मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजाको दण्ड देना पड़ता है। विशेषतः मिथ्याचारमें संलग्न प्रजाका पालन तो बहुत ही कठिन है। इसपर प्रजाने कहा कि 'तुम डरो मत, दण्ड देना पाप नहीं वह तो पाप करनेवालोंके पापोंका ही फल है और हमलोग पशु तथा सुवर्णके लाभका पचासवाँ भाग तथा धनका दसवाँ भाग राजकोष-वृद्धिके लिये तुम्हें देने रहेंगे। उत्तम वस्तु तुम्हें भेंट की जायगी। शस्त्रोंमें सुसज्जित शूर तुम्हारा अनुसरण करेंगे। इस तरह तुम दुष्प्रधर्ष और प्रतापयुक्त होकर विजयी होओगे। राज्यमे सुरक्षित होकर प्रजा जो पुण्यकर्म करेगी, उस धर्मका चतुर्थांश भी तुम्हें मिलता रहेगा। इस तरह सुखमे प्राप्त धन, धर्म एवं बलसे उपबृंहित होकर तुम हमलोगोंका उसी तरहसे पालन करोगे, जैसे इन्द्र देवताओंका। तुम सूर्यकी भाँति चमकते हुए विजयके लिये प्रस्थान करो। शत्रुओंका मान-मर्दन करो, तुम्हारी सदा जय होगी।' तमब्रुवन् प्रजा मा भैः कर्तृ नेनो गमिष्यति । पशूनामधिपञ्चाशद्धिरण्यस्य तथैव च ॥ धान्यस्य दशमं भागं दास्याम कोषवर्धनम् । मुख्येन शस्त्रपत्रेण ये मनुष्या प्रधानतः ॥ भवन्तं तेऽनुयास्यन्ति महेन्द्रमिव देवताः । विजयाय हि निर्याहि प्रतपन् रश्मिवानिव ॥ मानं विधम शत्रूणां जयोऽस्तु तव सर्वदा । (शा० प० रा० ६७।२३-२५।२०) इस तरह राजाका वरण करके प्रजाने राज्यका निर्माण किया। यहाँ सामाजिक संघटन तथा सामाजिक नियमोंको स्थायी एवं अक्षुण्ण रखनेके लिये ही राज्यका निर्माण हुआ है। अतः राजाको उतने ही अधिकार दिये गये हैं जितने कि उक्त कार्यके लिये आवश्यक थे। हॉब्सके कल्पनानुसार 'राजाको प्रजाने अपने सभी अधिकार नहीं सौंप। अतएव हॉब्सके 'लिवियाथन' (दीर्घकाय) के तुल्य यह राजा निरङ्कुश नहीं था। उसके अधिकार सीमित थे। यदि वह अधिकारोंका दुरुपयोग करे तो जनताको उसे पदच्युत करनेका भी अधिकार था।' हॉब्सके अनुसार 'दीर्घकायका विरोध करना कथमपि न्यायसंगत नहीं है।' परंतु भीष्मके अनुसार ऐसा नहीं। यहाँ उद्धत वेन-जैसे राजाको प्रजाप्रतिनिधि ऋषियोंने पदच्युत ही नहीं, उसे नष्ट भी कर दिया था। यही भीष्म-सम्मत सामाजिक समझौतेका सिद्धान्त या सोशल कन्ट्रेक्टकी थ्योरी है। कुछ लोग भीष्मद्वारा वर्णित मात्स्यन्यायके युगको हॉब्सका प्राकृतिक युग ही मानते हैं, परंतु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है; क्योंकि भारतके अनुसार वस्तुतः कृतयुगमें सभी प्रजा धर्मनिष्ठ तथा परम विवेक, विज्ञान, संयम-सम्पन्न थी। कालक्रम से सत्त्वगुणके ह्रास होनेपर धर्म-ह्रास होनेसे रज तम एवं तदुद्भूत अधर्म बढनेपर