भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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४५२ मार्क्सवाद और रामराज्य अनुयायियोंके लिये तीर्थभूत होते हैं । मार्क्सवादी भी मार्क्स, एंजिल्सके चित्रों एवं कृतियोंका आदर करते हैं । रूसी लेनिन, स्टालिनका तथा चीनी माओत्सेत्तुंग आदिका दर्शन स्मरण तथा उनकी कृतियोंका आदर करते हैं । इन सबसे उन्हें प्रेरणा मिलती है । भगवान् शिव, विष्णु, भगवान् रामचन्द्र, कृष्णचन्द्र, बुद्ध तथा शङ्कराचार्य आदिसे संस्कारका, विशेषरूपसे भारतभूमिका विशिष्ट सम्बन्ध है। अयोध्या, मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, यमुना, गङ्गा, चित्रकूट, रामेश्वर, द्वारका, जगन्नाथ, उज्जयिनी आदि विशिष्ट तीर्थ माने जाते हैं। इन हेतुओंसे विशिष्ट देशोंमें उन देशवासियोंकी विशिष्ट श्रद्धा होती है। उनकी रक्षा और समृद्धिके लिये उनके द्वारा विशिष्ट प्रकारकी प्रेरणाएँ मिलती रहती हैं। शास्त्रोंमें तो कहा गया है कि जननी और जन्मभूमि स्वर्गसे भी अधिक श्रेष्ठ होती है—'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।' आधुनिक इतिहास बतलाता है कि मार्क्सवादी नीतिके अनुसार बने हुए 'अन्तर्राष्ट्रिय मजदूर-संघ' में यद्यपि १९०७ की स्टाटगार्टकी बैठकमैं यह प्रस्ताव स्वीकृत हुआ था कि 'आगामी होनेवाले महायुद्धोंमे मजदूरोंको भाग न लेकर उनका जोरदार विरोध करना चाहिये और महायुद्धको गृहयुद्धके रूपमें परिणत करके साम्राज्यवादका अन्त करके समाजवादकी स्थापना करनी चाहिये।' इसी प्रस्तावको सन् १९१० की कोपेनहेगेनकी बैठकमे पुनः दोहराया गया । फिर भी १९१४ में जब पहला महायुद्ध प्रारम्भ हुआ, तो सभी देशोंके मजदूरनेता राष्ट्रियताके स्वाभाविक प्रवाहमे बह गये और उन्होने युद्धका समर्थन किया । कहावत है कि 'पहले अपनी ही दाढीकी आग बुझायी जाती है'। दूसरे अन्तर्राष्ट्रिय मजदूर- संघके बहुमतने उपर्युक्त प्रस्तावका उल्लङ्घन किया। फ्रांसके क्रान्तिकारी संघवादी भी इस राष्ट्रियताकी लहरमें बह गये और राष्ट्रियताके आधारपर एक देशके समाजवादी दल दूसरे देशके समाजवादी दलसे खुलकर लडे । १९१९ में अन्त- र्राष्ट्रिय मजदूरसंघकी पुनः स्थापना करनी पड़ी और फिर उसका भी द्वितीय महायुद्ध-कालमें अन्त कर दिया गया, अब 'कोमिन्फार्म' नामकी संस्था बनी। ट्रटस्कीके अनुयायी तो स्टालिन एव रूसको मार्क्सवादी परम्पराके विपरीत समझते हैं और रूसी राज्यमें नौकरशाहीका बोलबाला मानते हैं । अन्य वामपन्थी लोग भी यही समझते हैं कि 'सोवियत रूसने मार्क्सयि विश्वक्रान्तिका मार्ग छोड़ दिया है, उसमें नौकरशाही एवं स्टेलिनशाहीका ही एकाधिकार है; वह दुनियाके प्रतिक्रियावादियोंसे समझौता करके उन्हें प्रोत्साहन देता है।' मार्क्सवादी इतिहासके आधारपर कहते हैं कि 'सर्वहाराका राज्य आनेवाला ही है, स्वागतके लिये तैयार रहो।' अराजकतावादी कहते हैं—'वह राज्यहीन