भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 79

६६ मार्क्सवाद और रामराज्य अराजकाः प्रजाः पूर्वं विनेशुरिति नः श्रुतम्। परस्परं भक्षयन्तो मत्स्या इव जले कृशान्॥ (शा० प० ६७।१७) इसे ही 'लाजिक आफ फिश' (मात्स्यन्याय) कहते हैं। इसी मात्स्यन्यायसे पीड़ित होकर मनुष्योंने एकत्र होकर सदाचारसम्बन्धी कुछ नियम बनाये। जैसे कठोर वाणी, पर-स्त्री, पर-धन-हरण आदिके त्यागका नियम बनाया गया। इससे काम, क्रोध, लोभ, मोहादिसे छुटकारा मिलता है और मनुष्य घृणित नारकीय यातनामय, भयभीत एव सशङ्क क्षणिक जीवनसे हटकर सभ्य जीवनमे प्रवेश करता है। वाक्शूरो दण्डपरुषो यश्च स्यात् पारजायिकः। यः परस्वमथादद्यात् त्याज्या नस्तादृशा इति॥ समये यांस्ततश्चक्रुः समयानिति नः श्रुतम्। (शां०प० ६७अ०) हाब्सने भी 'स्टेट आफ नेचर' (प्राकृतिक राज्य) का इसी प्रकार वर्णन किया है, परंतु हाब्सके अनुसार मनुष्यमें केवल भय-वृत्ति थी। इसी भयसे बचनेके लिये स्वार्थमयी वृत्तिसे राज्यका विकास हुआ। परंतु भीष्मके अनुसार लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद, मत्सर—ये छः प्रधान आसुरी वृत्तियाँ मात्स्यन्यायके कारण हैं। अतः इन सबसे छुटकारा पाना सामाजिक जीवन-निर्माणका उद्देश्य है। इन वृत्तियोंपर विजय प्राप्त करना ही सभ्यता है। पर ये सामाजिक नियम (मारल लाज) ही बने रहे, वास्तविक नियम (पाजिटिव लॉ) न बन सके; क्योकि उन नियमोंका पालन करनेके लिये विवश करनेवाली कोई सत्ता न थी। जनताकी स्वीकृतिमात्र ही उसका आधार था। भीष्मका यह समाज निर्माण सामाजिक अनुबन्ध या पारस्परिक समझौता था, किंतु नियम- निर्माणके बाद उन नियमोंका कोई नियामक न होनेसे पालन न हो सका। लोग मनमानी उन नियमोंका उल्लङ्घन करने लगे, तब उन्हें एक शासककी आवश्यकता हुई। जिसके नियन्त्रण या दण्ड-भयसे प्रजाको नियम-पालनके लिये विवश होना पड़े। एतदर्थ प्रजाने ब्रह्माके पास जाकर विनय की कि एक राजा या शासकके बिना हमलोग नष्ट हो जायेंगे, अतः हमलोगोंके लिये कोई समर्थ योग्य शासक दीजिये, जिसका कि हमलोग सम्मान करे और वह हमलोगोंका रक्षण करे। सहितास्तास्तदा जग्मुरसुखाताः पितामहम्। अनीश्वरा विनश्यामौ भगवंश्चीश्वरं दिश॥ यं पूजयेम सम्भूय यश्च नः प्रतिपालयेत्। (शा०प०६७।२०-२१) तब ब्रह्माने प्रजाके सामने अष्टलोकपालोंके दिव्य प्रताप, तेज आदिसे युक्त मनुको प्रस्तुत किया। परंतु मनुने शासक बनना अस्वीकार कर दिया और कहा कि राज्य चलानेमें पापका डर रहता है, राज्य चलाना बहुत कठिन काम है।