मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐतिहासिक भौतिकवाद ४५५ जा सकती है। बुरी घटनाओंका वर्णन बुरे कामोंसे बचने और सावधान होनेके लिये होता है तथा अच्छी घटनाओंका वर्णन गुणग्रहण एवं प्रोत्साहनके लिये होता है। इसीलिये रामायणके अध्ययनसे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि राम- भरत आदिके समान वर्तना चाहिये, रावणादिकी तरह नहीं। महाभारत पढ़कर यह पाठ सीखना चाहिये कि युधिष्ठिरादिके समान वर्तन करना चाहिये, दुर्योधन आदिके समान नहीं—'रामादिवद् वर्तितव्यं न तथा रावणादिवत् । युधिष्ठिरादिवद् वर्तितव्यं न दुर्योधनादिवत ॥' सदाचार, सद्धर्म, सत्कर्म, सदुद्योग, सद्धनार्जन एव सदुपायोंका शिक्षण ऐतिहासिक सद्घटनाओंसे सीखा जा सकता है। सत्पुरुषोंके भी कुत्सित आचारोंका अनुसरण नहीं किया जा सकता । 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन.' यह स्वभा- वोक्ति है। प्राणीकी स्वाभाविक प्रवृत्ति श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुकरण करनेकी होती है, अतः श्रेष्ठ पुरुषोंको शास्त्रानुसारी सदाचार-पालनका विशेष ध्यान रखना चाहिये । प्राणियोंको भी श्रेष्ठोंके शास्त्रानुसारी सुचरितोंका ही अनुकरण करना चाहिये, दुश्चरितों- का नहीं । इसलिये वैदिक ऋषिने कहा है कि जो हमारे सुचरित हों उन्हें ही तुम आचरणमें लाओ, दुश्चरितोंको नहीं—'यान्यस्माक५ सुचरितानि तानि त्वयो- पास्यानि, नो इतराणि' ( तैत्तिरीयोपनिषद् १ । ११ । २ ) । अध्यात्म-दृष्टिसे विज्ञान-वैराग्यकी विवक्षासे ही विभिन्न महापुरुषोंकी घटनाओंका वर्णन किया जाता है । उक्त प्रयोजनसे भिन्न वाग्विभवसे अन्य कोई परमार्थ नहीं है । श्रीशुकदेवजीने परीक्षित्को बतलाया था कि मैंने जो संसारमें यश फैलाकर स्वर्ग जानेवाले महापुरुषोंकी कथाएँ कहीं हैं, उनका अभिप्राय विज्ञान वैराग्यके प्रतिपादनमें ही है। कितना ही बलवान्, बुद्धिमान्, धनवान्, सम्राट् क्यों न हो, सबको ही कालके गालमें जाना पड़ता है । स्वधर्मानुष्ठान, परोपकार एवं साक्षात्कार ही जीवनका सार है । प्रपञ्चका अधिष्ठान आत्मा ही सत् है । इस प्रकार वैराग्य, विज्ञान- सम्पादनके अतिरिक्त वाग्विभवको छोड़कर कोई परमार्थता नहीं है । हाँ, जगत्कारण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् चेतन भगवान्की कथाओंका वर्णन तो भक्तिके लिये भी उपयोगी है— कथा इमास्ते कथिता महीयसा विताय लोकेषु यशः परेयुषाम् । विज्ञानवैराग्यविवक्षया विभो वचोविभूतीर्न तु पारमार्थ्यम् ॥ यस्तूत्तमश्लोकगुणानुवादः संगीयतेऽभीक्ष्णममङ्गलघ्नः । तमेव नित्यं शृणुयादभीक्ष्णं कृष्णेऽमलां भक्तिमभीप्समानः ॥ ( भागवत १२ । ३ । १४-१५ )