मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५० मार्क्सवाद और रामराज्य इस सम्बन्धमें भी मार्क्सवादी कल्पना मनगढन्त है । कुटुम्ब, कुल, जाति, सम्प्रदाय तथा समाजके समान ही राष्ट्रकी कल्पना भी प्राचीन है । महा- भारतमें कई स्थलोंमें देशोंके सम्बन्धमें 'राष्ट्र' शब्दका प्रयोग आया है । वेदोंमें भी राष्ट्र शब्दका प्रयोग देशके लिये आता है, जैसा कि—'आब्रह्मन्ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्, आराष्ट्रे राजन्यः ।' (यजु० सं० २२ । २२) । इसीलिये धर्मनियन्त्रित रामराज्य-प्रणालीमें समष्टिके अविरोधसे व्यष्टिके अभ्युदयका विधान है । व्यक्ति कुटुम्बके अविरोधसे, कुटुम्ब कुलके अविरोधसे, कुल ग्रामके, ग्राम प्रदेशके, प्रदेश राज्यके और राज्य विश्वके अविरोधसे आत्मोन्नतिके लिये प्रयत्न- शील हो सकते हैं । कुलके लिये एकका, ग्रामके लिये कुलका और जनपदके लिये ग्रामका त्याग किया जा सकता है—'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥' अवश्य ही व्यक्तिवाद तथा जातिवादके तुल्य ही राष्ट्रवाद या देशवाद भी संघर्षसे ही उग्ररूप धारण करता है । सीमित शक्तिवाले लोग ही यदि सीमित क्षेत्रमें प्रयत्न करते हैं, तो वह प्रभावशाली सिद्ध होता है, अन्यथा समुद्रमें सत्तू घोलनेके तुल्य सीमित प्रयत्न अकिंचित्कर होता है । इसीलिये व्यक्तिगत, कुटुम्बगत, मण्डलगत, राज्यगत एवं राष्ट्रगत उत्तरोत्तर विकसित तथा विशाल प्रयत्न ही सफल होते हैं । 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के अनुसार विश्वके, तथा महाविराट्की उपासनाके अनुसार अनन्त कोटि ब्रह्माण्डात्मा महाविराट्के अभ्युदयके लिये भी प्रयत्न होता है, परंतु उसके लिये विशिष्टरूपसे उच्चकोटिकी भावनाओंका विकास अपेक्षित होता है । धर्मनियन्त्रित रामराज्य-प्रणालीकी सार्वभौम सत्तामें केवल समन्वय एवं सामञ्जस्यकी स्थापनाके लिये ही सार्वभौम सत्ताद्वारा विभिन्न जातियों एवं राष्ट्रोंका नियन्त्रण किया जाता है । फिर भी सभी धर्मों, सम्प्रदायो, जातियों तथा राष्ट्रोंको पूर्ण विकासका अवकाश भी रहता है । उसी सार्वभौम सत्ताके द्वारा राष्ट्रो, जातियो तथा व्यापारियोके संघर्ष रोके जाते हैं । जैसे व्यक्तिगत उन्नतिसे कुटुम्बोकी उन्नति और कुटुम्बोंकी उन्नतिसे ग्रामो तथा नगरो की उन्नति होती है, वैसे ही ग्रामो तथा नगरो- की उन्नतिसे मण्डलो, प्रान्तो एव राज्यकी उन्नति होती है । राज्यो एव राष्ट्रोकी उन्नति विश्वकी उन्नतिमें अपेक्षित होती है । व्यक्तित्व एव कुलीनताका अभिमान अनेक बार प्राणियोको बुरे कर्मोंसे बचाता है । महाभारतमें आख्यान है कि 'एक श्वान किसी महर्षिकी कृपासे वृक ( भेड़िया ), व्याघ्र, सिंह एवं शार्दूलतक बन गया । फिर भी श्वानके सस्कार विद्यमान होनेसे श्वानके स्वभावानुसार उससे ऐसी दुश्चेष्टा हुई कि उसे पुनः श्वान ही बनना पडा ।' इसी तरह एक समय किसी ऋषि ने एक मूपिकाको रूप-यौवनसम्पन्न दिव्य कन्या बना दिया । फिर उसे वर पसन्द करनेके लिये कहा गया । उसने सबसे श्रेष्ठ वर निश्चय करते-करते सूर्यको पसंद किया । फिर सूर्यके आच्छादक बादलको श्रेष्ठ समझा । फिर बादलोको