भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

६८ मार्क्सवाद और रामराज्य ही मात्स्यन्यायका आविर्भाव हुआ। मात्स्यन्यायकी स्थिति प्राकृतिक अवस्था नहीं है। वह विकृतिभूत अवस्था है। शास्त्रीय सिद्धान्तानुसार विकासकी अपेक्षा ह्रासका ही पक्ष तथ्य है। इसीलिये विष्णुके पुत्र ब्रह्मा सर्वज्ञ हुए । ब्रह्माके पुत्र वशिष्ठ आदि भी सर्वज्ञकल्प हुए । जिनकी सृष्टि जितनी कारणके समीप थी, उनमें उतनी ही स्वच्छता थी। फिर जितनी-जितनी कारणसे दूर होती गयी, उतनी ही स्वच्छता होती गयी । अतः कारणके अव्यवहित समीपस्थ प्रजा (प्राणी) सात्त्विक, धर्मात्मा, विचारशील तथा नियन्त्रित थी । वैसे भी हर एक कृतयुगमें सत्त्वका विकास अधिक ही होता है। जैसे प्रत्येक ग्रीष्म, हिम आदि ऋतुमे गर्मी, जाड़ा आदिका प्रादुर्भाव होता है । उसी तरह कृतयुगमे सत्त्वका विशेषरूपसे विकास होता है । इस तरह मात्स्यन्यायकी अवस्था विकार ही है, स्वाभाविक नहीं । इसीलिये दूसरे प्रसङ्गमें उसी राजधर्ममें भीष्मने बतलाया है— नियतस्त्वं नरव्याघ्र शृणु सर्वमशेषतः । यथा राज्यं समुत्पन्नमादौ कृतयुगेऽभवत् ॥ न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्डो न दाण्डिकः । धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ पाल्यमानास्तथान्योन्यं नरा धर्मेण भारत । खेदं परमुपाजग्मुस्ततस्तान् मोह आविशत् ॥ ते मोहवशमापन्ना मनुजा मनुजर्षभ । प्रतिपत्तिविमोहाच्च धर्मस्तेषामनीनशत् ॥ नष्टायां प्रतिपत्तौ च मोहवश्या नरास्तदा । लोभस्य वशमापन्नाः सर्वे भरतसत्तम ॥ अप्राप्तस्याभिमर्शं तु कुर्वन्तो मनुजास्ततः । कामो नामापरस्तत्र प्रत्यपद्यत वै प्रभो ॥ तांस्तु कामवशं प्राप्तान् रागो नामाभिसंस्पृशत् । रक्ताश्च नाभ्यजानन्त कार्याकार्ये युधिष्ठिर ॥ अगम्यागमनं चैव वाच्यावाच्यं तथैव च । भक्ष्याभक्ष्यं च राजेन्द्र दोषादोषं च नात्यजन् ॥ विलुप्ते नरलोके वै ब्रह्म चैव ननाश ह । नाशाच्च ब्रह्मणो राजन् धर्मो नाशमथागमत् ॥ नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवांस्त्रासः समाविशत् । ते त्रस्ता नरशार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ ( महा० शां० प० राजधर्म० ५९।१३—२२ )

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