मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहत्त्व गाया है । यह कहना नितान्त मूर्खता है कि 'शास्त्रकार ऋषि धनिकोके एजेण्ट थे । उनके हितोंकी रक्षाके लिये ये लोग पाप-पुण्यके चक्करमे जनसाधारण- को फँसाये रखनेका प्रयत्न करते रहते थे।' भला, जो राजान्नग्रहणको घोर पाप समझते थे, 'कुसूल-धान्यक' ब्राह्मणकी अपेक्षा जो अश्वस्तनिक ( कलके लिये कुछ न रखनेवाले ) ब्राह्मणको ही श्रेष्ठ मानते थे, महात्यागको ही सर्वस्व मानते थे, वे किस प्रलोभनसे ऐसा निष्ठुर कर्म करते ? आज भी तो धनिकवर्ग नास्तिकप्राय है । वह किस भारतीय विद्वान्का सम्मान करता है ? यह वर्ग जितना उच्छृङ्खलो- की पूजा करता है, उतना आस्तिक पक्षकी प्रतिष्ठा करता तो आस्तिक पुरुषों एवं आस्तिक संस्थाओको आर्थिक संकटके कारण कार्य करनेमें बाधा क्यो पडती ? फिर भी शास्त्रविश्वासी शास्त्र, युक्ति एवं लोकसिद्ध न्यायके अनुसार उचित होनेसे व्यक्तिगत भूमि, सम्पत्ति आदिका समर्थन करते हैं । इसी तरह आस्तिकपक्ष- का राजाओंके एकतन्त्र शासनसे न विरोध है और न आधुनिक लोकतन्त्रके साथ कोई राग है। धर्म-नियन्त्रित एकतन्त्र-शासन भी लाभदायक होता है । धर्म- नियन्त्रित होनेसे ही लोकतन्त्र या प्रतिनिधितन्त्र लाभदायक हो सकता है । उच्छृङ्खल, धर्मशून्य, रावण, वेन आदिका एकतन्त्र भी हानिकारक हुआ था । वैसे उच्छृङ्खल लोकतन्त्र आजकल भी देशके लिये खतरनाक है । शास्त्रोंके अनुसार कोई भी कार्य विचारशील ईश्वर, महर्षियों, बुद्धिमान् व्यक्तियो अथवा व्यक्तिसमूहोकी गम्भीर विवेचनाओ एवं लोकहित भावनाओसे होता है । भले कामोंका मूल भले विचार, भली प्रेरणाएँ तथा सावधानी और बुरे कामोंके मूल कारण बुरे विचार, बुरी प्रेरणाएँ एवं प्रमाद आदि होते हैं । इस तरह सिद्ध है कि बुद्धिपूर्वक कार्यकारी पुरुष विचारपूर्वक ही कोई कार्य करता है। शास्त्र भी 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' ( ब्रह्मसूत्र १।१।५) इत्यादि सूत्रोसे कहते हैं कि जड प्रकृतिसे विलक्षण विश्वका निर्माण नहीं होता, क्योकि विलक्षण कार्य ईक्षण अर्थात् विचारपूर्वक होता है । जड प्रकृतिमें विचारशक्ति नहीं है । अतः वह विश्वसृष्टिका स्वतन्त्र कारण नहीं है । प्रत्यक्ष, अन्वय-व्यतिरेकसिद्ध चेतनोंके सावधानी एवं प्रमादके आधारपर होनेवाले कार्योंकी भलाई-बुराईका प्रत्यक्ष कार्यकारण-भाव छोड़कर अचेतन भौतिक अवस्थाओके अनुसार यन्त्रसंचालित ढंगसे घटनाओंका परिवर्तन मानना सर्वथा निराधार है । एक तरफ बुद्धिसङ्गत ईश्वर-प्रेरणा, शुभाशुभ कर्मरूप प्रारब्ध या दैवकी प्रेरणाको अन्धविश्वास बतलाना और दूसरी तरफ बुद्धिपूर्वक चेतनद्वारा होनेवाले कार्योंको यन्त्रसचालित ढगसे भौतिक अवस्थाओं या भौतिक ऐतिहासिक प्रभावोंका परिणाम मानना, यह कितनी उपहासास्पद वात है ? यदि चेतन प्राणी अपना, और समाजका लौकिक- पारलौकिक हिताहित सोच-विचारकर बुद्धिपूर्वक कार्य नहीं करता, किसी भौतिक