भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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ऐतिहासिक भौतिकवाद ४३५ प्रवाहके परतन्त्र होकर ही कार्य करने एवं सोचनेको बाध्य होता है', तो फिर व्यक्तियों या समूहोंका गुण दोष क्यों माना जाय ? फिर तो कानूनोंके द्वारा किन्हीं गुणोंका विधान या निषेध भी क्यों होना चाहिये ? कोई भी विधान एवं निषेध स्वतन्त्रके लिये ही सम्भव होता है । लोहशृङ्खलासे निगडित हस्तपादादियुक्त व्यक्तिको जलादि लानेके लिये कौन बुद्धिमान् आदेश देगा ? ऐसे ही बलात् नियोजित कार्यसे किसीको कोई कैसे रोक सकता है, तथा विहिताकरण, निषिद्धा- नुष्ठानके लिये दण्ड एव शुभानुष्ठानके लिये पुरस्कारकी व्यवस्था कौन करेगा ? 'स्वतन्त्रः कर्त्ता' पाणिनिके इस सूत्रके अनुसार-'कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ' को ही कर्ता कहा जाता है। अश्वसे चलने, पाँवसे चलने या न चलनेमे जो स्वतन्त्र होता है, वही कर्ता होता है । उसीके लिये अश्वसे जाना चाहिये या पैरसे जाना चाहिये यह विधान तथा अश्वादिस न चलना चाहिये यह निषेध सार्थक होता है । उसीके लिये दण्ड एवं पुरस्कारकी व्यवस्था होती है । भूत, भौतिक अवस्था तथा उसका प्रवाह सब-के-सब जड ह । वे अपने-आपको नहीं जानते । समाजका हानि-लाभ सोच नहीं सकते । प्रेरणा भी कर नहीं सकते । फिर उनके आधारपर किन्हीं भी घटनाओं, प्रवृत्तियो या आन्दोलनोंको मानना कहाँतक उचित है ? प्रवाह प्रवाहीसे भिन्न नहीं होता । जैसे पिपीलिकाओसे भिन्न पिपीलिकाओं- की पङ्क्ति नहीं होती, सैनिकोसे भिन्न सेना नहीं होती, एक-एक वृक्षोंसे भिन्न वन नहीं होता, वैसे जड भूतोंसे भिन्न उसका प्रवाह भी नहीं होता है । साथ ही जट भूतोंमें या उनके प्रवाहमें विचार्यकारिता भी नहीं होती । अतः उनके परतन्त्र चेतन बुद्धिमान्‌को कार्य करने एव सोचनेको बाध्य होना पड़े, यह असंगत है। अवश्य सम्पत्तिया विपत्तिके रूपमें आनेवाली भूत या भौतिक घटनाएँ विचारणीय होती हैं। विचारशील शक्तिशाली प्राणी शक्ति रहनेपर भूतो या भौतिक घटनाओको अनुकूल बनाता है, शक्ति न रहनेपर लाचारीसे सहन करता है । यदि प्रवाह-परतन्त्र ह सब घटनाएँ हों तो भलाई-बुराईका उत्तरदायित्व भी चेतन व्यक्तियों या समुदायपर न होना चाहिये और न तो उन्हें उसका फल ही भोगना चाहिये । फिर तो किसी परिस्थितिके अनुसार ही हिटलर एव उसके साथियोका जन्म हुआ, युद्ध छिड़ा एव अभूतपूर्व विश्वव्यापी सग्राम हुआ । फिर उसके साथियोंको युद्धा- पराधी बनाकर फाँसीपर लटकानेका क्या अर्थ है ? कहा जाता है, गान्धीजी बडे प्रभावशाली थे । फिर भी उनके यन्त्रीकरण- के विरुद्ध खद्दर आदिकी योजना प्रवाहविरुद्ध होनेसे सफल नहीं हुई । पर इससे यही क्यो न माना जाय कि उस योजनाके पीछे जितनी शक्ति अपेक्षित थी, गान्धीजीके पास उतनी शक्ति न थी । इसके विरुद्ध यह भी कहा जा सकता है कि