भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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४३६ मार्क्सवाद और रामराज्य

बढ़े-चढ़े बौद्ध-धर्मको रोकनेके लिये कुमारिल एवं शंकराचार्य सफल हुए । अतः चेतन शक्तिशाली पुरुष भौतिक प्रवाहको मोड़ते हैं, वे प्रवाहमें नहीं बहते । इसी- लिये भारतीय सिद्धान्त है कि 'कालो वा कारणं राज्ञः राजा वा कालकारणम् । इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम् ॥ (महा०) काल राजाका कारण है या राजा कालका कारण है, यह संशय नहीं होना चाहिये—राजा ही कालका कारण होता है । काल प्रवाह, भौतिक प्रवाह या इतिहासचक्रको चेतन प्राणी, राजा, विशिष्ट महापुरुष तथा ईश्वर अवश्य ही बदल सकते हैं । कहा जाता है कि 'उत्पत्ति और समाजका एक रूप नष्ट होता है तो उसका स्थान दूसरा रूप ले लेता है। इस क्रान्तिकारी परिवर्तनका कारण दो प्रकारके घटना- समूह होते हैं । दोनों यद्यपि कभी संयुक्त रूपसे दिखायी देते हैं, फिर भी दोनों- पृथक् रूपसे काम करते हैं । इनमें एक यन्त्र विद्यासम्बन्धी है, जिसके फलस्वरूप उत्पादन-शक्तियोंमें परिवर्तन होता है । दूसरा घटनासमूह व्यक्तिसम्बन्धी है, जिसका सम्बन्ध सामाजिक वर्गों और दलोंसे होता है । काम करनेवाले मजदूरोंकी बढ़ती हुई दक्षता, नवीन कच्चे माल और बाजारोंका अन्वेषण, माल बनानेकी नवीन पद्धति, औजारों और मशीनोंका आविष्कार व्यापार तथा विनिमयके अधिक उत्तम संघटनके फलसे जब उत्पादक शक्तियोंकी वृद्धि हो जाती है और समाजका भौतिक आधार अथवा आर्थिक नींव बदल जाती है, तब उत्पत्तिकी पुरानी प्रणालीसे माल तैयार करनेका पुराना तरीका लाभदायक नहीं रह जाता; क्योंकि माल बनानेका पुराना तरीका, पुराने सामाजिक विभाग, पुराने कानून, पुरानी शासनसंस्थाएँ, पुराने विद्यासम्बन्धी सिद्धान्त (ऐसी उत्पादक शक्तियोंके अनुकूल जो या तो लुप्त हो चुकी हैं या लुप्त हो रही हैं) रह नहीं जाते ? अतः अब वह समाजरूपी भवन उसकी आर्थिक दशारूपी नींवके सदृश नहीं रह जाता । इस प्रकार उत्पादक शक्तियाँ और उत्पत्तिकी प्रणाली एक दूसरेके विरुद्ध हो जाती हैं । प्राचीनता, नवीनताका यह विरोध धीरे-धीरे मनुष्यके विचारोंपर प्रभाव डालता है । मनुष्य एक नवीन युगका आरम्भ अनुभव करने लगता है । इस घटनासे समाजका संघटन भी बदलने लगता है । जो वर्ग पहले तुच्छ समझे जाते थे, वे ही महत्त्वपूर्ण और सम्पत्तिके स्वामी बन जाते हैं । जिन वर्गोंकी पहले प्रधानता थी, उनका पतन होने लगता है । इस प्रकार समाजके मूल आधारमें परिवर्तन होनेसे प्राचीन धार्मिक, कानूनी, दार्शनिक और राजनीतिक प्रणालियाँ पहले तो अपने अस्तित्व कायम रखनेके लिये हाथ-पैर मारती हैं, परंतु समय-परिवर्तनके कारण वे अव्यव- हार्य और निकम्मी हो जाती हैं, लोगोंके उपयोगार्ह नहीं रह जातीं । मनुष्योंके विचार भी प्रायः परिवर्तनविरोधी स्थितिपालक होते हैं, पर फिर वे भी धीरे-धीरे घट- नाओंका अनुसरण करने लगते हैं । महान् विचारक उत्पन्न होते हैं, वे नवीन परिस्थितिका रहस्य समझाते हैं । उसके अनुसार नवीन भावनाओं, विचारधाराओं-