भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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समाज आ ही गया है, स्वागतके लिये तैयार रहो।' हॉब्स, लॉक, रूसो आदि- की भी एक ऐतिहासिक धारणा थी । कान्ट, ग्रीन, फिक्टे, हीगेल आदिकी दूसरी ही ऐतिहासिक धारणाएँ थीं । मार्क्स, एजिल्सकी अलग ही ऐतिहासिक धारणा है । हॉब्सके मतमें 'राज्यके जन्मसे पहले मनुष्य एक खूँखार जानवरके तुल्य भीषण था।' लॉक एव रूसोके अनुसार 'राज्यके जन्मसे पहले मनुष्य एक श्रेष्ठ स्थितिमें था । फिर वह राज्यके पचड़ेमें क्यो पड़ा ?' इसके भी भिन्न-भिन्न प्रकारके उत्तर हैं । बहुतोंने अनुबन्ध या 'सोशल कन्ट्राक्ट'को ऐतिहासिक कहा और बहुतोंने उसे सर्वथा अप्रामाणिक बतलाया । ये सभी लोग इतिहासका ही नाम लेते हैं। भविष्यके सम्बन्धमें भी ऐसी ही विभिन्न अटकलें हैं। रूसोका सामान्येच्छाका राज्य, ग्रीन, काण्टका आदर्श विश्वराज्य, हीगेलका आदर्श राज्य, मार्क्सका वर्गहीन राज्य, बाकुनिनका राज्यहीन समाज एक स्वप्निल जगत्की ही चीजे रह गयी हैं। फिर भी उनके अनुयायी अंध विश्वास लिये उन्हीं लकीरोको पीट रहे हैं, यद्यपि वे शास्त्रवादियोंको ही अंध विश्वासी मानते हैं। परंतु रामायण, महाभारतका इतिहास समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञापर आधारित है। वह तार, टेलिप्रिन्टरके आधारपर या अटकलोके आधारपर नहीं बना, और न किसी मूर्ति, शिलालेख, स्तम्भो अथवा मुद्राओंके आधारपर ही बना है। इसीलिये रामायण, महाभारतादि इतिहास इतिवृत्तसम्बन्धी पात्रोंके हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित, स्थूल, सूक्ष्म, संनिकृष्ट, व्यवहित—सभी घटनाओका हस्तगत आमलकके समान प्रत्यक्ष आर्ष साक्षात्कार करके ही लिखे गये हैं। इसके अतिरिक्त आधुनिक इतिहासोंकी काल-सीमा छः हजार वर्षकी ही तो है। इसीमें उनका ऐतिहासिक एव प्रागैतिहासिक काल आ जाता है, परंतु रामायणादिकी दृष्टिसे तो वर्तमान सृष्टि लगभग दो अरब वर्षकी है। यदि ससारभरका एक वर्षका इतिहास एक पन्नेमें भी लिखा जाय तो भी दो अरब पन्नेका इतिहास होता है, फिर उसका कितने दिनोंमें अध्ययन हो सकेगा और कौन, कब तथा क्या निष्कर्ष निकाल सकेगा और कब उसे कार्यान्वित किया जायगा ? इतिहासका अभिप्राय भी गड़े मुर्दोंको उखाडनेके तुल्य पुरानी घटनाओंको दोहराना ही नहीं, किंतु उन अतीत घटनाओसे धार्मिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक अभ्युदयोपयोगी शिक्षण ( सबक ) प्राप्त करना ही होता है। अतएव सभी घटनाओ या सभी व्यक्तियोको इतिहासमे स्थान नहीं मिलता और न सबका उल्लेख ही इतिहासमें सम्भव है । कितने ही मनुष्य उत्पन्न होते ह कितने ही