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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

४६६ मार्क्सवाद और रामराज्य मार्क्सवादी चैतन्यको भूतोंका गुणात्मक परिणाम मानते हैं। यहाँ भी यह प्रश्न होगा कि 'चैतन्य भूतोंमें प्रथमसे विद्यमान था, केवल उसकी अभिव्यक्ति हुई है, अथवा भूतोमे अविद्यमान था, अतः अविद्यमानकी उत्पत्ति हुई है ?' अविद्य- मानकी उत्पत्ति असत्कार्यवादी वैशेषिकोंकी ही दृष्टिसे मान्य होती है, परंतु वह सर्वथा असंगत ही है। इस सम्बन्धमें सांख्यवादियोंका यह कहना है कि उस शक्त कारणकी शक्ति शक्य कार्यमे ही रहती है या सर्वत्र रहती है ? यदि सर्वत्र रहती है तो वही अवस्था सर्वत्र बनी रहेगी। यदि शक्यमें ही रहती है तो यदि शक्य घटादिकार्य असत् है, तो उसमे शक्ति कैसे कही जा सकती है; क्योकि असत्‌का कोई सम्बन्ध ही नही बनता। यह भी नही कहा जा सकता कि शक्तिभेद ही इस प्रकारका होता है जो किसी कार्यको उत्पन्न करता है सब कार्यको नहीं। क्योकि यहाँ भी वही प्रश्न होगा कि शक्तिविशेष कार्यसे सम्बद्ध रहता है या असम्बद्ध ? यदि सम्बद्ध कहा जायगा तो असत्‌के साथ सम्बन्ध हो नहीं सकता; अतः कार्यको सत् ही कहना पड़ेगा, असम्बद्ध कहेंगे तो वही अव्यवस्था आयेगी। जैसे मिट्टी, तन्तु आदिके रहनेपर ही घट-पट आदिकी उपलब्धि होती है, तद्वत् कारणके भावमें ही कार्यकी उपलब्धि होती है, अतएव कार्य कारणसे अनन्य अभिन्न है। जहाँ अश्व, गो आदिका भेद होता है, वहाँ दूसरेके भानमे ही दूसरेकी उपलब्धिक नियम नही होता। अतः यदि कार्य कारणसे भिन्न होता तो कारणकी उपलब्धिमे कार्योपलब्धिका नियम न होता, किंतु यहाँ ऐसा नियम है, अतः कारणसे भिन्न कार्य नहीं होता। अतः जब कारण सत् तब कार्य सत् होना चाहिये। कुलालादिका घटसे भेद है, अतः वहाँ कुलालादि होनेमे घट होनेका नियम नहीं है; क्योकि निमित्त नैमित्तिक भाव रहनेपर भी भिन्नता निश्चित है। कहा जा सकता है कि 'अग्निके भावमें ही धूमकी उपलब्धि होती है, तब भी वह्नि धूमका भेद होता है। वैसे ही मृत्तिकादि कारणके रहनेपर घटादि कार्यकी उपलब्धि होनेपर भी उनका परस्पर भेद नही रहेगा' परंतु यह ठीक नही है, क्योकि अग्नि बुझ जानेपर भी वातायनशून्य गोपाल-कुटीर आदिमें धूमका उपालम्भ होता है। यदि अविच्छिन्नमूल दीर्घरेखावस्थ धूमके साथ वह्निके साहचर्यका नियम बनावे तो दोष नही है; क्योकि 'तद्भावे तद्भावात् तदुपलब्धौ तदुपलब्धेस्तदनन्यता' उपादान कारणके भावमे कार्यका भाव तथा उसकी उपलब्धिमें उपलब्धि होनेसे उसकी अनन्यता होनेका नियम है, अतः अभेद है। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्षमे ही तन्तु आदि कारण ही पट आदि कार्य निश्चित होते हैं। तन्तुसे भिन्न पट नामकी वस्तु कुछ नही है, अर्थात् 'तद्भावनीयतद्भावत्वे सति तद्बुद्ध्या- नुरक्तबुद्धिविषयता' ही अभेदका कारण है। अर्थात् तद्भावमें तद्भाववाला होकर

