मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६६ मार्क्सवाद और रामराज्य मार्क्सवादी चैतन्यको भूतोंका गुणात्मक परिणाम मानते हैं। यहाँ भी यह प्रश्न होगा कि 'चैतन्य भूतोंमें प्रथमसे विद्यमान था, केवल उसकी अभिव्यक्ति हुई है, अथवा भूतोमे अविद्यमान था, अतः अविद्यमानकी उत्पत्ति हुई है ?' अविद्य- मानकी उत्पत्ति असत्कार्यवादी वैशेषिकोंकी ही दृष्टिसे मान्य होती है, परंतु वह सर्वथा असंगत ही है। इस सम्बन्धमें सांख्यवादियोंका यह कहना है कि उस शक्त कारणकी शक्ति शक्य कार्यमे ही रहती है या सर्वत्र रहती है ? यदि सर्वत्र रहती है तो वही अवस्था सर्वत्र बनी रहेगी। यदि शक्यमें ही रहती है तो यदि शक्य घटादिकार्य असत् है, तो उसमे शक्ति कैसे कही जा सकती है; क्योकि असत्का कोई सम्बन्ध ही नही बनता। यह भी नही कहा जा सकता कि शक्तिभेद ही इस प्रकारका होता है जो किसी कार्यको उत्पन्न करता है सब कार्यको नहीं। क्योकि यहाँ भी वही प्रश्न होगा कि शक्तिविशेष कार्यसे सम्बद्ध रहता है या असम्बद्ध ? यदि सम्बद्ध कहा जायगा तो असत्के साथ सम्बन्ध हो नहीं सकता; अतः कार्यको सत् ही कहना पड़ेगा, असम्बद्ध कहेंगे तो वही अव्यवस्था आयेगी। जैसे मिट्टी, तन्तु आदिके रहनेपर ही घट-पट आदिकी उपलब्धि होती है, तद्वत् कारणके भावमें ही कार्यकी उपलब्धि होती है, अतएव कार्य कारणसे अनन्य अभिन्न है। जहाँ अश्व, गो आदिका भेद होता है, वहाँ दूसरेके भानमे ही दूसरेकी उपलब्धिक नियम नही होता। अतः यदि कार्य कारणसे भिन्न होता तो कारणकी उपलब्धिमे कार्योपलब्धिका नियम न होता, किंतु यहाँ ऐसा नियम है, अतः कारणसे भिन्न कार्य नहीं होता। अतः जब कारण सत् तब कार्य सत् होना चाहिये। कुलालादिका घटसे भेद है, अतः वहाँ कुलालादि होनेमे घट होनेका नियम नहीं है; क्योकि निमित्त नैमित्तिक भाव रहनेपर भी भिन्नता निश्चित है। कहा जा सकता है कि 'अग्निके भावमें ही धूमकी उपलब्धि होती है, तब भी वह्नि धूमका भेद होता है। वैसे ही मृत्तिकादि कारणके रहनेपर घटादि कार्यकी उपलब्धि होनेपर भी उनका परस्पर भेद नही रहेगा' परंतु यह ठीक नही है, क्योकि अग्नि बुझ जानेपर भी वातायनशून्य गोपाल-कुटीर आदिमें धूमका उपालम्भ होता है। यदि अविच्छिन्नमूल दीर्घरेखावस्थ धूमके साथ वह्निके साहचर्यका नियम बनावे तो दोष नही है; क्योकि 'तद्भावे तद्भावात् तदुपलब्धौ तदुपलब्धेस्तदनन्यता' उपादान कारणके भावमे कार्यका भाव तथा उसकी उपलब्धिमें उपलब्धि होनेसे उसकी अनन्यता होनेका नियम है, अतः अभेद है। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्षमे ही तन्तु आदि कारण ही पट आदि कार्य निश्चित होते हैं। तन्तुसे भिन्न पट नामकी वस्तु कुछ नही है, अर्थात् 'तद्भावनीयतद्भावत्वे सति तद्बुद्ध्या- नुरक्तबुद्धिविषयता' ही अभेदका कारण है। अर्थात् तद्भावमें तद्भाववाला होकर