भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

महाभारतमें सामाजिक अनुबन्ध ६५ अस्तु । धर्महीन सोवियत-शासन शक्ति-मदका अपवाद नहीं कहा जा सकता। समाजवादी ढाँचेमें आर्थिक सत्ताका तो अन्त हो गया, परन्तु सर्वहारा-दलके अधिनायकत्वमें राजनीतिक तथा सामाजिक सत्ताका अन्त नहीं होता । नये सत्ताधारी शक्तिमदके अपवाद नहीं होते । क्रान्तिके उपरान्त ये शक्तिशाली व्यक्ति अपने स्थानोंसे अलग नहीं होना चाहते। फलतः न जनतन्त्र ही सम्भव होता है और न राज्यका लोप ही । मार्क्सवादी कहते हैं कि 'राष्ट्रियता भी पूँजीवादका ही परिणाम है । सर्वहाराकी क्रान्तिमें सभी प्रकारके शोषणोंका अन्त होता है, फिर राष्ट्रिय शोषण भी नहीं रहेगा।' परन्तु क्या सोवियत रूसमें सभी शोषणोंका अन्त हो गया ? क्या अब वहाँ राष्ट्रियता समाजवादी ढाँचेमें नहीं पनप रही है ? मार्क्सवादके अनुसार विश्वक्रान्तिके अन्तमें भी राज्य तो आवश्यक होगे ही । फिर इन राज्योंका परस्पर सम्बन्ध क्या होगा ? यदि मध्यकालीन पोप या सम्राट्‌के तुल्य एक ही अधिनायक या शासक संचालक होगा तब तो उसकी अपेक्षा एक धर्मनियन्त्रित राम-जैसा सार्वभौम राजा या राज्योंके धर्मनियन्त्रित प्रतिनिधियोंकी सभाद्वारा संचालन हो तो भी क्या हानि है ? महाभारतमें सामाजिक अनुबन्ध महाभारत शान्तिपर्वमें शरशय्यास्थ भीष्मजीने अन्य धर्मोंके साथ राजधर्म- का भी उपदेश किया है । उसमें उन्होंने अराजकताको बड़ा पाप बताया है और कहा है कि 'राज्यस्थापनाके लिये उद्यत बलवान्‌के सामने सबको ही झुक जाना चाहिये । अराजक राज्यको दस्यु नष्ट कर देते हैं—‘अनिन्द्रमवलं राज्यं दस्यवो- ऽभिभवन्त्युत ।' अराजक राज्य निर्वीर्य होकर नष्ट हो जाते हैं । अराजकतासे अधिक कोई पाप नहीं । अराजकाणि राष्ट्राणि हतवीर्याणि वा पुनः । न हि पापात् परतरमस्ति किंचिदराजकात् ॥ (शा० प० राजा० ६७ । ७) कुछ लोग भीष्मद्वारा वर्णित मात्स्यन्यायकी हाब्सकी प्राकृतिक स्थितिसे तुलना करते हैं । कहा जाता है कि जिस युगमें मनुष्य प्राकृतिक जीवन व्यतीत करता था, वह 'स्टेट आफ नेचर' (प्राकृतिक दशा) है। जिसमें प्राकृतिक युगके बन्धनसे मुक्त होकर सामाजिक जीवनमें प्रवेश करता है, उसे 'स्टेट आफ सोसाइटी' कहते हैं और जिसमें राज्य निर्माण करके राजनीतिमें प्रवेश करता है, वह है 'स्टेट आफ पोलिटिकल सोसाइटी' । जैसे जलमें प्रबल मत्स्य निर्बल मत्स्योंका भक्षण कर लेता है, वैसे ही प्रबल मनुष्य दूसरे निर्बल मनुष्योंके वित्त-कलत्र आदि सब कुछ छीन लेते हैं, एक दूसरेकी हत्या कर देते हैं— सा० र० ५—