तदनुरक्त बुद्धिका विषय होना ही अभेदका कारण है, जैसे मृत्तिकादिक कारणके रहनेपर ही घटादि कार्य रहता है और मृत्तिकाबुद्धिके साथ ही घटबुद्धि होती है। अतः मृत्तिका और घटका अभेद ही समझना चाहिये। वह्नि-धूममें 'तद्भावे तद्भाव' होनेपर भी 'उपलब्धावुपलब्धेः' का नियम नहीं है। प्रभा और रूपमें सहोपलब्धिका नियम होनेपर भी सहभावका नियम नहीं है। कारण और कार्यमें 'तद्भावे तद्भावः' 'उपलब्धावुपलब्धेः' दोनों ही नियम रहते हैं; अतः कार्यकारणका अभेद रहता है। पट तन्तुका धर्म है, अतः तन्तुसे पट भिन्न नहीं है। जो जिससे भिन्न होता है, वह उसका धर्म नहीं होता—जैसे गो अश्वका धर्म नहीं होता। पट तन्तु- का धर्म है, अतः तन्तुसे अर्थान्तर नहीं है। उपादानोपादेयभाव होनेसे भी तन्तुसे पटका अभेद ही सिद्ध होता है। जिनमें भिन्नता होती है, उनमें उपादानोपादेयभाव नहीं होता। जैसे घट-पट—दोनों भिन्न हैं, उनमें उपादानोपादेयभाव नहीं होता। तन्तु-पटका उपादानोपादेयभाव है, अतः दोनोंमें अभिन्नता ही है। दोनोंकी जिनमें भिन्नता होती है उनमें या तो कुण्ड-बदरके तुल्य संयोग होता है, या हिम-विन्ध्यके तुल्य अप्राप्ति रहती है। तन्तु-पटमें संयोग, अप्राप्ति—दोनों ही नहीं रहते, अतः अभिन्नता ही माननी चाहिये।

तन्तुके गुरुत्व कार्यसे भिन्न तन्तुनिर्मित पटका दूसरा गुरुत्व कार्य नहीं होता, इसलिये भी तन्तु पटका अभेद ही मानना युक्त है। इन हेतुओंसे सिद्ध होता है कि आतान-वितानरूप तन्तु ही पट है। फिर भी 'पट उत्पद्यते, पटो विनश्यति' इस प्रकार पटकी उत्पत्ति तथा विनाशकी बुद्धि तथा तन्तु एव पटका व्यवहार और अर्थक्रिया शीतापनयन, अङ्गप्रावरणादि कार्यक्षमता-भेदसे भी तन्तु- पटका भेद नहीं सिद्ध होता है, क्योंकि ये सभी बातें अभेदमें भी उत्पन्न हो सकती हैं। जैसे कूर्मके विद्यमान अङ्गोंका ही आविर्भाव-तिरोभाव होता है, वैसे ही विद्यमान घटादि कार्योंका ही मृत्तिकादि कारणोंमे ही आविर्भाव एव कारणमें ही तिरोभाव होता है। इसी आविर्भाव-तिरोभावमें उत्पत्ति-विनाशकी बुद्धि होती है। अत्यन्त असत्‌की उत्पत्ति तथा सत्‌का विनाश नहीं होता। 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।' जैसे कूर्ममें संकोच विकासशाली अपने अवयवोंकी भिन्नता नहीं, वैसे ही कारणसे कार्य भी भिन्न नहीं है। 'तन्तुषु पट' तन्तुओंमें पट है—यह व्यवहार भी उसी ढंगका है, जैसे वनमें वृक्ष हैं। वस्तुतः वृक्षोसे भिन्न वन नहीं है, वैसे ही तन्तुओंसे भिन्न पट नहीं है।

जैसे एक अग्निमें दाहकत्व, प्रकाशकत्व, पाचकत्व आदि कार्यभेद होनेसे भी अग्निमें भेद नहीं होता, उसी तरह कारण मृत्तिका एव तत्कार्य घटादिमे अनेक कार्योंमें भेद होनेपर भी उनमें भेद नहीं सिद्ध होता। अङ्गप्रावरण पटसे होता है, तन्तु-

४६८ मार्क्सवाद और रामराज्य से नहीं; पट तन्तुसे ही बनता है, पटसे नहीं; इत्यादि कार्यक्षमताकी व्यवस्था अभेदमे भी समस्त-व्यस्त भेदसे बन जाती है। जैसे व्यस्त पृथक्-पृथक् शिविका- वाहक भृत्य मार्ग-दर्शन किया करते हैं और समस्त मिलकर शिविकावहन करते हैं, वैसे ही प्रत्येक तन्तु अङ्गप्रावरण कार्य नहीं कर सकते, मिलकर वह कार्य कर देते हैं। इस सम्बन्धमें यह भी शङ्का होती है कि कारण-व्यापारके पहले पटका आविर्भाव सत् था या असत् ? असत् था, तब तो उसका उत्पादन कहना पड़ेगा, अगर आविर्भाव भी सत् ही है, तो कारण व्यापार व्यर्थ होगा; क्योकि यदि कार्य विद्यमान है तो