्य- वासी, कन्दमूलफलाशी, वल्कलवसनधारी महर्षियोंद्वारा रचे गये है, सो भी स्वतन्त्र- रूपसे नही, अपितु अनादि, अपौरुषेय, परमेश्वरीय वेदादि शास्त्रोंके आधारपर रचे गये हैं । उनकी व्यवस्थाओंमें आधुनिक ढुलमुल पन्थियोंकी अवसरवादिताका स्पर्श भी नहीं है । बायबिलमें भी कहा गया है कि सूईके छेदसे ऊँटका निकल जाना सम्भव है, पर धनिकोका स्वर्गीय राज्यमें प्रवेश करना कठिन है ।' इसी प्रकार न केवल भारतीय धर्मग्रन्थ अपितु ससारके सभी धर्मग्रन्थ वीतराग, अकिंचनो एव साधारण श्रेणीके लोगोंद्वारा बनाये गये हैं और उन मेधावियोंका कोई पक्षपात नहीं है । मनु यद्यपि सम्राट थे, फिर भी उन्होने अकिंचनोंका ही मा० रा० २८-
महत्त्व गाया है । यह कहना नितान्त मूर्खता है कि 'शास्त्रकार ऋषि धनिकोके एजेण्ट थे । उनके हितोंकी रक्षाके लिये ये लोग पाप-पुण्यके चक्करमे जनसाधारण- को फँसाये रखनेका प्रयत्न करते रहते थे।' भला, जो राजान्नग्रहणको घोर पाप समझते थे, 'कुसूल-धान्यक' ब्राह्मणकी अपेक्षा जो अश्वस्तनिक ( कलके लिये कुछ न रखनेवाले ) ब्राह्मणको ही श्रेष्ठ मानते थे, महात्यागको ही सर्वस्व मानते थे, वे किस प्रलोभनसे ऐसा निष्ठुर कर्म करते ? आज भी तो धनिकवर्ग नास्तिकप्राय है । वह किस भारतीय विद्वान्का सम्मान करता है ? यह वर्ग जितना उच्छृङ्खलो- की पूजा करता है, उतना आस्तिक पक्षकी प्रतिष्ठा करता तो आस्तिक पुरुषों एवं आस्तिक संस्थाओको आर्थिक संकटके कारण कार्य करनेमें बाधा क्यो पडती ? फिर भी शास्त्रविश्वासी शास्त्र, युक्ति एवं लोकसिद्ध न्यायके अनुसार उचित होनेसे व्यक्तिगत भूमि, सम्पत्ति आदिका समर्थन करते हैं । इसी तरह आस्तिकपक्ष- का राजाओंके एकतन्त्र शासनसे न विरोध है और न आधुनिक लोकतन्त्रके साथ कोई राग है। धर्म-नियन्त्रित एकतन्त्र-शासन भी लाभदायक होता है । धर्म- नियन्त्रित होनेसे ही लोकतन्त्र या प्रतिनिधितन्त्र लाभदायक हो सकता है । उच्छृङ्खल, धर्मशून्य, रावण, वेन आदिका एकतन्त्र भी हानिकारक हुआ था । वैसे उच्छृङ्खल लोकतन्त्र आजकल भी देशके लिये खतरनाक है । शास्त्रोंके अनुसार कोई भी कार्य विचारशील ईश्वर, महर्षियों, बुद्धिमान् व्यक्तियो अथवा व्यक्तिसमूहोकी गम्भीर विवेचनाओ एवं लोकहित भावनाओसे होता है । भले कामोंका मूल भले विचार, भली प्रेरणाएँ तथा सावधानी और बुरे कामोंके मूल कारण बुरे विचार, बुरी प्रेरणाएँ एवं प्रमाद आदि होते हैं । इस तरह सिद्ध है कि बुद्धिपूर्वक कार्यकारी पुरुष विचारपूर्वक ही कोई कार्य करता है। शास्त्र भी 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' ( ब्रह्मसूत्र १।१।५) इत्यादि सूत्रोसे कहते हैं कि जड प्रकृतिसे विलक्षण विश्वका निर्माण नहीं होता, क्योकि विलक्षण कार्य ईक्षण अर्थात् विचारपूर्वक होता है । जड प्रकृतिमें विचारशक्ति नहीं है । अतः वह विश्वसृष्टिका स्वतन्त्र कारण नहीं है । प्रत्यक्ष, अन्वय-व्यतिरेकसिद्ध चेतनोंके सावधानी एवं प्रमादके आधारपर होनेवाले कार्योंकी भलाई-बुराईका प्रत्यक्ष कार्यकारण-भाव छोड़कर अचेतन भौतिक अवस्थाओके अनुसार यन्त्रसंचालित ढंगसे घटनाओंका परिवर्तन मानना सर्वथा निराधार है । एक तरफ बुद्धिसङ्गत ईश्वर-प्रेरणा, शुभाशुभ कर्मरूप प्रारब्ध या दैवकी प्रेरणाको अन्धविश्वास बतलाना और दूसरी तरफ बुद्धिपूर्वक चेतनद्वारा होनेवाले कार्योंको यन्त्रसचालित ढगसे भौतिक अवस्थाओं या भौतिक ऐतिहासिक प्रभावोंका परिणाम मानना, यह कितनी उपहासास्पद वात है ? यदि चेतन प्राणी अपना, और समाजका लौकिक- पारलौकिक हिताहित सोच-विचारकर बुद्धिपूर्वक कार्य नहीं करता, किसी भौतिक
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४३५ प्रवाहके परतन्त्र होकर ही कार्य करने एवं सोचनेको बाध्य होता है', तो फिर व्यक्तियों या समूहोंका गुण दोष क्यों माना जाय ? फिर तो कानूनोंके द्वारा किन्हीं गुणोंका विधान या निषेध भी क्यों होना चाहिये ? कोई भी विधान एवं निषेध स्वतन्त्रके लिये ही सम्भव होता है । लोहशृङ्खलासे निगडित हस्तपादादियुक्त व्यक्तिको जलादि लानेके लिये कौन बुद्धिमान् आदेश देगा ? ऐसे ही बलात् नियोजित कार्यसे किसीको कोई कैसे रोक सकता है, तथा विहिताकरण, निषिद्धा- नुष्ठानके लिये दण्ड एव शुभानुष्ठानके लिये पुरस्कारकी व्यवस्था कौन करेगा ? 'स्वतन्त्रः कर्त्ता' पाणिनिके इस सूत्रके अनुसार-'कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ' को ही कर्ता कहा जाता है। अश्वसे चलने, पाँवसे चलने या न चलनेमे जो स्वतन्त्र होता है, वही कर्ता होता है । उसीके लिये अश्वसे जाना चाहिये या पैरसे जाना चाहिये यह विधान तथा अश्वादिस न चलना चाहिये यह निषेध सार्थक होता है । उसीके लिये दण्ड एवं पुरस्कारकी व्यवस्था होती है । भूत, भौतिक अवस्था तथा उसका प्रवाह सब-के-सब जड ह । वे अपने-आपको नहीं जानते । समाजका हानि-लाभ सोच नहीं सकते । प्रेरणा भी कर नहीं सकते । फिर उनके आधारपर किन्हीं भी घटनाओं, प्रवृत्तियो या आन्दोलनोंको मानना कहाँतक उचित है ? प्रवाह प्रवाहीसे भिन्न नहीं होता । जैसे पिपीलिकाओसे भिन्न पिपीलिकाओं- की पङ्क्ति नहीं होती, सैनिकोसे भिन्न सेना नहीं होती, एक-एक वृक्षोंसे भिन्न वन नहीं होता, वैसे जड भूतोंसे भिन्न उसका प्रवाह भी नहीं होता है । साथ ही जट भूतोंमें या उनके प्रवाहमें विचार्यकारिता भी नहीं होती । अतः उनके परतन्त्र चेतन बुद्धिमान्को कार्य करने एव सोचनेको बाध्य होना पड़े, यह असंगत है। अवश्य सम्पत्तिया विपत्तिके रूपमें आनेवाली भूत या भौतिक घटनाएँ विचारणीय होती हैं। विचारशील शक्तिशाली प्राणी शक्ति रहनेपर भूतो या भौतिक घटनाओको अनुकूल बनाता है, शक्ति न रहनेपर लाचारीसे सहन करता है । यदि प्रवाह-परतन्त्र ह सब घटनाएँ हों तो भलाई-बुराईका उत्तरदायित्व भी चेतन व्यक्तियों या समुदायपर न होना चाहिये और न तो उन्हें उसका फल ही भोगना चाहिये । फिर तो किसी परिस्थितिके अनुसार ही हिटलर एव उसके साथियोका जन्म हुआ, युद्ध छिड़ा एव अभूतपूर्व विश्वव्यापी सग्राम हुआ । फिर उसके साथियोंको युद्धा- पराधी बनाकर फाँसीपर लटकानेका क्या अर्थ है ? कहा जाता है, गान्धीजी बडे प्रभावशाली थे । फिर भी उनके यन्त्रीकरण- के विरुद्ध खद्दर आदिकी योजना प्रवाहविरुद्ध होनेसे सफल नहीं हुई । पर इससे यही क्यो न माना जाय कि उस योजनाके पीछे जितनी शक्ति अपेक्षित थी, गान्धीजीके पास उतनी शक्ति न थी । इसके विरुद्ध यह भी कहा जा सकता है कि
