मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै, वैसा ही बन जाता है— यादृशैः संनिविशते यादृशांश्चोपसेवते । यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग् भवति पूरुषः ॥ ( महा० उद्योग० ३६ । १३ ) प्राणी जैसा सङ्कल्प करता है, वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है, वैसा ही बन जाता है— 'यथा क्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत प्रेत्य भवति।' (छान्दो० ३।१४।१) इस तरह सङ्ग एव शिक्षामें परिवर्तन होनेसे जब बुद्धि, विचार, सिद्धान्त तथा कर्ममें परिवर्तन होता है, तब समाजका भी रूप बदल जाता है । सत्समागम, सत्- शिक्षासे सद्बुद्धि, सदिच्छा, सत्कर्म एव सत्समाज बनता है । असत्समागम, असत्- शिक्षासे असद्बुद्धि, असद्-इच्छा, असत्कर्म एव असत्समाज बन जाता है । सत् और असत्का निर्णय प्रत्यक्ष, अनुमान एव आगमके आधारपर ही होता है । कहा जा चुका है कि उत्पादन-साधनोंमें या सम्पत्तिमें रद्दोबदल होनेपर भी प्रमाणजन्य प्रमामें कोई अन्तर नहीं हो सकता है । इसलिये किसी भी स्थितिमें प्रमाणके आधारपर ही सत्-असत्का निर्णय हो सकता है । सत्को असत् और असत्को सत् समझ लिये जानेका कारण प्रमाद है । प्रमाणनिर्णीत सच्छिक्षा तथा सत् समागमसे किसी भी हालतमें सद्विचार, सत्सिद्धान्त, सदिच्छा, सत्कर्म और सत्-समाज एव सद्-व्यक्तिका निर्माण हो सकता है । परन्तु 'मानव- इतिहास प्रगतिका इतिहास है' यह सिद्धान्त इस सम्बन्धमें सर्वथा ही असंगत है । कोई भी समझदार व्यक्ति कह सकता है कि आजकी स्थिति बुद्धि, शक्ति, सद्- भावनाकी दृष्टिसे प्रगति नहीं, किंतु अधोगतिकी ही है । भौतिक बाह्य चमत्कृतिकी चकाचौंधमें चौंधियाया हुआ आजका मानव सत्प्रमाण, सच्छास्त्रसे बहिर्मुख होकर जडयन्त्रका किंकर होकर स्वयं भी जडयन्त्रवत् हो गया है । आध्यात्मिकता, धार्मिकतासे बहिर्मुख होकर, संस्कृति-सभ्यतासे प्रच्युत होकर वह पशुप्राय होता जा रहा है । यदि यही प्रगति है, तो फिर अधोगति क्या है, यह भी विचारणीय है । उत्पादनमे सुविधाके लिये अल्प व्ययमे अल्प श्रमसे अधिक-से-अधिक उत्पादन हो सके, इसके लिये मनुष्योकी प्रवृत्ति हो सकती है । परन्तु उसके साथ सिद्धान्तमे, विचारमें तथा समाजमे भी परिवर्तन हो, यह आवश्यक नहीं है । रामायणके युगमें कई लोग पैदल चलते थे, कई लोग आकाश, समुद्र और पहाड़ोपर समानरूपसे अव्याहत गतिवाले रथसे चलते थे—'उदन्वदाकाशमही- धरेषु वशिष्ठमन्त्रोक्षणजप्रभावात् ।' कई पुष्पकयानसे चलते थे, कई पत्थरोंसे, वृक्षोसे लड़ते थे, कई धनुष-बाणसे, कई भुशुण्डि, शतघ्नि तथा अन्यान्य विविध यन्त्रोसे लडते थे, विविध प्रकारसे काम करते थे । फिर भी उनके विचार, सिद्धान्त सुस्थिर थे, क्षणिक या परिवर्तनशील नहीं थे । महाभारतके आख्यानोंके आधारपर भी यही बात कही जा सकती है । आज भी कितने ही लोग पदाति