मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंका जन्म देते हैं। फिर मनुष्योमें विवेक जाग्रत् होता है। संदेह और प्रश्नोकी परम्परासे नवीन सत्य सिद्धान्तोका उदय होता है। फलस्वरूप मतभेद, वादविवाद, फूट, वर्गकलह और क्रान्ति उत्पन्न होती है।' पूर्वके तर्कोंसे ही उपर्युक्त मार्क्सीय मन्तव्यका भी खण्डन हो जाता है। उनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि काल या परिस्थिति एव भौतिक अवस्थाओके कारण सिद्धान्तोमें परिवर्तन नहीं हो सकता। पैदल चलने, बैलगाडियोंद्वारा चलने एवं वायुयानद्वारा चलनेके जमानेमें भले ही भेद हो गया हो, परंतु उनमें रहने- वाले नित्य आत्मा एव परमेश्वरमें भेद नहीं हो गया। इस तरह चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल, नक्षत्रमण्डल, आकाशमण्डलमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। अग्निका दहन, प्रकाशन-धर्म, पृथ्वीके अन्नादि उत्पन्न करनेके स्वभावमें रद्दोबदल नहीं हुआ। अग्नि, सूर्य, वायु एव आकाशके धर्ममे रद्दोबदल नही हुआ। चन्द्रमाके घटने बढने एव तदनुसार समुद्रके ज्वारभाटेमें भी रद्दोबदल नही हुआ। भोजनसे भूख मिटानेके सिद्धान्तमें, पानीसे प्यास बुझानेके सिद्धान्तमें, सन्तानोत्पादन कार्यादिमें भी उल्लेख्य परिवर्तन नही हुआ। अतएव सत्य-अहिंसा, स्तेयादि धर्मो- का भी महत्त्व घटा नहीं है। मशीनो एव बड़े-बडे कलकारखानोंके बननेसे या मज- दूरोमें कार्यक्षमता, दक्षता बढ जानेसे सम्पत्तिमें, सुख-सुविधा आदिमें वृद्धि हो जानी अलग बात है, परंतु इससे धार्मिक, दार्शनिक या राजनीतिक सिद्धान्तोमें अन्तर पड़नेका कोई भी कारण नही है। पुनश्च आधुनिक लोगोके मतानुसार जो छः हजार वर्षके भीतर ही ससारका ऐतिहासिक एव प्रागैतिहासिक काल मानते हैं, उनके लिये यह भले ही कोई नवीन अद्भुत विकास हो, परंतु जो अरबो वर्षकी दुनिया मानते हैं, वे लाखो वर्ष पहले महायन्त्रोका निर्माण करके उनका दुष्प- रिणाम भी जान चुके हैं। अतएव उनके निर्माणको पाप तथा अवैध घोषित कर चुके हैं। रामायणके पुष्पकयान तथा देवताओके दिव्य विमानोका मुकाबला करनेमें आजके विमान कुछ हैं ही नहीं। कथासरित्सागर, बृहत्कथामें वर्णित विमानोका भी आधुनिक विमान मुकाबला नहीं कर सकते। उनमें एक कीलके दबानेसे एक बारकी उड़ानमें आठ हजार योजनतक जानेकी क्षमता थी, खतरेकी तो तो कोई सम्भावना थी ही नहीं। यन्त्रचालित नगर एव बाजार आदिको और उनके शासन आदिकी सम्पूर्ण व्यवस्था एक कारीगरके हाथमे होना कितना महत्त्वपूर्ण आविष्कार था*।
- राजा भोजके पास एक काष्ठमय अश्वाकार यन्त्र था, जिसकी एक घडीमें ११ कोसकी गति थी—'घट्येकया क्रोशदशेकनञ्च सुकृत्रिमो गच्छति चारुगत्या। वायु दधाति व्यञ्जन सुपुष्कल विना मनुष्येण चलत्यजस्रम् ॥' (समरा० सूत्र०)। उज्जैनके राजा प्रद्योतने राजा उदयनको फँसानेके लिये एक यन्त्रमय हाथी बनाया था, जिसपर