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बढ़े-चढ़े बौद्ध-धर्मको रोकनेके लिये कुमारिल एवं शंकराचार्य सफल हुए । अतः चेतन शक्तिशाली पुरुष भौतिक प्रवाहको मोड़ते हैं, वे प्रवाहमें नहीं बहते । इसी- लिये भारतीय सिद्धान्त है कि 'कालो वा कारणं राज्ञः राजा वा कालकारणम् । इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम् ॥ (महा०) काल राजाका कारण है या राजा कालका कारण है, यह संशय नहीं होना चाहिये—राजा ही कालका कारण होता है । काल प्रवाह, भौतिक प्रवाह या इतिहासचक्रको चेतन प्राणी, राजा, विशिष्ट महापुरुष तथा ईश्वर अवश्य ही बदल सकते हैं । कहा जाता है कि 'उत्पत्ति और समाजका एक रूप नष्ट होता है तो उसका स्थान दूसरा रूप ले लेता है। इस क्रान्तिकारी परिवर्तनका कारण दो प्रकारके घटना- समूह होते हैं । दोनों यद्यपि कभी संयुक्त रूपसे दिखायी देते हैं, फिर भी दोनों- पृथक् रूपसे काम करते हैं । इनमें एक यन्त्र विद्यासम्बन्धी है, जिसके फलस्वरूप उत्पादन-शक्तियोंमें परिवर्तन होता है । दूसरा घटनासमूह व्यक्तिसम्बन्धी है, जिसका सम्बन्ध सामाजिक वर्गों और दलोंसे होता है । काम करनेवाले मजदूरोंकी बढ़ती हुई दक्षता, नवीन कच्चे माल और बाजारोंका अन्वेषण, माल बनानेकी नवीन पद्धति, औजारों और मशीनोंका आविष्कार व्यापार तथा विनिमयके अधिक उत्तम संघटनके फलसे जब उत्पादक शक्तियोंकी वृद्धि हो जाती है और समाजका भौतिक आधार अथवा आर्थिक नींव बदल जाती है, तब उत्पत्तिकी पुरानी प्रणालीसे माल तैयार करनेका पुराना तरीका लाभदायक नहीं रह जाता; क्योंकि माल बनानेका पुराना तरीका, पुराने सामाजिक विभाग, पुराने कानून, पुरानी शासनसंस्थाएँ, पुराने विद्यासम्बन्धी सिद्धान्त (ऐसी उत्पादक शक्तियोंके अनुकूल जो या तो लुप्त हो चुकी हैं या लुप्त हो रही हैं) रह नहीं जाते ? अतः अब वह समाजरूपी भवन उसकी आर्थिक दशारूपी नींवके सदृश नहीं रह जाता । इस प्रकार उत्पादक शक्तियाँ और उत्पत्तिकी प्रणाली एक दूसरेके विरुद्ध हो जाती हैं । प्राचीनता, नवीनताका यह विरोध धीरे-धीरे मनुष्यके विचारोंपर प्रभाव डालता है । मनुष्य एक नवीन युगका आरम्भ अनुभव करने लगता है । इस घटनासे समाजका संघटन भी बदलने लगता है । जो वर्ग पहले तुच्छ समझे जाते थे, वे ही महत्त्वपूर्ण और सम्पत्तिके स्वामी बन जाते हैं । जिन वर्गोंकी पहले प्रधानता थी, उनका पतन होने लगता है । इस प्रकार समाजके मूल आधारमें परिवर्तन होनेसे प्राचीन धार्मिक, कानूनी, दार्शनिक और राजनीतिक प्रणालियाँ पहले तो अपने अस्तित्व कायम रखनेके लिये हाथ-पैर मारती हैं, परंतु समय-परिवर्तनके कारण वे अव्यव- हार्य और निकम्मी हो जाती हैं, लोगोंके उपयोगार्ह नहीं रह जातीं । मनुष्योंके विचार भी प्रायः परिवर्तनविरोधी स्थितिपालक होते हैं, पर फिर वे भी धीरे-धीरे घट- नाओंका अनुसरण करने लगते हैं । महान् विचारक उत्पन्न होते हैं, वे नवीन परिस्थितिका रहस्य समझाते हैं । उसके अनुसार नवीन भावनाओं, विचारधाराओं-
का जन्म देते हैं। फिर मनुष्योमें विवेक जाग्रत् होता है। संदेह और प्रश्नोकी परम्परासे नवीन सत्य सिद्धान्तोका उदय होता है। फलस्वरूप मतभेद, वादविवाद, फूट, वर्गकलह और क्रान्ति उत्पन्न होती है।' पूर्वके तर्कोंसे ही उपर्युक्त मार्क्सीय मन्तव्यका भी खण्डन हो जाता है। उनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि काल या परिस्थिति एव भौतिक अवस्थाओके कारण सिद्धान्तोमें परिवर्तन नहीं हो सकता। पैदल चलने, बैलगाडियोंद्वारा चलने एवं वायुयानद्वारा चलनेके जमानेमें भले ही भेद हो गया हो, परंतु उनमें रहने- वाले नित्य आत्मा एव परमेश्वरमें भेद नहीं हो गया। इस तरह चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल, नक्षत्रमण्डल, आकाशमण्डलमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। अग्निका दहन, प्रकाशन-धर्म, पृथ्वीके अन्नादि उत्पन्न करनेके स्वभावमें रद्दोबदल नहीं हुआ। अग्नि, सूर्य, वायु एव आकाशके धर्ममे रद्दोबदल नही हुआ। चन्द्रमाके घटने बढने एव तदनुसार समुद्रके ज्वारभाटेमें भी रद्दोबदल नही हुआ। भोजनसे भूख मिटानेके सिद्धान्तमें, पानीसे प्यास बुझानेके सिद्धान्तमें, सन्तानोत्पादन कार्यादिमें भी उल्लेख्य परिवर्तन नही हुआ। अतएव सत्य-अहिंसा, स्तेयादि धर्मो- का भी महत्त्व घटा नहीं है। मशीनो एव बड़े-बडे कलकारखानोंके बननेसे या मज- दूरोमें कार्यक्षमता, दक्षता बढ जानेसे सम्पत्तिमें, सुख-सुविधा आदिमें वृद्धि हो जानी अलग बात है, परंतु इससे धार्मिक, दार्शनिक या राजनीतिक सिद्धान्तोमें अन्तर पड़नेका कोई भी कारण नही है। पुनश्च आधुनिक लोगोके मतानुसार जो छः हजार वर्षके भीतर ही ससारका ऐतिहासिक एव प्रागैतिहासिक काल मानते हैं, उनके लिये यह भले ही कोई नवीन अद्भुत विकास हो, परंतु जो अरबो वर्षकी दुनिया मानते हैं, वे लाखो वर्ष पहले महायन्त्रोका निर्माण करके उनका दुष्प- रिणाम भी जान चुके हैं। अतएव उनके निर्माणको पाप तथा अवैध घोषित कर चुके हैं। रामायणके पुष्पकयान तथा देवताओके दिव्य विमानोका मुकाबला करनेमें आजके विमान कुछ हैं ही नहीं। कथासरित्सागर, बृहत्कथामें वर्णित विमानोका भी आधुनिक विमान मुकाबला नहीं कर सकते। उनमें एक कीलके दबानेसे एक बारकी उड़ानमें आठ हजार योजनतक जानेकी क्षमता थी, खतरेकी तो तो कोई सम्भावना थी ही नहीं। यन्त्रचालित नगर एव बाजार आदिको और उनके शासन आदिकी सम्पूर्ण व्यवस्था एक कारीगरके हाथमे होना कितना महत्त्वपूर्ण आविष्कार था*।
- राजा भोजके पास एक काष्ठमय अश्वाकार यन्त्र था, जिसकी एक घडीमें ११ कोसकी गति थी—'घट्येकया क्रोशदशेकनञ्च सुकृत्रिमो गच्छति चारुगत्या। वायु दधाति व्यञ्जन सुपुष्कल विना मनुष्येण चलत्यजस्रम् ॥' (समरा० सूत्र०)। उज्जैनके राजा प्रद्योतने राजा उदयनको फँसानेके लिये एक यन्त्रमय हाथी बनाया था, जिसपर
४३८ मार्क्सवाद और रामराज्य महाभारतके ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, पाशुपतास्त्र-जैसे अस्त्र-शस्त्रोंकी बराबरी आजकलके हाईड्रोजन बम आदि भी नहीं कर सकते हैं। वे अस्त्र प्रयुक्त किये जाते थे, साथ ही मध्यसे ही लौटाये भी जा सकते थे और पाशुपतास्त्र तो क्षण- भरमें ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंका संहार कर सकता था। धन, रत्न, मणियोंकी कमी रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर आदिके राज्यमें न थी। उनकी बुद्धि, शक्तिकी भी आजके लोगोंसे तुलना नहीं की जा सकती। विश्वकर्मा, मय एव नल- नीलकी कारीगरी, हनुमान्, अंगद, वालि, अर्जुन, भीमकी शक्तिका आज कौन बराबरी कर सकता है ? तथापि उन लोगोंने अपौरुषेय शास्त्रों एव तदाश्रित धर्म, दर्शन एव आर्ष नीतियोंमें कोई परिवर्तन आवश्यक नहीं समझा एवं आज भी जिन अमेरिका आदि राष्ट्रोंने पचासो तल्ले ऊँचे भवन बनाये, पंद्रह सौ मील प्रति घंटे चलनेवाले वायुयान बनाये, परमाणु बम, हाईड्रोजन बम-जैसे शस्त्रास्त्र बनाये हैं, वे भी ईसाईमतकी ही पुकार मचा रहे हैं, धर्म एव ईश्वरका सम्मान ही कर रहे हैं। मार्क्स एवं इतिहास मार्क्सवादी समाजके विचारों, सिद्धान्तो तथा राजनीतिक संस्थाओको समाज- की सत्ता और उसकी भौतिक परिस्थितियोके ही अनुकूल मानते हैं और समाजकी सत्ता एव भौतिक परिस्थितियाँ उनके मतमें उत्पादन-शक्तियो तथा उत्पादन- सम्बन्धोंपर निर्भर रहती हैं। इन्हीपर समाजका ढाँचा स्थिर होता है। दास- युगमे सामाजिक रीतियाँ अन्य युगोंसे भिन्न थीं। यही बात सामन्तवादी तथा ६० योद्धा बैठते थे (कथासरित्सागर)। भरद्वाजकृत अंशबोधिनीके 'शक्त्युद्गमाद्यष्टौ' इस सूत्रकी 'बौधायनवृत्ति' में शक्त्युद्गम आदि आकाशगामी विमानके आठ प्रकार इस तरह बतलाये गये हैं—(१) शक्त्युद्गम (बिजलीसे चलनेवाला), (२) भूतवाह (अग्नि, जल, वायुसे चलनेवाला), (३) धूमयान (वाष्पसे चलनेवाला), (४) शिखोद्गम (तेलसे चलनेवाला), (५) अंशुवाह (सूर्यकिरणोंसे चलनेवाला), (६) तारामुख (उल्कारस अर्थात् चुम्बकसे चलनेवाला), (७) मणिवाह (चन्द्रकान्त- सूर्यकान्त आदिसे चलनेवाला) और (८) मरुत्सख (केवल वायुमे चलनेवाला)। पुष्पकविमानका वर्णन वाल्मीकिरामायणमें सुप्रसिद्ध है—'ब्रह्मणोऽर्थे कृतं दिव्यं दिवि यद् विश्वकर्मणा । विमानं पुष्पकं नाम सर्वरत्नविभूषितम् ॥' 