मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरुसोके विचार ६७ आवश्यक होता है । मध्यकालीन यूरोपीय लोगोंका यह विश्वास कि 'ईश्वरका प्रतिनिधित्व करनेवाला अत्याचारी शासक भी मान्य होना चाहिये, क्योंकि पापी नागरिकोंको दण्ड देनेके लिये ईश्वरने दुष्ट शासनकी नियुक्ति की है' अप्रामाणिक है । शास्त्रोंका स्पष्ट मत है कि मात्स्यन्यायसे पीड़ित जनताकी माँगपर ही विशिष्ट शक्ति एवं गुणसम्पन्न शासक ईश्वरद्वारा नियुक्त हुआ था । जनरञ्जन करना उसका परम कर्तव्य है । अतः जनवादका धर्म नियन्त्रित रामराज्य जैसे शासनमें पूर्ण उपयोग है । केवल व्यक्तियोंद्वारा जन्म होनेमात्रसे राज्य अच्छा नहीं हो सकता । हॉब्सका दीर्घकाय राज्य व्यक्तियोंद्वारा होनेपर भी निरपेक्ष होनेसे लॉक एवं रूसोने उसे हानिकारक बताया है । आधुनिक आलोचक ही 'सोशल कन्ट्राक्ट' सामाजिक समझौता या इकरारनामाको अप्रामाणिक मानते हैं । बेन्थम आदिकोंका कहना है कि 'व्यक्तिको सङ्घोंमें रहना हितकर प्रतीत होता है, इसीलिये फिर सब उपयोगिताकी दृष्टिसे राज्य बनाता है । कहा जाता है कि राज्यको 'कृत्रिम संस्था माननेसे मनुष्य उसमें रद्दोबदल करना सम्भव समझता है ।' परंतु 'राज्य ईश्वरीय संस्था है'—इसका यह अभिप्राय कदापि नहीं कि उसमें गडबड़ी नहीं हो सकती और उसमें सुधार नहीं हो सकता । मनुष्यका शरीर ही ईश्वरीय है । हेगेलके अनुयायी मार्क्सने उसके द्वन्द्ववादको 'द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद' का रूप दिया । हेगेल जैसे निरपेक्ष आदर्श राजतन्त्रका समर्थक था, वैसे ही मार्क्सने भी सर्वहाराकी अधिनायकताका समर्थन किया । रूसमें वही निरपेक्षता स्थिर हुई । कहा जाता है कि हेगेलवादी या मार्क्सवादी अधिनायकवादका रूसमें बोलबाला है । इससे जनतन्त्र-वादका कोई मेल नहीं हो सकता है । सोवियत रूसकी उन्नति अवश्य हुई है, परंतु व्यक्तिगत स्वतन्त्रता-जैसी बहुमूल्य वस्तु वहाँ समाप्त हो गयी । जब एक पक्षी भी सोनेके पिंजड़ेमें मीठे फल खाकर और ठंडा पानी पीकर बंद रहना पसंद नहीं करता, बल्कि आजादीसे खट्टे फल खाकर और खारा पानी पीकर भी स्वतन्त्र रहना ही पसंद करता है, तब क्या मनुष्य उस पक्षीसे भी गया बीता है जो ऐसी स्वतन्त्रता पसंद करेगा ? मार्क्सवादियोंके अनुसार राज्य दो ही प्रकारका होता है—एक सर्वहाराका अधिनायकत्व और दूसरा पूँजीपतियोंका अधिनायकत्व । रूसी राज्य राजनीति- शास्त्रकी परम्पराके विपरीत भी है । प्रजातन्त्रके अङ्ग—भाषण, कार्य, संगठन आदिकी स्वतन्त्रताका वहाँ कोई मूल्य नहीं है । सोवियत व्यवस्थाके विरुद्ध वहाँ कोई मत व्यक्त नहीं कर सकता और न कोई संगठन ही हो सकता है । फिर