कारण-व्यापारको कौन आवश्यक समझेगा। आविर्भावका भी आविर्भाव माना जायगा, तब तो अनवस्था-प्रसङ्ग होगा। परन्तु यह कहना ठीक नहीं। क्योकि असत्-कार्यवादमें भी तो इसी ढंगके दोष आते हैं। असत्की उत्पत्ति माननेपर भी यही प्रश्न होगा कि असत्की उत्पत्ति सती है या असती ? सती है तो फिर कारण व्यापार व्यर्थ है। असती है तो फिर असती उत्पत्तिकी उत्पत्ति माननी पड़ेगी और अनवस्था दोष होगा। यदि उत्पत्ति पटसे भिन्न नहीं है, पटस्वरूप ही है तब तो पट एवं उत्पत्ति दोनों- का एक ही अर्थ होगा। फिर तो पट उत्पन्न हुआ, यह कहनेसे पुनरुक्ति समझी जानी चाहिये और फिर पट नष्ट होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योकि उत्पत्ति और विनाश दोनों ही एक कालमे एकत्रित नहीं रह सकते। इसलिये पटोत्पत्तिको स्वकारणसमवायरूप माना जाय या स्वसत्तासमवायरूप माना जाय ? यदि पट असत् है तो दोनो ही नहीं हो सकते; क्योकि असत्के साथ कारण-सम्बन्ध या सत्ता-सम्बन्ध नहीं बन सकता। सत्का ही कार्य-कारणके व्यापारसे प्रादुर्भाव होता है—यही पक्ष ठीक है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि पटरूपके साथ ही कारण-सम्बन्ध है; क्योकि पटरूप कोई क्रिया नहीं है। कारकोका सम्बन्ध क्रियाके ही साथ होता है, क्रिया-सम्बन्ध बिना कारणता ही नहीं हो सकती। अव्यापी सक्रिय अनेक एवं आश्रितपरतन्त्र होता है। जो भी सावयव होता है, वह कार्य होता है, कार्य होनेसे ही सकारण भी होना अनिवार्य है। इस सम्बन्धमें अनेक पक्ष हैं। अनेकवादी असत्से ही सत्की उत्पत्ति कहते हैं, परंतु निरुपाख्य असत्से शब्दाद्यात्मक प्रपञ्चकी उत्पत्ति कैसे बन सकती है ? क्योकि सत् तथा असत्का कोई भी तादात्म्यादि सम्बन्ध नहीं बन सकता। सांख्य आदि उत्पत्तिसे पहले भी कार्यको सत् ही कहते हैं। अवश्य ही बीज तथा मृत्तिका-पिण्डादि कारणोंके प्रध्वंसके पश्चात् ही अङ्कुर, घटादिकी उत्पत्ति होती है तथापि प्रध्वंस कार्यके प्रति कारण नहीं है, किंतु बीज आदिके अवयव ही कारण हैं, अतएव उनकी ही कार्योंमें अनुवृत्ति देखी जाती है। यदि

अभावसे भाव उत्पन्न हो तब तो अभाव सभीको सर्वत्र सुलभ ही है। फिर कार्योत्पत्तिमें बाधा न होनेसे सदा ही कार्योत्पत्ति होती रहनी चाहिये। यदि कारण-व्यापारसे पूर्व कार्य असत् हो तो वह किसी तरहसे सत् नहीं बनाया जा सकता। सैकड़ों शिल्पियोंके प्रयत्नसे भी नील रूप पीत नहीं बनाया जा सकता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि सत्त्व-असत्त्व—दोनों ही घटके धर्म हैं; क्योंकि यदि घटधर्मी सत् हो तभी उसके धर्म हो सकते हैं, असत् धर्मीके धर्म कैसे हो सकेंगे? सत्त्व असत्त्व धर्मका आधार माननेपर भी घटादि कार्यको सत् ही कहना पड़ेगा। यदि असत्त्व धर्मका घटकी आत्मा या घटसे सम्बन्ध नहीं है, तो घटको असत् कैसे कहा जा सकता है ? तत्सम्बन्धितया तत्स्वरूप होनेसे ही किसी वस्तुमें तद्रूपताकी प्रतीति होती है। अतः कारण-व्यापारके ऊर्ध्व एवं पहले भी कार्य सत् ही होता है। उसी सत् कार्यकी कारणमे अभिव्यक्ति होती है, जैसे निपीडनद्वारा तिलमे तैल व्यक्त होता है अवघातद्वारा धान्यमे तण्डुलकी व्यक्ति होती है, दोहनसे