'भागवत'में शाल्वके विमान- का भी वर्णन इन शब्दोंमें आया है—'स लब्ध्वा कामगं यानं तमोधाम दुरासदम् । ययौ द्वारवतीं शाल्वो वैरं वृष्णिकृतं स्मरन् ॥ क्वचिद् भूमौ क्वचिद् व्योम्नि गिरिमूर्धनि जले क्वचित् ।' (१०।७६।८, २२) कुबेरका पुष्पकयान, कर्दमका दिव्ययान और शाल्वका विमान जल, स्थल, पर्वत तथा आकाशमें सर्वत्र चलता था। शुक्रनीतिके चौथे अध्यायमें तोप-बन्दूक आदिका विशेषरूपसे उल्लेख है—'नालिकं द्विविधं ज्ञेयं बृहत् क्षुद्रविभेदतः । तिर्यगूर्ध्वच्छिद्रमूलं नालं पञ्चवितस्तिकम् ॥ मूलाग्रयोर्लक्ष्यभेदि तिलविन्दुयुतं सदा । यन्त्राघाताग्निकृद् द्रावचूर्णदृक्तकर्णकम् ॥ शुक्रनी० ४।१०२८-२९)।'
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पूँजीवादी युगके लिये भी कही जा सकती है। इन भिन्नताओंका कारण उत्पादन- शक्तियाँ और उत्पादनके सम्बन्ध हैं। मार्क्सने कहा है कि 'मनुष्यकी सत्ता उसकी चेतनाद्वारा नहीं निश्चित होती; किंतु उसकी चेतना ही सामाजिक सत्ताद्वारा निश्चित होती है।' अध्यात्मवादी रामराज्यमें विचारशील, सावधान मनुष्य शास्त्र तथा शिष्ट सज्जनोंके समागमसे सच्छिक्षा, सद्बुद्धि एवं सदिच्छा प्राप्त करके तत्परतासे सत्प्रयत्न करता है और सत्फलका भागी होता है। सत्प्रयत्नद्वारा चेतन प्राणी समाजकी सत्ता एवं परिस्थितियोंमें भी परिवर्तन कर सकता है। उत्पादन-शक्तियों एवं उत्पादन-सम्बन्धोंमें भी विचारवान् मनुष्यने ही परिवर्तन किये हैं और अब भी उसीके द्वारा परिवर्तन किये जा सकते हैं। सामान्य स्थितिमें मनुष्य भी आदत, स्वभाव या प्रकृतिके परतन्त्र होकर ही सब चेष्टा करता है। इसीलिये गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञानवान् प्राणी भी अपनी प्रकृतिके अनुसार ही चेष्टा करता है। सभी प्राणी प्रकृतिका ही अनुसरण करते हैं, उसमें किसीका निग्रह कुछ नहीं कर सकता—'सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥' (३।३३) भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम्हारा यह उद्योग व्यर्थ है, प्रकृति तुम्हें नियुक्त करेगी। मोहवश जो तुम नहीं करना चाहते हो, उसे भी प्रकृति हठात् तुमसे करायेगी—'मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥' 'कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥' (गी० १८।५९ ६०) इत्यादि। परंतु जब शास्त्रोंमें तथा लोकमें भी विधि-निषेध मान्य होते हैं, तब सुतरां यह मानना पडता है कि प्राणी किसी कार्यके करने, न करने या अन्यथा करनेमें स्वतन्त्र होता है। स्वतन्त्र होनेपर ही वह कर्ता होता है, तभी उसके लिये विधि-निषेध सम्भव होते हैं। किसी जकड़े हुए, बँधे हुए, परतन्त्र प्राणीको कोई भी समझदार व्यक्ति किसी कार्यके करनेका आदेश नहीं दे सकता। 'स्वतन्त्रः कर्त्ता' इस पाणिनि-सूत्रकी बात हम पहले लिख ही चुके हैं। (पृष्ठ ४३५)। प्रकृति, स्वभाव, आदत या परिस्थिति सभीके सामने है। यदि सभी परतन्त्र ही हैं, तो प्रकृति या परिस्थितिसे परतन्त्र प्राणीद्वारा होनेवाले अपराधका उत्तरदायित्व उस प्राणीपर नहीं होना चाहिये, अतएव उसे दण्डभागी भी न होना चाहिये। इसी तरह किसी प्राणीसे शुभकर्म बन जानेपर उसे अनुग्रहभागी भी न होना चाहिये, परंतु यह बात लोक तथा शास्त्र सबके विरुद्ध है। इसके अतिरिक्त निम्न दशासे निकलकर उच्चस्थितिकी ओर चलनेका प्रयत्न भी कभी सफल नहीं हो सकेगा। फिर तो जैसी प्रकृति या परिस्थिति होगी, तदनुसार ही प्राणी पतित होने या उन्नत होनेके लिये वाध्य होगा। परंतु यह बात लोकानुभवमें विरुद्ध ही है। गीताचार्य भगवान्ने इसका समाधान
करते हुए बतलाया है कि सामान्यरूपसे इन्द्रियोंका अपने विषयोंमें स्वाभाविक राग-द्वेष होता है । अनुकूल विषयमें राग और प्रतिकूल विषयमें द्वेष होता है । उन राग-द्वेषोंके वश न होना ही पुरुषार्थका सार है अर्थात् राग-द्वेषरूप सहकारी कारणसे युक्त होकर ही प्रकृति प्राणीको स्वानुरूप कार्यमें प्रवृत्त करती है— इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ (गीता ३।३४) काम तथा प्रकृति काम्य—रागवान्को ही काम्यकर्ममें प्रवृत्त कर सकते हैं । काम, प्रकृति भी रागहीन द्वेषास्पद पदार्थमें प्राणीको प्रवृत्त नहीं कर सकते । सिंहकी हिंसा-प्रकृति द्वेषास्पद प्राणियोंकी हिंसामें ही उसे प्रवृत्त करती है, द्वेषानास्पद अपने शिशुकी हिंसामें सिंहकी हिंसा-प्रकृति भी उसे नहीं प्रवृत्त कर सकती । अतः जैसे मृत्तिकासे घट बननेमें जल सहकारी कारण है, जल न रहनेपर मृत्तिकासे घट नहीं बनता, वैसे ही प्रकृतिके प्रवर्त्तनमें राग- द्वेष सहकारी कारण हैं । राग-द्वेषके विघटित कर देनेपर प्रकृति या परिस्थिति व्यर्थ हो जाती है । अतः सच्छास्त्रोंके अभ्यास एवं सत्पुरुषोंके समागमसे आवश्यक, उचित, शास्त्रीय राग-द्वेष बनाकर स्वाभाविक पाशविक राग-द्वेषको विघटित कर देना चाहिये । इससे प्रकृति या परिस्थिति व्यर्थ हो जाती है। यही प्राणीका पुरुषार्थ है । इसीमें प्राक्तन सुकृत एवं ईश्वरानुग्रहका भी उपयोग होता है । इस पुरुषार्थके ही बलपर समाज एवं उसकी परिस्थितियाँ, उत्पादन- शक्तियाँ तथा उत्पादन-सम्बन्ध बनाये-बिगाड़े जाते हैं । अनुचित परिस्थितियोंके विघटन एवं उचित परिस्थितिके सम्पादनमें चेतन प्राणीकी ही स्वाधीनता होती है। व्यवहारमें स्पष्ट ही देखा जाता है कि चेतन अचेतनका गुलाम नहीं है; किंतु अचेतन ही चेतनका गुलाम है । दृष्टानुसारिणी ही कल्पना उचित होती है । इसके अनुसार पुरुषार्थपरायण महापुरुष इतिहासको, परिस्थितियोंको बदलते हैं, वे परिस्थितियोंके दास नहीं होते । किसी भी युगमें दुर्गुण, दुर्व्यवस्था, कुविचार एवं आलस्य प्रमादके परिणाम होते हैं, वे सदा ही त्याज्य माने जाते हैं। सद्विचार एवं तत्परतामूलक किसी भी युगकी अच्छाइयाँ सदा ग्राह्य होती हैं। खलोंके लिये विद्या, धन और शक्ति सदा ही विवादार्थ, मदार्थ, तथा परपीडनार्थ थी, सत्पुरुषोंके लिये उक्त तीनों ही वस्तुएँ सदा ही ज्ञानार्थ, दानार्थ एवं रक्षणार्थ थीं । भूत-संघातमय मनुष्य तथा मनुष्य संघातप्राय समाज सभीकी सत्ता अनन्त, अखण्ड व्यापक बोधसे ही निर्धारित होती है । जड़ स्वयं अपनेको ही सिद्ध नहीं कर सकता, तो फिर उसके द्वारा चेतनकी सिद्धि कैसे कही जा सकती है ? प्रकाशके द्वारा घटादिका निश्चय तो होता है, परंतु घटादिके बलपर प्रकाशका निश्चय कोई बुद्धिमान् व्यक्ति माननेको तैयार नहीं होगा।
