भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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६४ मार्क्सवाद और रामराज्य भी मार्क्सवादी रूसी राज्यको पूर्णजनतन्त्रवादी कहनेकी धृष्टता करते हैं । जॉन लॉककी जन-स्वीकृतिका भी रूसमें कोई महत्त्व नहीं है । एकदलीय व्यवस्था ही वहाँ सब कुछ है । स्टालिनके मतानुसार पूँजीवादी देशोंमें भिन्न-भिन्न वर्गोंके वर्गीय अर्थैक्यका प्रतिनिधित्व राजनीतिक दलोंद्वारा होता है अर्थात् एक राजनीतिक दल एक वर्गके या कुछ वर्गोंके अर्थैक्यका प्रतिनिधित्व करता है । सोवियत रूसमें वर्गोंका अन्त हो गया है, अतः वहाँ राजनीतिक दलोंकी आवश्यकता ही नहीं है; परंतु राज्य-शास्त्रमें राजनीतिक दल जनतन्त्रके प्राणतुल्य माने जाते हैं । उन्हें वर्गीय संस्था कहकर अनावश्यक बतला देना जनतन्त्रीय विचारके विपरीत है । विरोधी दलकी अनुपस्थितिमें वास्तविक जनवाद असम्भव ही है । फिर 'वर्गका अन्त हो गया' यह तो तभी विदित हो सकता है, जब भाषण, प्रकाशन और संगठनकी स्वाधीनता हो । मार्क्सवादियोंके अनुसार 'सर्वहाराका अधिनायकत्व संक्रमणकालकी ही वस्तु है । अन्तमें उत्पादन, वृद्धि एवं सुव्यवस्थाके द्वारा राज्यका अत्यन्त लोप होकर वर्गविहीन, राज्यविहीन समाजकी स्थापना होगी ।' परंतु स्टालिनने बतलाया है कि 'सोवियत राज्य पूँजीवादी राज्योंसे घिरा हुआ है । शायद एंगेल्सको, जिसने राज्यलोपकी बात कही है, अन्तर्राष्ट्रिय परिस्थितिका अनुमान नहीं था।' मार्क्सवादी ऐतिहासिक मास्कोके मुकदमोंको सोवियतविरोधी षड्यन्त्रोंका प्रतीक बतलाकर कहते हैं कि 'सोवियत राज्यको शस्त्रास्त्र-सम्पन्न गुप्तचर पुलिस सेनासे पूर्ण दृढ़ बनाना ही आवश्यक है ।' अतः राज्यलोपकी कल्पना मनोराज्यमात्र रह गयी । चाणक्यने ठीक ही कहा है कि शक्ति-मदसे बड़ा कोई मद नहीं है । 'प्रभुता पाइ काहि मद नाही' यह तुलसीदासजीकी उक्ति भी सभी व्यवस्थाओंपर लागू होती है । धर्मनियन्त्रित रामराज्य-प्रणाली ही ऐसी व्यवस्था है, जिसमें राज्यमदका संचार नहीं हो पाता । राज्यमदका पान कर वे ही मत्त होते हैं जिन्होने साधु-सभाका सेवन नहीं किया— जे अचवँत नृप मातहिं तेई । नाहिन साधुसभा जंहिं सेई ॥ भरत-जैसे साधु पुरुषोंको तो विधि-हरि-हर-पद पानेपर भी मद नहीं हो ' सकता है । क्या कभी नगण्य तक्र-बिन्दुसे क्षीर-समुद्र फट सकता है— भरतहि होइ न राजमद विधि हरि हर पद पाइ । कबहुँ कि काँजी सीकरनि क्षीर सिंधु बिनसाइ ॥