गोदुग्ध, उसके मन्थनसे नवनीत अभिव्यक्त होता है, उसी तरह अङ्कुरादि कार्य भी सत् ही रहते हैं। कारण-व्यापारमे उनकी अभिव्यक्ति सम्भव है, परन्तु असत्की उत्पत्तिका कोई भी दृष्टान्त नह अभिव्यक्त होती वस्तु कहीं भी असत् नहीं देखी जाती। कार्यके लिये प्रतिनियत उपादान कारणोंका ग्रहण किया जाता है। पटार्थी तन्तु, घटार्थी मृत्तिका, कुण्डलार्थी सुवर्ण ढूँढता है। इससे मालूम पडता है कि वे कार्य उन उन कारणोंसे विशेषरूपसे सम्बद्ध रहते हैं। तभी प्रतिनियत कारण ढूँढना संगत हो सकता है। असत् कार्य होगा तो वह किसीसे कैसे सम्बद्ध होगा ! यदि कारणसे असम्बद्ध ही कार्य हो, तो असम्बद्धता समान होनेसे सब कार्य सभी कारणोंमे उत्पन्न होने चाहिये। फिर अमुक कार्य अमुक कारणसे उत्पन्न होनेका नियम न होना चाहिये। साथ ही कार्य-कारणकी स्पष्ट ही अव्यवस्था होगी। कुछ लोग कहते हैं, 'असम्बद्ध होनेपर भी जो कारण जिस कार्यके उत्पादन- में शक्त होता है, उस कारणसे वही कार्य उत्पन्न होता है। शक्ति फल-बलसे कल्प्य होती है। अर्थात् जिस कारणसे जिस कार्यकी उत्पत्ति होती दिखती है, उस कार्यकी उत्पत्तिकी शक्ति उसी कारणमें है, यह मालूम पड़ता है। अतः अव्यवस्था नहीं होगी।' सांख्यवादी सत्कार्यवादी होते हुए भी अचेतन प्रकृतिको ही कारण कहते हैं, परंतु वेदान्ती चेतन ब्रह्मको कारण कहते हैं। जो उत्पत्तिके पहले जिस रूपमें होता है, वह उसीसे उत्पन्न होता है। घट मृत्तिका-रूपमें उत्पत्तिसे पहले रहता है; यतः मृत्तिकासे उत्पन्न होता है। तैल उत्पत्तिमे पहले तिल-रूपमें रहता है, अतः तिलसे उत्पन्न होता है। वह सिकता-रूपमे नहीं रहता, अत. सिकतामे नहीं उत्पन्न

होता। अतः उत्पत्तिके पहलेका कार्य कारणरूप ही रहता है। उत्पत्तिके पश्चात् भी कार्य कारणसे अभिन्न ही रहता है। इसीलिये श्रुतिने भी इदं पदार्थ कार्य- प्रपञ्चको उत्पत्तिके प्रथम सद्रूप ही बतलाया है—'सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्। असद् वा इदमग्र आसीत् ॥' यहाँ अव्याकृत या अव्यक्त ही असत्पदसे कहा गया है, कारण असत् किसी कालसे सम्बद्ध नहीं हो सकता। असत्‌का आसीत्‌के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि आसीत्‌से सत्ता बोधित होती है, तथा च सत्ता एवं असत्‌का परस्पर विरोध होनेसे असत्‌का आसीत्‌के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता। संसारमें घट, कुण्डल और दधि चाहनेवाले क्रमेण मृत्तिका, सुवर्ण तथा क्षीर ग्रहण करते हैं। दधि चाहनेवाला मिट्टी या घट चाहनेवाला क्षीर नहीं ढूँढ़ता। यह बात सत्कार्यवादमे ही बनती है। यदि उत्पत्तिके पहले कार्य अत्यन्त असत् हो तो असत् तो सर्वत्र ही अविशिष्ट-रूपसे है, फिर क्षीरसे दधि क्यो उत्पन्न होता है,