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४२१ परिवर्तनके कारण मार्क्सके मतानुसार 'परिवर्तनका कारण न तो भौगोलिक अवस्था ही है न जनसङ्ख्या ही, क्योंकि यूरोप सदियोंसे अपरिवर्तनशील रहा है, फिर भी वहाँ पंचायती व्यवस्था, दासप्रथा, सामन्तवादी, पूँजीवादी व्यवस्था आदि अनेक परिवर्तन हुए । जनसङ्ख्या भारतमें इंग्लैंड, अमेरिकासे अधिक होनेपर भी वहाँ इतने परिवर्तन नहीं हुए ।' स्टालिनका कहना है कि 'ऐतिहासिक भौतिकवादके अनुसार आवश्यक जीवन-साधनोंको प्राप्त करनेकी प्रणाली ही सामाजिक परिवर्तन- की नियामक शक्ति है । व्यक्तिको जीवित रहनेके लिये भौतिक मूल्यों (वस्तुओं) की आवश्यकता पड़ती है । उत्पादनके सिलसिलेमें वह अन्य व्यक्तियोंसे सम्बन्ध स्थापित करता है । यह उत्पादन स्वेच्छापर आश्रित नहीं होता, किंतु उत्पादन- शक्तियोंके रूपपर ही आश्रित रहता है । उत्पादन किसी अवस्थामें देरतक स्थिर नहीं रहता, अपितु विकासकी दिशामें उसका परिवर्तन होता रहता है । उत्पादन-पद्धतिमें परिवर्तन होनेसे सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था, विचारों, राजनीतिक मतों और राजनीतिक संस्थाओंमें परिवर्तन अवश्यम्भावी हो जाता है ।' मार्क्सके शब्दोंमें 'सामाजिक सम्बन्ध उत्पादक शक्तियोंसे जुड़े हुए होते हैं । नयी उत्पादक शक्तियोंके अर्जनमें मनुष्य अपनी उत्पादन-पद्धति बदल देते हैं । अपनी उत्पादन-पद्धति तथा अपनी जीविकोपार्जनकी प्रणाली बदलनेमें वे सभी सामाजिक सम्बन्धोंको परिवर्तित करते हैं । हाथकी चक्कीकी अवस्थामें सामन्तशाही सामाजिक सम्बन्ध व्याप्त होते हैं । भापसे चलनेवाली चक्कीमें वह समाज बनता है, जिसमें औद्योगिक पूँजीपतियोंका प्रभुत्व होता है । सामाजिक प्रगति- में विचारों, सिद्धान्तों, मतों और संस्थाओंका भी स्थान होता है । ये सब भौतिक जीवनपर तो अवश्य आश्रित होते हैं, किंतु इनका सामाजिक शक्तियोंके समेटने, संघटित करनेमें महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । नये विचार, नये सिद्धान्त और नयी भौतिक परिस्थितियोंमें उत्पन्न इनके द्वारा जनसाधारणको भौतिक त्रुटियोंका ज्ञान होता है । यह विचार सामाजिक परिवर्तनमें बहुमूल्य होते हैं । इन्हींके आधारपर जनता उन शक्तियोंका विध्वंस करती है, जो प्रगतिमें बाधक होती हैं ।' अध्यात्मवादी रामराज्यके मतानुसार कोई मौलिक सिद्धान्त एवं विचार नये नहीं होते हैं । असत्का अर्थात् अत्यन्त अविद्यमानका कभी भाव नहीं होता, सत्का अर्थात् विद्यमानका कभी अभाव नहीं होता—'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।' (गी० २ । १६) तिलमें तेल है तभी वह प्रकट होता है । सिकतामें तेल नहीं होता है, अतः लाख प्रयत्न करनेपर भी सिकतासे कभी तेल प्रकट नहीं होता । मार्क्सवादी कुछ प्रादेशिक घटनाओंके आधारपर कार्य-कारण-भाव निश्चित
करते हैं और उन्हींके आधारपर सिद्धान्त गढ़ते हैं । परंतु घटनाएँ अनुकूल-प्रतिकूल, इष्ट-अनिष्ट दोनों ही ढंगकी होती हैं। चोरी, हिंसा, दुराचार आदिका भी कभी विकास होता है, उसमें भी क्रम होता है, फिर भी वह सिद्धान्त नहीं बन जाता । व्यक्तिगत रूपसे तथा समाजगतरूपसे कभी विकास होता है और कभी ह्रास भी होता है, इसीमें प्रमाद एवं पुरुषार्थका उपयोग होता है । जिस मजदूर-समाजको मार्क्सने विकासोन्मुख माना है, उसकी ही अनुभूयमान हालत बहुत ही चिन्तनीय है । मशीनयुगके कारण बेकारीकी भी समस्या खड़ी हुई समझी जाती है । विद्या- बुद्धिका भी विकास नहीं कहा जा सकता है । फिर भी मार्क्स सर्वहाराका राज्य अवश्यम्भावी कहता है । वह किसानको उदीयमान वर्ग नहीं मानता था । परंतु चीनकी क्रान्तिमें किसानवर्ग उदीयमान वर्ग सिद्ध हो गया । यदि इसी प्रकार किसी अन्य वर्गका उदय हो जायगा तो मार्क्सकी अन्य भविष्यवाणियाँ भी झूठी सिद्ध हो जायेंगी । मार्क्सकी ऐतिहासिक कल्पनाएँ और तदनुसारी नियम-निर्धारण सहस्रों नहीं सैकड़ों वर्षोंके ऐतिहासिक अनुभवोंके आधारपर हैं, परंतु अध्यात्मवादियोकी धरित्री और उसका इतिहास सहस्रों, लक्षों नहीं अपितु अरबों वर्षोंके हैं । वहाँका यह व्यापक नियम है कि शुभ कर्मोंसे सुख एवं तत्साधनोंकी समृद्धि होती है और अशुभ कर्मोंसे दुःख एवं तत्साधनोंकी समृद्धि होती है । बुद्धिमानी, सावधानी एवं तत्परतासे कर्तव्यपरायण होनेपर समृद्धि बढ़ती है और अविवेक, असावधानी तथा प्रमादसे असमृद्धि बढ़ती है । धन-धान्य-समृद्धि बढ़नेसे जीवनस्तर उन्नत होता है । प्रमादहीन होनेसे समृद्धिके कारण विद्या, विवेक, कला, काव्य, संस्कृतिका विकास होता है । प्रमादयुक्त होनेसे समृद्धिके परिणामस्वरूप अनाचार, दुराचार, भ्रष्टाचारकी वृद्धि होती है । असमृद्धिमें भी प्रमाद होनेपर अनाचार, दुराचार आदि बढ़ते हैं और प्रमादहीन होनेसे असमृद्धि-दशामें भी विद्या, विवेक, तपस्याका विस्तार होता है । विश्वकर्मा एवं मयकी शिल्पकला शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है । 'समराङ्गण-सूत्रधार' के रचयिता भोजका काल ईसाकी १० वीं शतीमें माना जाता है । उस ग्रन्थमें अनेक प्रकारके कला-कौशल, वायुयान आदिका वर्णन मिलता है । राज्यधर तक्षा ( बढ़ई ) के द्वारा निर्मित वायुयान एक कीलके आघातसे आठ सौ योजन चल सकता था । उस तक्षाद्वारा निर्मित यन्त्रमय महानगरके सभी व्यवहार यन्त्रसे ही होते थे, तो भी तत्कालीन लोगोंके विचारों, सिद्धान्तोंमें कोई अन्तर नहीं पड़ा । इसका उल्लेख 'कथासरित्सागर' में मिलता है । 'रामायण' 'महाभारत' के अनुसार बहुत विशाल पुष्पकयान आधुनिक सभी वायुयानोंसे अधिक विशाल, कलापूर्ण, द्रुतगामी तथा निरापद था । ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र आदि अस्त्र-शस्त्रोंका मुकाविला तो आधुनिक हाइड्रोजन बमसे करोड़ोंगुना अधिक घातक अस्त्र बनाया जाय, तो भी नहीं किया जा सकता । तब भी उन
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४४३
