भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मरते हैं, कितनी ही घटनाएँ घटती रहती हैं । उनका इतिहासमें न तो उल्लेख ही होता है और न उल्लेख करना सम्भव ही है । नगरो, ग्रामोंमें मनुष्योके जन्मने-मरनेका लेखा-जोखा होता है, फिर भी पशुओ, पक्षियो, मच्छरोके जन्मने-मरनेका कोई लेखा-जोखा नहीं होता । इतिहासकी दृष्टिमें सामान्य मनुष्यो एवं घटनाओका भी यही हाल है । इतिहासका वर्ण्य विषय मार्क्सवादी कहते हैं कि 'राजाओ, महाराजाओ, वीरपुरुषोका वर्णन करना इतिहासका लक्ष्य न होकर समष्टि जनताकी स्वाभाविक जीवनस्थिति, उत्पादन- साधन और उनके परस्पर सम्बन्ध तथा उनके परिणामोंका निरूपण ही इतिहासका मुख्य विषय होना चाहिये ।' तदनुसार ही मार्क्सवादी प्राथमिक वर्गहीन समाज, फिर मालिक और गुलाम, फिर सामन्त एवं किसान-गुलाम, फिर पूँजी- पति और मजदूर, फिर मजदूर राज्य तथा पुनः वर्गविहीन—समाजकी स्थापनाका इतिहास सिद्ध करके दिखलाते हैं । दूसरे लोग पाषाण-युग, लौह-युग, यन्त्र-युग आदिकी कल्पना करते हैं । इतिहासके गोरखधंधेसे अपने-अपने मतलबकी चीज सभी निकालते हैं, विशेष प्रामाणिक आधार खोजे बिना ही कल्पनाके महल खड़े किये जाते हैं । फिर ये सभी कल्पनाएँ हजार, दो हजार वर्षके इतिहासके भीतर ही हैं । विशेषतः मार्क्सवादी विवेचन अधिकांश रूपसे ४०० वर्षोंकी ही घटनाओपर निर्भर है । लाखो-करोड़ो वर्षोंके इतिहासकी कौन-कौन-सी घटनाएँ आधुनिक कल्पनाओमे साधक हैं, कौन कौन सी बाधक हैं—इससे उनका कुछ भी मतलब नहीं । यही स्थिति अराजकतावादियोकी भी है । घटनाएँ सब सकारण होती हैं । फिर भी सब घटनाएँ परस्पर एक दूसरेकी कारण नहीं होती । कई स्थलोपर तो घटनाएँ अव्यवहित होनेपर भी उनमे कार्य-कारण-भाव नहीं माना जाता । कौवेका बैठना और ताड़का गिरना व्यवधानशून्य होनेपर भी कार्य-कारण सम्बन्धसे शून्य होता है । इसी आधारपर बहुत-सी घटनाओके सम्बन्धोको काकतालीय ही माना जाता है । इसके अतिरिक्त प्राणियो, देश तथा संसारके सौभाग्य-दौर्भाग्य दोनो ही चलते हैं । दौर्भाग्यसे बुरी घटनाएँ और सौभाग्यसे अच्छी घटनाएँ भी घटती हैं । अच्छी घटनाओके मूलमें सौभाग्यके अतिरिक्त सत्प्रयत्नका भी हाथ होता है । बुरी घटनाओमें दुर्भाग्यके अतिरिक्त प्रमाद, आलस्य, दुराचार, दुष्प्रयत्नका भी हाथ रहता है । रावणके हाथो भी बहुत-सी घटनाएँ हुईं । युधिष्ठिर एवं दुर्योधनादिके द्वारा भी अनेक ढंगकी घटनाएँ घटीं । देवो-असुरोसे सम्बन्धित घटनाओंके बारेमें भी यही बात कही