होना चाहिये । किं च सम्बन्धियोंके अधीन ही समवायका निरूपण होता है । फिर भी वह सम्बन्धियोंके भेदसे भिन्न नहीं होता । उनकी उत्पत्ति विनाशमें उत्पन्न तथा नष्ट नहीं होता, किंतु नित्य एव एक ही समवाय रहता है, वैसे ही संयोग भी क्यों न हो ? किं च कार्य द्रव्य अवयवी है, कारणरूप द्रव्यमें रहता है । यहाँ यह प्रश्न होता है कि सम्पूर्ण अवयवोंमें अवयवी रहता है, अथवा व्यस्त पृथक्- पृथक् अवयवोंमें ? यदि कहे सम्पूर्णमें, तो अवयवी द्रव्यका प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकेगा, क्योंकि समस्त अवयवोंके साथ सन्निकर्ष ही अशक्य है । समस्त आश्रयोंमें वर्तमान बहुत्व व्यस्त आश्रयोंके ग्रहणमें नहीं गृहीत होता । यह भी नहीं कहा जा सकता कि अवयवशः समस्त अवयवोंमें कार्य ( अवयवी ) रहता है । क्योंकि इस तरह तो आरम्भक अवयवोंसे भिन्न अवयवीके अवयव मानने पड़ेंगे जिनके द्वारा आरम्भक अवयवोंमें अवयवी रहता है । जैसे म्यानके अवयवोंसे भिन्न अपने अवयवोंद्वारा तलवार म्यानमें व्याप्त होती है । किंतु इस तरह अनवस्था-दोष होगा, क्योंकि उन अवयवोंमें भी रहनेके लिये कार्यके अन्य अवयव मानने पड़ेंगे । यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवीको मानें तब तो एक अवयवमें जब अवयवी रहेगा, उस समय अन्य अवयवोंमें नहीं रहेगा । क्योंकि देखते ही हैं, जब देवदत्त काश्मीरमें रहता है, उसी समय काशीमें नहीं रहता । यदि एक कालमें अनेकों स्थलोंमें अस्तित्व कहा जायगा तो अवश्य ही अवयवीका नानात्व हो जायगा । जैसे काशी, काश्मीरमें रहनेवाले चैत्र, मैत्र अनेक ही होते हैं । फिर भी कहा जाता है कि जैसे गोत्व जाति प्रत्येक व्यक्तिमे होनेपर भी प्रत्येकमें गृहीत होती है, फिर भी एक ही है । उसी तरह अवयवी प्रत्येक अवयवमें रहते हुए उपलब्ध होगा और एक ही रहेगा, परंतु यह सब कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवी पूर्णरूपसे उपलब्ध होगा तब तो गोके श्रृङ्गसे भी स्तनका कार्य एव पुच्छसे पृष्ठका कार्य होना चाहिये, किंतु ऐसा होता नहीं, अतः कारणसे अभिन्न ही कार्य है । यदि कार्य उत्पत्तिके पहले असत् है, तब तो वह उत्पत्ति क्रियाका कर्ता भी नहीं बनेगा । उत्पत्ति भी एक क्रिया है । क्रिया कभी अकर्तृका नहीं होती । घटकी उत्पत्तिका कर्ता घट ही होता है । 'घट उत्पद्यते' घट उत्पन्न होता है, ऐसा ही व्यवहार सर्वसम्मत है । यदि घटोत्पत्तिके कर्ता कुलालादि हों, तब तो 'कुलालादय उत्पद्यन्ते' कुलालादि उत्पन्न हो रहे हैं, ऐसा व्यवहार होना चाहिये । स्पष्टरूपसे कुलालादिकी उत्पद्यमानता नहीं प्रतीत होती । घटकी उत्पद्यमानता प्रतीत होती है । कुछ लोग कहते हैं स्वकारण एवं सत्ताके साथ सम्बन्ध ही कार्यकी उत्पत्ति है, परंतु यदि कार्य स्वयं असत् है, निरात्मक है तब उसका किसीके साथ सम्बन्ध

४७२ मार्क्सवाद और रामराज्य भी क्या होगा ? क्योकि दो सत्‌का ही सम्बन्ध होता है, सत् तथा असत्‌का एवं दो असत्‌का भी सम्बन्ध नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त अभाव या असत् निरुपाख्य असत् ही होता है तब उत्पत्तिके प्रथम कार्य असत् था—यह मर्यादा- करण भी नहीं बन सकता । यह व्यवहार नहीं होता कि अमुक राजाके पहले वन्ध्यापुत्र राजा था । यदि कारकव्यापारसे वन्ध्यापुत्र, खपुष्प भी उत्पन्न हो सके तभी यह कहा जा सकता है कि उत्पत्तिके पहले असत् कार्य कारकव्यापारसे उत्पन्न हुआ है । कहा जा सकता है कि जैसे प्रथमसे ही सिद्ध होनेसे कारणकी स्वरूप सिद्धिके लिये कोई व्यापृत नहीं होता तो उसी तरह यदि कारकव्यापारके पहले भी कार्य स्वरूप