ब्रह्मास्त्रादिके निर्माताओंके धर्म, सिद्धान्तों, विचारों, आचारोंमें कोई भी रद्दो- बदल नहीं हुआ । ब्रह्मलोककी दिव्य ब्रह्मपुरीमें, इन्द्रलोककी दिव्य अमरावतीपुरीमें और विष्णुकी दिव्य वैकुण्ठपुरीमे जो विचार, जो सिद्धान्त, जो आचार आदरणीय थे, वे ही परम अकिञ्चन, वल्कलवसनधारी, कन्दमूल-फलाशी, अरण्यवासी, वीतराग महर्षियोंके यहाँ भी माननीय थे । सप्तदीपा मेदिनीके सम्राट् और अकिंचन दरिद्र ब्राह्मणके आचार, विचार, सिद्धान्त, धर्म एक-से ही होते थे । इन्द्रादि देवगणोंके दिव्य विमान, दिव्य भोग तथा दिव्य शक्तिसे सम्पन्न होनेपर भी उनके सिद्धान्तो एव विचारोंमें कोई भेद नहीं होता था । पीछे बतलाया जा चुका है कि प्राचीन कालमें महायन्त्रोका प्रचलन हुआ था, परतु उसके बेकारी आदि दुष्परिणामोंको देखकर ही आस्तिकोंद्वारा उसपर प्रतिबन्ध लगाया गया था। कुछ धनिकोंको शोषक देखकर 'धनवान् होना ही शोषक होनेका कारण है' यह समझना नितान्त भ्रम है। कुछ बलवानोंको अन्यायी, अत्याचारी देखकर 'बलवान् होना अन्यायी होनेमें हेतु है' यह समझना और कुछ विद्वानोंको दुराचारी देखकर 'विद्वान् होना दुराचारी होनेका कारण है' यह समझना निरा भ्रम ही है। यह बतलाया जा चुका है कि सत्पुरुषोके यहाँ धन, बल एव विद्या सर्वथा दान, रक्षण एव ज्ञान-प्रकाशके लिये होती है । जैसे किसी मक्खीको घी हजम न होते देखकर कोई यह कल्पना करे कि घी किसीको हजम नहीं होता, तो यह भ्रम ही है। पानीसे आग बुझती हुई देखकर यदि कोई पानी-जैसी ही वस्तु पेट्रोलसे अग्नि बुझाना चाहेगा तो यह उसकी मूर्खता ही समझी जायगी । इसी तरह किसी राजा या धनवान्को नास्तिक, प्रमादी एव दुराचारी देखकर यदि कोई वैसी व्याप्ति (नियम) बनाना चाहे तो यह उसका भ्रम ही कहा जायगा । चकमक पत्थरसे अग्नि निकाल लेना, अरणिमन्थनसे अग्नि निकाल लेना, दीपशलाका (दियासलाई) से अग्नि निकाल लेना या और भी किसी आधुनिक साधनसे अग्नि निकाल लेना, इनसे अग्निके दाहकत्व, प्रकाशकत्व सिद्धान्तमें कोई अन्तर नही पडता । हाथकी चक्कीसे आटा पीस लेने या यन्त्रकी चक्कीसे आटा पीस लेनेसे भोजन करके भूख मिटानेके सिद्धान्तमें कोई फरक नहीं पडा है, बल्कि आज भी स्वास्थ्यके विचारसे हाथकी चक्कीका आटा श्रेष्ठ समझा जाता है। आज भी अग्निहोत्रके लिये अरणि-मन्थनसे ही अग्नि प्रकट की जाती है । शमशानकी अग्निसे भी चावल पक सकता है और अग्नि- होत्रकी अग्निसे भी भोजन बन सकता है । फिर भी सस्कारकी दृष्टिसे शमशान- की अग्नि अशुद्ध होती है, उससे पकाये गये अन्नको आस्तिक व्यक्ति ग्रहण नही करते । प्राचीन कालमे अनन्त धन-धान्यसम्पन्न विपुल वैभवयुक्त सार्वभौम सम्राट् सामन्त, साधारण व्यापारी एवं किसान तथा उञ्छशिल वृत्तिवाला परम अकिंचन तपस्वी, सभी शास्त्रानुसारी, समान सिद्धान्त और समान विचारके होते रहे हैं ।
४४४ मार्क्सवाद और रामराज्य किसी भी व्याप्तिज्ञानमें अनुकूल तर्क होना आवश्यक है । 'जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ वह्नि होता है' यह व्याप्ति प्रसिद्ध है । परंतु यहाँ भी 'यदि धूम वह्निव्यभिचरित हो जाय तो क्या हो' इस आक्षेपका समाधान यह है कि 'तब धूमको वह्निजन्य न होना चाहिये ।' परंतु धूमकी वह्निजन्यता प्रत्यक्ष ही है । प्रत्यक्ष विरोध ही तर्ककी अवधि है । अनुकूल तर्कके बिना कतिपय स्थलीय सहचार दर्शनमात्रसे व्याप्तिका निश्चय नहीं हो सकता, इस तरह उत्पादन- शक्तियोंका परिवर्तन होनेपर भी विचारों, सिद्धान्तों यथा समाजमे परिवर्तन न हो तो क्या हानि है ? इसका समाधान आवश्यक है । पर इस सम्बन्धमें मार्क्सवादी कुछ भी उत्तर नहीं दे पाते । जिस प्रकार भ्रममें पूर्वप्रमाकी हेतुताका प्रश्न उठता है, अर्थात् पहले सर्पकी प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) होती है, तब सर्पका संस्कार होता है, तभी अज्ञान, सादृश्य, सस्कार आदिसे रस्सीमें सर्प-भ्रम होता है । अतः कहा जा सकता है कि आरोप्य प्रमा आरोपका हेतु है । परंतु यहाँ यह प्रश्न होता है कि आरोप्य प्रमाके बिना ही यदि भ्रम-प्रमा साधारण आरोप्य संस्कारसे ही आरोप हो तो क्या हानि है ? यहाँ अनुकूल तर्क न होनेसे प्रमा और आरोपका कार्य-कारण- भाव सिद्ध नहीं होता । इसी प्रकार विचार एवं सिद्धान्तमें परिवर्तन प्रमाणके आधार- पर होता है । प्रमा किसी भी सम्पत्ति-विपत्ति, अमीरी, गरीबी हालतके परतन्त्र नहीं होती । पुरुषकी परिस्थिति इच्छा या स्वयं पुरुष प्रमापर प्रभाव नही डाल सकते । सहस्रों प्रयत्नोंसे भी प्रमाणजन्य प्रमामें हेर-फेर नहीं हो सकता । प्रमाणकी उपस्थितिमें प्रमेयकी प्रमिति होती ही है, न कोई प्रमितिको रोक सकता है, न कोई उसमें रद्दोबदल ही कर सकता है । प्रमाणमूलक विचारों, सिद्धान्तोंमें और तन्निष्ठ लोगोंके तदनुसारी आचारोंमे कोई हेर-फेर नही हो सकता । हाँ, कई प्रकारकी परिस्थितियाँ ऐसी अवश्य होती हैं जिनमें प्राणियोंका शास्त्र- सम्बन्ध और परम्परा टूट जाती है । तब नये ढंगके अपूर्ण या अर्धपूर्ण विचार अथवा सिद्धान्त उत्पन्न होते हैं। अकालों, दुष्कालों या युद्धोंके कारण किंवा भौगोलिके उथल पुथलके कारण अथवा देशान्तर गमनके कारण प्राचीन शिक्षा तथा सदाचार- परम्पराका सम्बन्ध टूटनेसे फिर विश्रृङ्खलता हो जाती है । जैसे प्राचीन कालके क्षत्रिय लोग विजयके उद्देश्यसे देशान्तरोंमें गये । वहाँ उनका अपने धर्म, संस्कृति- के आचार्यों तथा विद्वानोंसे सम्बन्ध टूट गया । फिर उनके आचारोंमें परिवर्तन हुआ और शिक्षा, विचार तथा सिद्धान्तोंमें परिवर्तन होते होते उनके मूल स्वरूपमे पर्याप्त परिवर्तन हो गया— शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ ( मनु० १० । ४३ ) यह कहाँ जा चुका है कि शिक्षा, समागमके अनुसार ही बुद्धि होती है, तदनुसार ही इच्छा और तदनुसार ही प्रयत्न होता है । प्राणी जैसे लोगोंका सद्भाव करता है, जैसे लेगोंका सेवन करता है और जैसा बननेकी इच्छा करता
है, वैसा ही बन जाता है— यादृशैः संनिविशते यादृशांश्चोपसेवते । यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग् भवति पूरुषः ॥ ( महा० उद्योग० ३६ । १३ ) प्राणी जैसा सङ्कल्प करता है, वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है, वैसा ही बन जाता है— 'यथा क्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत प्रेत्य भवति।' (छान्दो० ३।१४।१) इस तरह सङ्ग एव शिक्षामें परिवर्तन होनेसे जब बुद्धि, विचार, सिद्धान्त तथा कर्ममें परिवर्तन होता है, तब समाजका भी रूप बदल जाता है । सत्समागम, सत्- शिक्षासे सद्बुद्धि, सदिच्छा, सत्कर्म एव सत्समाज बनता है । असत्समागम, असत्- शिक्षासे असद्बुद्धि, असद्-इच्छा, असत्कर्म एव असत्समाज बन जाता है । सत् और असत्का निर्णय प्रत्यक्ष, अनुमान एव आगमके आधारपर ही होता है । कहा जा चुका है कि उत्पादन-साधनोंमें या सम्पत्तिमें रद्दोबदल होनेपर भी प्रमाणजन्य प्रमामें कोई अन्तर नहीं हो सकता है । इसलिये किसी भी स्थितिमें प्रमाणके आधारपर ही सत्-असत्का निर्णय हो सकता है । सत्को असत् और असत्को सत् समझ लिये जानेका कारण प्रमाद है । प्रमाणनिर्णीत सच्छिक्षा तथा सत् समागमसे किसी भी हालतमें सद्विचार, सत्सिद्धान्त, सदिच्छा, सत्कर्म और सत्-समाज एव सद्-व्यक्तिका निर्माण हो सकता है । परन्तु 'मानव- इतिहास प्रगतिका इतिहास है' यह सिद्धान्त इस सम्बन्धमें सर्वथा ही असंगत है । कोई भी समझदार व्यक्ति कह सकता है कि आजकी स्थिति बुद्धि, शक्ति, सद्- भावनाकी दृष्टिसे प्रगति नहीं, किंतु अधोगतिकी ही है । भौतिक बाह्य चमत्कृतिकी चकाचौंधमें चौंधियाया हुआ आजका मानव सत्प्रमाण, सच्छास्त्रसे बहिर्मुख होकर जडयन्त्रका किंकर होकर स्वयं भी जडयन्त्रवत् हो गया है । आध्यात्मिकता, धार्मिकतासे बहिर्मुख होकर, संस्कृति-सभ्यतासे प्रच्युत होकर वह पशुप्राय होता जा रहा है । यदि यही प्रगति है, तो फिर अधोगति क्या है, यह भी विचारणीय है । उत्पादनमे सुविधाके लिये अल्प व्ययमे अल्प श्रमसे अधिक-से-अधिक उत्पादन हो सके, इसके लिये मनुष्योकी प्रवृत्ति हो सकती है । परन्तु उसके साथ सिद्धान्तमे, विचारमें तथा समाजमे भी परिवर्तन हो, यह आवश्यक नहीं है । रामायणके युगमें कई लोग पैदल चलते थे, कई लोग आकाश, समुद्र और पहाड़ोपर समानरूपसे अव्याहत गतिवाले रथसे चलते थे—'उदन्वदाकाशमही- धरेषु वशिष्ठमन्त्रोक्षणजप्रभावात् ।' कई पुष्पकयानसे चलते थे, कई पत्थरोंसे, वृक्षोसे लड़ते थे, कई धनुष-बाणसे, कई भुशुण्डि, शतघ्नि तथा अन्यान्य विविध यन्त्रोसे लडते थे, विविध प्रकारसे काम करते थे । फिर भी उनके विचार, सिद्धान्त सुस्थिर थे, क्षणिक या परिवर्तनशील नहीं थे । महाभारतके आख्यानोंके आधारपर भी यही बात कही जा सकती है । आज भी कितने ही लोग पदाति
