भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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४४६ मार्क्सवाद और रामराज्य (पैदल भी चलते) हो, मोटरपर भी चलते हो और वायुयानपर भी चलते हो, तो भी उनके विचारों, सिद्धान्तोंमें कोई भी परिवर्तन नहीं होता है। इतना ही नहीं, कितने ही आधुनिक विचारक अतिप्राचीन वैदिक अध्यात्मवाद एवं धर्म- नियन्त्रित रामराज्यवादको पसंद करते है। अनाग्रह बुद्धिका फल है—'बुद्धेः फलमनाग्रहः।' और तत्त्वका पक्षपात बुद्धिका स्वभाव होता है—'तत्त्वपक्षपातो हि धियां स्वभावः।' जैसे पर्वत, कन्दरामें स्थित लाखो वर्षोंका गाढान्धकार भी प्रदीप- प्रभाके प्रकट होते ही नष्ट हो जाता है, वैसे ही भीषण से-भीषण विपरीत वातावरण- में भी प्रमाणके द्वारा संशय-विपर्ययादिरहित निर्दोष तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता ही है। इसमें चाहे हाथकी चक्कीसे आटा पीसा जाय, चाहे भापकी चक्कीसे। जब किन्ही कारणोसे, परिस्थितियोसे या प्रमादसे सत्समागम, सच्छिक्षामें गडबडी आती है, तब सद्विचार, सत्सिद्धान्तसे प्रच्युति होती है और तभी धार्मिक, सामाजिक अधोगति होती है। यही धर्मग्लानि एवं अधर्माभ्युत्थान कहा जाता है; परन्तु यह अवस्था स्थिर नही रहती है। गीताके आचार्य दार्शनिकशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके अनुसार जब-जब धर्मग्लानि और अधर्मका अभ्युत्थान बढता है, तब-तब परमेश्वर अवतार ग्रहण करके धर्मका प्रतिष्ठापन करते है। इतिहास और व्यक्ति स्टालिनका कहना है कि 'इतिहास विज्ञानको वास्तविक विज्ञान बनाता है तो सामाजिक इतिहासके विकासको सम्राटो, सेनापतियो, विजेताओ तथा शासकोके कृत्योकी परिधिके अन्तर्गत सीमित नही किया जा सकता। इतिहास- विज्ञानके लिये आवश्यक है कि भौतिक मूल्योके निर्माता लाखो, करोडो मजदूरोके इतिहासके चिन्तनको अपना मूल विषय बनाये। द्वन्द्ववादके अनुसार प्रकृतिके सभी बाह्य रूपों एव पदार्थोंमें आन्तरिक असंगतियाँ सहजरूपसे विद्यमान है। इन पदार्थों और रूपोंमें भावपक्ष तथा अभावपक्ष दोनो ही हैं। उनका अतीत है तो अनागत भी है। एक अश मरणशील है तो दूमरा विकासोन्मुख। इन दो विरोधी अंगों—पुरातन और नवीन, मरणशील और विकासोन्मुख, निर्वाण और निर्माण—का सघर्ष ही विकास-क्रमकी आन्तरिक प्रक्रिया है।' इस आधारपर कम्युनिष्ट, मार्क्सवादी सदा ही नवीन एव विकासोन्मुख विचारधारा या दलका साथ देता है, चाहे वह बाह्यरूपसे कितनी ही बलहीन दशामें क्यो न हो। वह कभी पुरातन एव मरणशील विचारवारा या दलके साथ सहानुभूति नहीं रखता, चाहे वह कितना ही समृद्ध दृष्टिगोचर क्यो न हो। इसी पृष्ठभूमिके आधारपर मार्क्सवादियोका कहना है कि 'सर्वहाराके अधिनायकत्वद्वारा नयी सभ्यता, नयी संस्कृतिका जन्म होगा। वह नयी सभ्यता मानवकी सब देनोको ग्रहण करेगी और उन्हे जनवादी रूप देगी। साथ ही विज्ञान एवं उत्पादनकी प्रगतिसे