सिद्ध ही हो तो उसके लिये कौन व्यापृत होगा ? कारणसे यदि कार्य अनन्य ही है, तब कारणके समान ही कार्यके लिये भी कारकव्यापार नहीं होना चाहिये । परंतु व्यापार देखा जाता है, अतः कारकव्यापारकी सार्थकताके लिये उत्पत्तिके पहले कार्यका अभाव मानना उचित ही है । किंतु यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि कारणको कार्याकारसे व्यवस्थापन करनेके लिये ही कारकव्यापार अपेक्षित होता है । वह कार्याकार कारणका आत्म- भूत ही है; विशेष दर्शनमात्रसे वस्तुभेद नहीं होता । देवदत्त हाथ-पाँव फैलाने या संकुचित करनेसे भिन्न नहीं हो जाता है; क्योकि ‘स एवायम्’ वही यह है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा (पहचान) होती है । प्रतिदिन ही पिता, माता, भ्राता आदिमें ह्रास- विकास आदि होते रहते हैं । फिर भी वस्तुभेद नहीं प्रतीत होता; क्योकि पिता- माता, भ्राताकी एक रूपसे प्रत्यभिज्ञा होती रहती है । यदि कहा जाय कि वहाँ जन्मका व्यवधान न होनेसे ही अभेद प्रतीत होना ठीक है परंतु कार्य-कारणमें ऐसा नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि यहाँ तो कारण बीज, मृत्पिण्डादिका नाश एवं अङ्कुर, घटादिकी उत्पत्ति होती है, अतः प्रत्यभिज्ञा नहीं होती । किंतु यह भी ठीक नहीं, क्योकि यहाँ भी कारण नाश आदि नहीं अनुभूत होता । क्षीरादिका दधि आदि रूपसे संस्थान प्रत्यक्ष दिखायी देता है । वट-बीजादिसे समान जातीय अवयवोंके उपचयद्वारा अङ्कुर वृक्षादिकी उत्पत्ति एवं अवयवोंके अपचयसे विनाशका व्यवहार होता है । वस्तुतः कारणका विनाश और कार्यकी उत्पत्ति यहाँ भी नहीं है । जैसे मृत्पिण्डके अवयव घटमें अन्वित हैं, वैसे ही वटबीजके अवयव वटबीज भी अन्वित हैं । इस तरहके अवयवोपचय तथा अवयवापचयसे यदि वस्तुमें भिन्नता हो और इसीसे सत्‌की उत्पत्ति तथा सत्‌का विनाश हो तो गर्भस्थ तथा पर्यङ्क स्थ शिशुमे भी भेद कहना पड़ेगा, और बाल्य- यौवनादि शरीरमे भी भेद कहना पड़ेगा; क्योकि अवयवोंका उपचय-अपचय वहाँ भी देखा ही जाता है। फिर तो पित्रादि व्यवहार भी बाधित होगा । इस तरह सत्कार्य-

-वादमें तो कारणको कार्याकाररूपसे व्यवस्थापन करनेमें कारकव्यापार सार्थक है, परंतु असत्-कार्यवादमें तो कारकव्यापार सर्वथा निर्विषय हो जायेंगे । जैसे आकाशके हननके लिये खड्ग् आदिका प्रयोग व्यर्थ है, वैसे ही कार्याभावया असत्में भी कारकव्यापार व्यर्थ होंगे । कहा जाता है कि समवायी कारणमे अर्थात् तन्तु- मृत्तिका आदिमें कारकव्यापार होगा, परंतु यह भी ठीक नही, क्योकि अन्यविषयक व्यापारसे अन्यकी निष्पत्ति असम्भव है । अन्यथा यदि समान ही है तो फिर सिकता- विषयक व्यापारसे भी पट क्यो नहीं उत्पन्न होता ? जो कहते हैं कि समवायी कारणका ही आत्मातिशय कार्य है, उन्हे तो सत्कार्यवाद मानना ही पडेगा । अतः क्षीर आदि द्रव्य ही द्रव्याद्याकारसे अवस्थित होकर कार्य-द्रव्यके रूपमें व्यवहृत होते हैं, वेदान्तमतानुसार तो मूल कारण परब्रह्म ही घटादि अन्तिमकार्य पर्यन्त उस-उस कार्यके आकारसे नटवत् सर्वव्यवहारका आस्पद होकर प्रतीत होता है । जैसे लपेटा हुआ वस्त्र स्पष्ट नहीं दीखता, फैला हुआ स्पष्ट दीखता