४४६ मार्क्सवाद और रामराज्य (पैदल भी चलते) हो, मोटरपर भी चलते हो और वायुयानपर भी चलते हो, तो भी उनके विचारों, सिद्धान्तोंमें कोई भी परिवर्तन नहीं होता है। इतना ही नहीं, कितने ही आधुनिक विचारक अतिप्राचीन वैदिक अध्यात्मवाद एवं धर्म- नियन्त्रित रामराज्यवादको पसंद करते है। अनाग्रह बुद्धिका फल है—'बुद्धेः फलमनाग्रहः।' और तत्त्वका पक्षपात बुद्धिका स्वभाव होता है—'तत्त्वपक्षपातो हि धियां स्वभावः।' जैसे पर्वत, कन्दरामें स्थित लाखो वर्षोंका गाढान्धकार भी प्रदीप- प्रभाके प्रकट होते ही नष्ट हो जाता है, वैसे ही भीषण से-भीषण विपरीत वातावरण- में भी प्रमाणके द्वारा संशय-विपर्ययादिरहित निर्दोष तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता ही है। इसमें चाहे हाथकी चक्कीसे आटा पीसा जाय, चाहे भापकी चक्कीसे। जब किन्ही कारणोसे, परिस्थितियोसे या प्रमादसे सत्समागम, सच्छिक्षामें गडबडी आती है, तब सद्विचार, सत्सिद्धान्तसे प्रच्युति होती है और तभी धार्मिक, सामाजिक अधोगति होती है। यही धर्मग्लानि एवं अधर्माभ्युत्थान कहा जाता है; परन्तु यह अवस्था स्थिर नही रहती है। गीताके आचार्य दार्शनिकशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके अनुसार जब-जब धर्मग्लानि और अधर्मका अभ्युत्थान बढता है, तब-तब परमेश्वर अवतार ग्रहण करके धर्मका प्रतिष्ठापन करते है। इतिहास और व्यक्ति स्टालिनका कहना है कि 'इतिहास विज्ञानको वास्तविक विज्ञान बनाता है तो सामाजिक इतिहासके विकासको सम्राटो, सेनापतियो, विजेताओ तथा शासकोके कृत्योकी परिधिके अन्तर्गत सीमित नही किया जा सकता। इतिहास- विज्ञानके लिये आवश्यक है कि भौतिक मूल्योके निर्माता लाखो, करोडो मजदूरोके इतिहासके चिन्तनको अपना मूल विषय बनाये। द्वन्द्ववादके अनुसार प्रकृतिके सभी बाह्य रूपों एव पदार्थोंमें आन्तरिक असंगतियाँ सहजरूपसे विद्यमान है। इन पदार्थों और रूपोंमें भावपक्ष तथा अभावपक्ष दोनो ही हैं। उनका अतीत है तो अनागत भी है। एक अश मरणशील है तो दूमरा विकासोन्मुख। इन दो विरोधी अंगों—पुरातन और नवीन, मरणशील और विकासोन्मुख, निर्वाण और निर्माण—का सघर्ष ही विकास-क्रमकी आन्तरिक प्रक्रिया है।' इस आधारपर कम्युनिष्ट, मार्क्सवादी सदा ही नवीन एव विकासोन्मुख विचारधारा या दलका साथ देता है, चाहे वह बाह्यरूपसे कितनी ही बलहीन दशामें क्यो न हो। वह कभी पुरातन एव मरणशील विचारवारा या दलके साथ सहानुभूति नहीं रखता, चाहे वह कितना ही समृद्ध दृष्टिगोचर क्यो न हो। इसी पृष्ठभूमिके आधारपर मार्क्सवादियोका कहना है कि 'सर्वहाराके अधिनायकत्वद्वारा नयी सभ्यता, नयी संस्कृतिका जन्म होगा। वह नयी सभ्यता मानवकी सब देनोको ग्रहण करेगी और उन्हे जनवादी रूप देगी। साथ ही विज्ञान एवं उत्पादनकी प्रगतिसे
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नयी मानवताका जन्म होगा ।' कहा जाता है कि 'रूसके परिवर्तनसम्बन्धी साहित्योंसे यह स्पष्ट है ।' वेब दम्पतिका कहना है कि 'रूसके नागरिक उसी जीवनको आदर्श जीवन मानते हैं, जिसका ध्येय बन्धुओंका हित हो, चाहे वे बन्धु किसी भी आयु, लिङ्ग, धर्म या जातिके हों ।' जॉनसनके अनुसार 'ईसाइयोंकी तरह कम्युनिष्ट भी समाज-हितको ही जीवनका लक्ष्य मानते हैं । कम्युनिष्ट ईसामसीहके सच्चे उत्तराधिकारी हैं । सभी धार्मिक नेताओने मानवके सामने जो आदर्श रक्खे हैं, रूसके नागरिक ही उन आदेशोंके अनुसार जीवन-निर्वाह करते हैं ।' इन सबका कारण मार्क्सवादीके मतानुसार 'उत्पादन-शक्तियों एवं उत्पादन- सम्बन्धोंमें परिवर्तन ही है । रूसमें उत्पादन-शक्तियोंपर जनताका राज्यद्वारा एकाधिकार है और उत्पादन सम्बन्ध समाजवादी है । इसीलिये वहीं नयी सभ्यता- का जन्म हो सकता है ।' मेक्सिम गोर्कीके अनुसार 'सोवियेट कारखाना एक समाजवादी शिक्षाकेन्द्र है, न कि पूँजीवादी कमाईखाना ।' जहाँ किसी पक्षविशेषके समर्थनके लिये ही साहित्यिक तैयार किये जाते हैं और इसी ढङ्गका इतिहास गढ़ा जाता है, वहाँके साहित्य एवं इतिहाससे किसी सत्य घटना या सत्य सिद्धान्तका निर्णय असम्भव ही होता है । आजके मार्क्सवादी इतिहासमें भी लाखो, करोड़ों मजदूरो, किसानोंको कोई नहीं पूछता है । हाँ, उनके नामपर कुछ राजनीतिक चालबाजोकी ही इतिहास एव साहित्यमे प्रशसाके पुल बाँधे जाते हैं और उन्हींका स्वागत-सत्कार होता है । लेनिन, स्टालिन आदि ही ऐतिहासिक व्यक्ति कहलाये जाते हैं, मिल-मजदूरो, किसानोंको कौन जानता है ? द्वन्द्ववादी विचार तर्ककी कसौटीपर अव्यभिचरित नहीं निकलते, यह दिखलाया जा चुका है। ह्रास-विकास, निर्वाण-निर्माणके सिद्धान्तकी कहानी नयी नहीं, पुरानी ही है । परन्तु इन सबमे अनुस्यूत, अविनाशी आत्माको भुलाकर इसका दुरुपयोग किया गया है। अनाचार, पापाचार एव अन्याय भी विकासोन्मुख हो सकते हैं, विविध प्रकारके रोग भी विकासोन्मुख होते हैं । सद्भावना, सद्गुण और स्वास्थ्य भी ह्रासोन्मुख एव निर्वाणोन्मुख होते हैं । मार्क्सवादियोके अनुसार विकासोन्मुख- का साथ देकर और ह्रासोन्मुखको दो धक्के देकर उसे शीघ्र ही खतम कर देनेकी कल्पना अवसरवादिता, स्वार्थ-परायणता और दानवताके अतिरिक्त और कुछ नहीं है । फिर तो मरणोन्मुख अपने साथीकी भी सहायता करना मूर्खता ही कही जायगी और फिर चिकित्सा पद्धतिका विकास भी व्यर्थ ही समझा जायगा । इसके अतिरिक्त बाह्यरूपसे बलहीन दशामें विद्यमान व्यक्ति या समूहकी विकासोन्मुखता भी किस तरह विदित हो सकेगी ? मार्क्स तथा लेनिनने किसानोंको विकासोन्मुख नहीं समझा था, परन्तु चीनमें ठीक उसके विपरीत अनुभव हुआ । इसीसे मार्क्सवादी अटकल- का मिथ्यात्व सिद्ध हो जाता है । मार्क्सवादी असंगतियाँ काल्पनिक हैं । वे ऐसी नहीं हैं जिनका समाधान ही न हो । अन्यथा किसी भी व्यक्ति, समुदाय,