है, उसी तरह कारणा- वस्थित कार्य स्पष्ट नहीं उपलब्ध होता, कार्यावस्थित होकर स्पष्ट दीखता है । यह भी शङ्का होती है कि लोकमे कुलाल घट आदि कार्योंके लिये मृत्तिका दण्ड-चक्रादिका सग्रह करते हैं परंतु ब्रह्म विना सामग्री-संग्रहके किस तरह विश्व- निर्माण कर सकेगा ? परंतु जैसे क्षीर स्वभावसे दधिनिर्माणक्षम होता है, जल हिमरूपसे परिणत हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म भी प्रपञ्चात्मना व्यक्त हो जाता है । यद्यपि औष्ण्य, शैत्य आदिकी अपेक्षा करके ही क्षीर, नीर आदि दधि, हिम आदि रूपमें परिणत होते हैं, तथापि इन साधनोसे केवल शीघ्रता-सम्पादन की जाती है । यदि स्वय दधि आदि बननेकी शक्ति न होती तो बाह्य साधनोसे भी क्षीर आदि दधि आदि नहीं बन सकते । इसीलिये वायु, आकाश आदिसे दधि नहीं बनता; क्योकि उनमें दधि बननेका स्वभाव नहीं है । जैसे ऋषि, मुनि, देवादि बाह्य साधनोके बिना ही विविध शरीरो एव प्रासाद आदिका निर्माण कर सकते हैं, तन्तुनाभ (मकडी) बिना बाह्य साधनके तन्तु-निर्माण करती है, बलाका ( बगुली ) बिना शुक्रके ही घन-गर्जन-श्रवणसे गर्भ धारण करती है, कमलिनी बिना किसी गमन-साधनके ही दूसरे सरोवरमे पहुँच जाती है, उसी तरह बाह्य साधन बिना चेतनब्रह्म भी विश्वकी रचना करता है । यद्यपि कहा जा सकता है कि 'देवाद्दिका अचेतन शरीर ही अन्य शरीरका कारण है। यहाँ अचेतन ही कारण है, मकडीका मुखलालादि ही कठोर होकर तन्तु बन जाता है, बलाका भी गर्जन-श्रवणसे गर्भ धारण करती है, यहाँ भी बाह्य निमित्त है ही । इसी तरह पद्मिनी चेतनप्रयुक्त अचेतन शरीरसे ही दूसरे सरोवरमे जाती है, जैसे लता वृक्षपर आरूढ होती है, तथापि कुलालादिसे विलक्षणता तो इन कारणोंमें स्पष्ट ही है। वस्तुतः लक्षण एव प्रमाणसे ही वस्तुकी सिद्धि होती है। जो-जो पदार्थ प्रमाण-सिद्ध होते हैं, उन्हींका अस्तित्व माना जाता है। विज्ञान आदिके प्रयोग-

द्वारा भी ज्ञान ही सम्पादन किया जाता है । विश्व, राष्ट्र या देहादि प्रपञ्च तथा भूत- प्रकृति आदि भी प्रतीत होते हैं, प्रमाण-सिद्ध हैं, तभी उनका अस्तित्व माना जाता है। तथा च जैसे नील, पीत, हरितरूपका प्रकाशक प्रकाशरूपसे प्राक् सिद्ध है, वैसे ही भूतादिप्रपञ्च, प्रमेय, प्रमाण तथा प्रमाता—इन सबका भी भासक अखण्ड बोधरूप साक्षी उन सबसे प्रथम सिद्ध है । जडभूतकी सिद्धि तो चेतन साक्षीके परतन्त्र है, परंतु प्रमाण, प्रमाता या साक्षीको उनकी सिद्धिके लिये किसी जड़की अपेक्षा नहीं होती । जैसे घटादिके प्रकाशके लिये भले ही सूर्यकी अपेक्षा हो, परंतु सूर्यके प्रकाशके लिये घटादिकी अपेक्षा नहीं, उसी तरह भूत आदि सिद्धिके लिये प्रमाण, साक्षी आदिकी अपेक्षा है; परंतु प्रमाण आदिकी सिद्धिके लिये जडभूतादिकी अपेक्षा नही। संसारमें प्रकाशके सम्पर्कसे या प्रकाशरूप होनेसे 'प्रकाशित होता है,' ऐसा व्यवहार होता है। प्रकाशः प्रकाशते, घटः प्रकाशते'—ये ही दोनोंके उदाहरण हैं। इसी तरह स्वप्रकाश चेतनमें सूर्यादिके समान प्रकाश स्वरूप होनेसे 'प्रकाशते'का व्यवहार होता है। 