४४८ मार्क्सवाद और रामराज्य जीवन या व्यवस्थाको इकाई मानकर उसीमें अन्तर्विरोध या असंगतियोंकी कल्पना करके उसे विकासोन्मुख मानकर आगन्तुक विघ्नोंके हटानेका प्रयत्न न करके उसके विनाशके लिये ही दो धक्के देना ठीक समझा जायगा । फिर तो विनश्वर वस्तु अवसरसे पहले ही नष्ट हो जायगी । यही बात कम्युनिष्ट नेताके शरीर, स्वास्थ्य एवं वर्गहीन समाज तथा नयी सभ्यताके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है । यदि उत्पादन-शक्तियो एवं उत्पादन-सम्बन्धोंके आधारपर नयी सभ्यता, नयी मानवता और नयी संस्कृतिका जन्म हो सकता, तब तो जिस पूँजीवादके द्वारा इन शक्तियोंका विकास हुआ है, पहले उस पूँजीवादका ही इसके द्वारा कल्याण होता और फिर वे सद्गुण जिनकी कल्पना कम्युनिष्टोंमें की जा रही है, पूँजीवादमें भी हो सकते थे । अतः 'यन्त्रों, मशीनो एव उत्पादनके बढनेसे मनुष्यता तथा सद्गुण बढ़ जायँगे' यह कल्पना आकाशकुसुम-जैसी ही है। यदि ऐसा ही होता तो मानवता-सम्पादनार्थ बडे-बड़े धनपति, कुबेरपति एवं सम्राट् धन तथा साम्राज्य छोड़कर अकिंचन बनकर अरण्यवासी होनेका प्रयत्न न करते । वेव दम्पति तथा जॉनसनकी दृष्टिसे रूसी कारखाने समाजवादी शिक्षाके केन्द्र हैं और रूसके नागरिक ईसाके उत्तराधिकारी हैं। परंतु भूतपूर्व विभिन्न देशोंके प्रसिद्ध कम्युनिष्टोंद्वारा ही लिखे हुए उनके अनुभवोंके संकलन—'पत्थरके देवता' पुस्तक—पढनेसे तो रूसी नागरिकोंका दूसरा ही रूप मालूम पडता है । हंगरी तथा पोलैंडकी घटनाओंने तो तथाकथित रूसी कसाईखानेको भी विश्वके सम्मुख रख दिया। कम्युनिष्ट अपने दलके सदस्यों या स्वमतसे अविरुद्ध लोगोंके लिये भले ही कुछ करते हो, परंतु उनसे मतभेद रखनेवालोंको रूसमें जीवित रहनेका भी अधिकार नहीं है। कितने ही वैज्ञानिकोंको इसलिये मौतके घाट उतार दिया गया कि उनके सिद्धान्तोंमें कुछ चेतन कारणवादकी झलक आती थी । कम्युनिष्ट कहते हैं कि 'रूसमें दूसरी पार्टी इसलिये आवश्यक नहीं है कि वहाँ कोई दूसरे वर्ग हैं ही नहीं, फिर उनका प्रतिनिधित्व करनेवाली पार्टीकी क्या आवश्यकता है ? कम्युनिष्ट- सरकारविरोधी विचार व्यक्त करना रूसमें राष्ट्रविरोधी विचार प्रकट करना समझा जाता है।' परंतु यह स्पष्ट है कि जब गैर-सरकारी विचार व्यक्त करनेका किसीको अधिकार ही नहीं है, तब फिर यह मालूम भी कैसे हो कि रूसमें मतभेद, वर्गभेद है या नहीं ? फिर यदि वहाँ मतभेद है ही नहीं तो प्रबल पुलिस एवं गुप्तचर-विभाग वहाँ किस लिये है और वर्गसफाया फिर किसका होता है ? राष्ट्रीयताका भाव मार्क्सवादके अनुसार 'राष्ट्रयता भी पूँजीवादसे ही सम्बन्धित है । यूरोपमें पूँजीवादके साथ-साथ राष्ट्रियताका उदय हुआ था । व्यापारिक स्पर्धाके फल- स्वरूप पूँजीपतियोंमें राष्ट्रियताकी चेतना जागरित हुई । १५ वीं सदीमें व्यापारियो और मल्लाहोंके प्रोत्साहनद्वारा यूरोपके देशोंने अन्य महाद्वीपोंकी खोज की,
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४४९ अंग्रेजोंने भारतवर्षमें व्यापारिक, राजनीतिक अधिकार स्थापित किया। अन्य देशों- के व्यापारियोंने व्यापारिक सुविधा प्राप्त न होनेके कारण अपनेको पिछड़े हुए देशके नागरिक समझा, इसलिये उन्होंने ब्रिटेन-जैसे समृद्ध देशोंके मुकाबलेके लिये अपने राष्ट्रको सुदृढ बनाया। राष्ट्रीयताकी भावनाका जिसका कि जन्म १४वीं शतीमें हुआ था, उन्होंने उपयोग किया। इसी स्पर्धाके फलस्वरूप राष्ट्रीयताने उग्र रूप धारण किया। स्टालिनके मतानुसार 'पूँजीपति राष्ट्रीयताका पाठ बाजारमें ही सीखता है।' उसके अनुसार भाषा, प्रदेश, आर्थिक जीवन और संस्कृतिका स्थायी सम्बन्ध राष्ट्रीयताका आधार है। एक राष्ट्रमें इन सब विशेषताओंका होना आवश्यक है। इस दृष्टिसे इजराइलके यहूदी राष्ट्र बने। इसके पहले यहूदियोंका कोई एक राष्ट्र नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि वे यूरोपके भिन्न देशोंमें फैले हुए थे। मध्यकालीन साम्राज्योंको भी राष्ट्र नहीं माना जाता था। सिकंदरका साम्राज्य या अन्य साम्राज्य भी राष्ट्रके रूपमें नहीं थे। राष्ट्रीयताकी आड़में ही आधुनिक साम्राज्योंका जन्म हुआ। इन साम्राज्योंमें भिन्न-भिन्न जातियाँ तथा राष्ट्र हैं। साम्राज्यवादी देश उन जातियों तथा राष्ट्रोंका शोषण करते हैं; फिर भी इस सम्बन्धमें वे अपनेको अधिक सभ्य मानते हैं। जारशाही रूसके साम्राज्यमें कई परतन्त्र राष्ट्र एव जातियाँ थीं। जारशाहीके रूसी शासक इनका शोषण करते थे। यही स्थिति अन्य साम्राज्योंकी भी थी। इन परतन्त्र राष्ट्रोंमे धीरे-धीरे राष्ट्रिय चेतना जागरित हुई, राष्ट्रिय आन्दोलन आरम्भ हुए और इनका नेतृत्व पूँजीपतियोंने किया। १९वीं शतीमें यूरोपने और बीसवी शतीमें एशियाके राष्ट्रोंने ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, आस्ट्रिया, हगरी, तुर्की आदिसे मुक्त होनेके लिये आन्दोलन छेडे। रूसकी बोल्शेविक पार्टीने कहा कि 'जबतक साम्राज्यवादका अन्त नहीं होता तबतक राष्ट्रीयताका प्रश्न हल नहीं हो सकता।' कहा जाता है कि १९१७ की रूसी क्रान्तिके पश्चात् सोवियतराज्यकी स्थापना हुई। जारशाही साम्राज्यके सभी राष्ट्रों एव जातियोंको आत्म-निर्णयका अधिकार मिला। कम्युनिष्ट पार्टीके अनुसार पूँजीवादी शोषणके साथ सभी प्रकारके शोषणका अन्त होना आवश्यक था। राष्ट्रिय-शोषण भी एक प्रकारका शोषण ही है। प्रत्येक राष्ट्रको सोवियत समाजवादीमत तथा संघमें रहने तथा न रहनेकी स्वाधीनता मिली। धीरे-धीरे साम्राज्यके अन्य राष्ट्रों एव जातियोंने सोवियत-संघकी सदस्यताके पक्षमें निर्णय किया। आत्म-निर्णयके साथ-साथ प्रत्येक राष्ट्रको सास्कृतिक स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। स्टालिनका आदेश था कि 'कोई भी कम्युनिष्ट किसी परतन्त्र राष्ट्रमें एक शासककी भाँति व्यवहार नहीं कर सकता। पार्टीके सदस्योंको चाहिये कि वे पिछड़े हुए राष्ट्रोंके जागरणमें सहयोग दें।' फलस्वरूप रूसमें निरन्तर सांस्कृतिक उन्नति हो रही है। मार्क्सके मतानुसार 'इस जागरणका मूल कारण शोषणका अन्त ही है।' मा० रा० २९-
४५० मार्क्सवाद और रामराज्य इस सम्बन्धमें भी मार्क्सवादी कल्पना मनगढन्त है । कुटुम्ब, कुल, जाति, सम्प्रदाय तथा समाजके समान ही राष्ट्रकी कल्पना भी प्राचीन है । महा- भारतमें कई स्थलोंमें देशोंके सम्बन्धमें 'राष्ट्र' शब्दका प्रयोग आया है । वेदोंमें भी राष्ट्र शब्दका प्रयोग देशके लिये आता है, जैसा कि—'आब्रह्मन्ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्, आराष्ट्रे राजन्यः ।' (यजु० सं० २२ । २२) । इसीलिये धर्मनियन्त्रित रामराज्य-प्रणालीमें समष्टिके अविरोधसे व्यष्टिके अभ्युदयका विधान है । व्यक्ति कुटुम्बके अविरोधसे, कुटुम्ब कुलके अविरोधसे, कुल ग्रामके, ग्राम प्रदेशके, प्रदेश राज्यके और राज्य विश्वके अविरोधसे आत्मोन्नतिके लिये प्रयत्न- शील हो सकते हैं । कुलके लिये एकका, ग्रामके लिये कुलका और जनपदके लिये ग्रामका त्याग किया जा सकता है—'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥' अवश्य ही व्यक्तिवाद तथा जातिवादके तुल्य ही राष्ट्रवाद या देशवाद भी संघर्षसे ही उग्ररूप धारण करता है । सीमित शक्तिवाले लोग ही यदि सीमित क्षेत्रमें प्रयत्न करते हैं, तो वह प्रभावशाली सिद्ध होता है, अन्यथा समुद्रमें सत्तू घोलनेके तुल्य सीमित प्रयत्न अकिंचित्कर होता है । इसीलिये व्यक्तिगत, कुटुम्बगत, मण्डलगत, राज्यगत एवं राष्ट्रगत उत्तरोत्तर विकसित तथा विशाल प्रयत्न ही सफल होते हैं । 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के अनुसार विश्वके, तथा महाविराट्की उपासनाके अनुसार अनन्त कोटि ब्रह्माण्डात्मा महाविराट्के अभ्युदयके लिये भी प्रयत्न होता है, परंतु उसके लिये विशिष्टरूपसे उच्चकोटिकी भावनाओंका विकास अपेक्षित होता है । धर्मनियन्त्रित रामराज्य-प्रणालीकी सार्वभौम सत्तामें केवल समन्वय एवं सामञ्जस्यकी स्थापनाके लिये ही सार्वभौम सत्ताद्वारा विभिन्न जातियों एवं राष्ट्रोंका नियन्त्रण किया जाता है । फिर भी सभी धर्मों, सम्प्रदायो, जातियों तथा राष्ट्रोंको पूर्ण विकासका अवकाश भी रहता है । उसी सार्वभौम सत्ताके द्वारा राष्ट्रो, जातियो तथा व्यापारियोके संघर्ष रोके जाते हैं । जैसे व्यक्तिगत उन्नतिसे कुटुम्बोकी उन्नति और कुटुम्बोंकी उन्नतिसे ग्रामो तथा नगरो की उन्नति होती है, वैसे ही ग्रामो तथा नगरो- की उन्नतिसे मण्डलो, प्रान्तो एव राज्यकी उन्नति होती है । राज्यो एव राष्ट्रोकी उन्नति विश्वकी उन्नतिमें अपेक्षित होती है । व्यक्तित्व एव कुलीनताका अभिमान अनेक बार प्राणियोको बुरे कर्मोंसे बचाता है । महाभारतमें आख्यान है कि 'एक श्वान किसी महर्षिकी कृपासे वृक ( भेड़िया ), व्याघ्र, सिंह एवं शार्दूलतक बन गया । फिर भी श्वानके सस्कार विद्यमान होनेसे श्वानके स्वभावानुसार उससे ऐसी दुश्चेष्टा हुई कि उसे पुनः श्वान ही बनना पडा ।' इसी तरह एक समय किसी ऋषि ने एक मूपिकाको रूप-यौवनसम्पन्न दिव्य कन्या बना दिया । फिर उसे वर पसन्द करनेके लिये कहा गया । उसने सबसे श्रेष्ठ वर निश्चय करते-करते सूर्यको पसंद किया । फिर सूर्यके आच्छादक बादलको श्रेष्ठ समझा । फिर बादलोको
उड़ानेवाले वायुको, फिर वायुको रोकनेवाले पर्वतोंको और अन्तमें पर्वतोंमें भी बिल कर देनेवाले मूषकको सर्वश्रेष्ठ समझकर उसे ही पति बनाया । निष्कर्ष यह है कि संस्कारोंमें उच्चता धीरे-धीरे आ सकती है, एकाएक नहीं, अतः कुलीनताका बड़ा महत्त्व है । भारतीय राजनीतिज्ञोंने सेनामें कुलीन योद्धाओंका संग्रह आवश्यक बतलाया है । युद्धमन्त्री और प्रधानमन्त्रीकी नियुक्तिमें भी विशिष्टरूपसे कुलीनताका ध्यान आवश्यक बतलाया गया है। यहाँ कुलीनता तथा शालीनताका ध्यान केवल बुरे कर्मोंसे बचनेके लिये ही है, घमण्ड या अभिमानके लिये नहीं । दोषत्याग एवं गुणार्जनके लिये ही गौरवका उपयोग होता है । 'श्रीमद्भागवत'में बतलाया गया है कि 'भगवद्विमुख, विविध गुणयुक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भगवद्भक्त चाण्डाल भी श्रेष्ठ है । भगवद्भक्त चाण्डाल अपने कुलसहित कृतार्थ हो जाता है, परन्तु घमण्डी ब्राह्मण आत्मकल्याण करनेमें भी समर्थ नहीं होता ।' इसी अभिप्रायसे किसी शासकने एक ही अपराधमें पकड़े गये चार अपराधियोंको उनके कुल, संस्कार, योग्यता आदिके अनुसार चार प्रकारके दण्ड दिये । जिसे केवल सामने आते ही छोड़ दिया गया, उसकी न्यायालयसे बाहर निकलते-ही-निकलते हृदयगति अवरुद्ध होकर मृत्यु हो गयी । जिससे यह कहा गया कि 'आप ऐसे, और आपका यह काम !' वह अपने आप फाँसी लगाकर मर गया । जिसे कुछ भला-बुरा कहा गया, वह देश छोड़कर चला गया और जिसे दस बेंतकी सजा दी गयी, वह दस ही दिनोंके बाद पुनः उसी अपराधमें पकड़ा गया । इस तरह कुल, जाति, राष्ट्र आदिके अभिमानसे कुल, जाति एवं राष्ट्रके गौरवस्वरूप आदर्शभूत महापुरुषोंके स्मरणसे, उनके आदर्शोंसे प्रेरणा प्राप्त होती है । हीन पुरुषोंके चिन्तनसे हीन प्रेरणा मिलती है और उत्तम पुरुषोंके चिन्तनसे उत्तम प्रेरणा मिलती है । यह प्रत्यक्ष है कि विशिष्ट संगीत सुनने तथा विशिष्ट संगीतज्ञके दर्शन या माहात्म्य-श्रवणसे संगीतमें प्रवृत्ति होती है । विशिष्ट वीर पुरुषोंकी वीरगाथा सुननेसे मनमें वीरताका सञ्चार होता है । कामिनी-दर्शन या कामकलाके दर्शन, श्रवणादिसे काम-भावना जागरूक होती है । सर्प, व्याघ्रादि भीषण प्राणियोंके दर्शनसे भय उत्पन्न होता है । सत्पुरुषोंके दर्शन, श्रवणादिसे सद्भावना उत्पन्न होती है । परोपकारी, दयालु, देशभक्त आदिके दर्शन, श्रवणसे भी उस-उस ढंगके भाव उद्रिक्त होते हैं । विभिन्न राष्ट्रोंके विभिन्न ऐतिहासिक संस्मरण होते हैं । उनसे विभिन्न महापुरुषों, अवतारों, पैगम्बरों, तीर्थंकरों आदिके विशिष्ट सम्बन्ध होते हैं । वे स्थान, वे देश उन-उन
४५२ मार्क्सवाद और रामराज्य अनुयायियोंके लिये तीर्थभूत होते हैं । मार्क्सवादी भी मार्क्स, एंजिल्सके चित्रों एवं कृतियोंका आदर करते हैं । रूसी लेनिन, स्टालिनका तथा चीनी माओत्सेत्तुंग आदिका दर्शन स्मरण तथा उनकी कृतियोंका आदर करते हैं । इन सबसे उन्हें प्रेरणा मिलती है । भगवान् शिव, विष्णु, भगवान् रामचन्द्र, कृष्णचन्द्र, बुद्ध तथा शङ्कराचार्य आदिसे संस्कारका, विशेषरूपसे भारतभूमिका विशिष्ट सम्बन्ध है। अयोध्या, मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, यमुना, गङ्गा, चित्रकूट, रामेश्वर, द्वारका, जगन्नाथ, उज्जयिनी आदि विशिष्ट तीर्थ माने जाते हैं। इन हेतुओंसे विशिष्ट देशोंमें उन देशवासियोंकी विशिष्ट श्रद्धा होती है। उनकी रक्षा और समृद्धिके लिये उनके द्वारा विशिष्ट प्रकारकी प्रेरणाएँ मिलती रहती हैं। शास्त्रोंमें तो कहा गया है कि जननी और जन्मभूमि स्वर्गसे भी अधिक श्रेष्ठ होती है—'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।' आधुनिक इतिहास बतलाता है कि मार्क्सवादी नीतिके अनुसार बने हुए 'अन्तर्राष्ट्रिय मजदूर-संघ' में यद्यपि १९०७ की स्टाटगार्टकी बैठकमैं यह प्रस्ताव स्वीकृत हुआ था कि 'आगामी होनेवाले महायुद्धोंमे मजदूरोंको भाग न लेकर उनका जोरदार विरोध करना चाहिये और महायुद्धको गृहयुद्धके रूपमें परिणत करके साम्राज्यवादका अन्त करके समाजवादकी स्थापना करनी चाहिये।' इसी प्रस्तावको सन् १९१० की कोपेनहेगेनकी बैठकमे पुनः दोहराया गया । फिर भी १९१४ में जब पहला महायुद्ध प्रारम्भ हुआ, तो सभी देशोंके मजदूरनेता राष्ट्रियताके स्वाभाविक प्रवाहमे बह गये और उन्होने युद्धका समर्थन किया । कहावत है कि 'पहले अपनी ही दाढीकी आग बुझायी जाती है'। दूसरे अन्तर्राष्ट्रिय मजदूर- संघके बहुमतने उपर्युक्त प्रस्तावका उल्लङ्घन किया। फ्रांसके क्रान्तिकारी संघवादी भी इस राष्ट्रियताकी लहरमें बह गये और राष्ट्रियताके आधारपर एक देशके समाजवादी दल दूसरे देशके समाजवादी दलसे खुलकर लडे । १९१९ में अन्त- र्राष्ट्रिय मजदूरसंघकी पुनः स्थापना करनी पड़ी और फिर उसका भी द्वितीय महायुद्ध-कालमें अन्त कर दिया गया, अब 'कोमिन्फार्म' नामकी संस्था बनी। ट्रटस्कीके अनुयायी तो स्टालिन एव रूसको मार्क्सवादी परम्पराके विपरीत समझते हैं और रूसी राज्यमें नौकरशाहीका बोलबाला मानते हैं । अन्य वामपन्थी लोग भी यही समझते हैं कि 'सोवियत रूसने मार्क्सयि विश्वक्रान्तिका मार्ग छोड़ दिया है, उसमें नौकरशाही एवं स्टेलिनशाहीका ही एकाधिकार है; वह दुनियाके प्रतिक्रियावादियोंसे समझौता करके उन्हें प्रोत्साहन देता है।' मार्क्सवादी इतिहासके आधारपर कहते हैं कि 'सर्वहाराका राज्य आनेवाला ही है, स्वागतके लिये तैयार रहो।' अराजकतावादी कहते हैं—'वह राज्यहीन