'प्रपञ्चः प्रकाशते'में 'घटः प्रकाशते'के समान चेतन सम्पर्कसे 'प्रकाशते'का व्यवहार होता है । इस तरह परतन्त्र एवं अस्वतःसिद्ध जडभूतसे चेतनकी उत्पत्ति माननेकी अपेक्षा स्वतन्त्र स्वतः सिद्धचेतनसे जडभूतकी सिद्धि कहीं श्रेष्ठ तथा बुद्धिगम्य है । भौतिकवादी तथा प्रकृतिवादियोका कहना है कि 'अचेतन प्रपञ्चका अचे- तन प्रकृति या भूतादि ही कारण हैं, चेतन ब्रह्म या ईश्वर कारण नहीं हो सकता । जैसे घट आदि कार्योंमें मृत्तिका अन्वित होती है, वैसे ही प्रपञ्चमे जड़ता या सुख, दुःख, मोहकी अन्विति प्रतीति होती है।' परंतु यह कथन ठीक नहीं, क्योकि यदि दृष्टान्तबलसे ही यह सिद्ध करना है, तब तो यह भी कहा जा सकता है कि संसारमे कहीं भी चेतनसे अधिष्ठित हुए बिना स्वतन्तरूपसे अचेतन कोई पुरुषार्थ सम्पादन नहीं कर सकता। प्रज्ञावान् शिल्पीलोग ही गृह, प्रासाद, वायुयान आदिका निर्माण करते हुए देखे जाते हैं । उसी तरह कहा जा सकता है कि नानाकर्म- फलोपभोग योग्य बाह्य आध्यात्मिक विविध वैचित्र्ययुक्त संसार बड़े-बड़े शिल्पी जिसे मनसे भी कल्पना नहीं कर सकते, उसे अचेतन प्रकृति या भूत किस तरह रच सकते हैं ? जड लोष्ट-पाषाण-जैसे स्वतन्तरूपसे कुछ नहीं कर सकते, वैसे ही प्रकृति भूतादि भी स्वतन्तरूपसे विश्व-निर्माणमे असमर्थ हैं । कुम्भकारादिसे अधिष्ठित ही मृत्तिकादिसे घटादि बनते हैं, उसी तरह भूत या प्रकृति भी चेतनसे अधिष्ठित होकर ही कोई कार्य कर सकते हैं । फिर यह भी तो नहीं कहा जा सकता कि जड घटका कारण जड मृत्तिका है । अतः जड विश्वका भी जड ही कारण होना चाहिये । क्योकि उसके विपरीत यह भी कहा जा सकता है कि 'चेतन कुलाल जैसे मृत्तिकासे घट बनाता है, वैसे ही चेतन ब्रह्म ही जड प्रकृति, परमाणु आदिसे जगत् बनाता है।'

सुख, दुःख आदि आन्तर हैं, बाह्य शब्दादि उनके निमित्त हो सकते हैं, परंतु सुखादिरूप नहीं हो सकते । विशिष्टकार्य किसी प्रेक्षावान् द्वारा ही निर्मित देखा जाता है, अतः अवश्य ही प्रपञ्च भी वैसे ही होना चाहिये । प्रकृतिकी साम्यावस्थासे प्रच्युति भी बिना चेतनके होना असम्भव है । 'यह भी कहा जा सकता है कि केवल चेतनकी भी प्रवृत्ति नहीं दृष्ट है, परंतु चेतनयुक्त रथादि अचेतनकी प्रवृत्ति तो देखी ही गयी है । अचेतनयुक्त चेतन- की प्रवृत्ति नहीं देखी जाती । अतः विचारणीय विषय यह है कि जिसमें प्रवृत्ति दृष्ट है, उसकी प्रवृत्ति मानी जाय या जिसके सम्बन्धसे प्रवृत्ति हो रही है, उसकी प्रवृत्ति मानी जाय ? यदि कहा जाय कि जिसमें प्रवृत्ति दृष्ट है, उसीकी मानी जाय, क्योंकि दोनों ही प्रत्यक्ष हैं, जैसे रथादि प्रवृत्तिके आश्रयरूपसे प्रत्यक्ष हैं, वैसे ही केवल चेतन प्रवृत्तिके आश्रयरूपमें प्रत्यक्ष नहीं है । किंतु प्रवृत्तिके आश्रयभूत देहादि संयुक्त ही चेतनके सद्भावकी सिद्धि होती है; क्योंकि केवल अचेतन रथादि- की अपेक्षा जीवित देहमें विलक्षणता दृष्ट है, परंतु सद्भावमात्रसे प्रवृत्तिके प्रति चेतनकी हेतुता नहीं सिद्ध होती, जैसे सद्भावमात्रसे घटादिके प्रति आकाशकी निमित्तता नहीं सिद्ध होती । अतः प्रवृत्तिमें चेतन हेतु नहीं है । इसीलिये प्रत्यक्ष देहके रहनेपर ही प्रवृत्ति एवं चैतन्यका उपलम्भ होता है । देह न रहनेपर चैतन्य- का भी उपलम्भ नहीं होता । अतः देहका ही धर्म प्रवृत्ति एवं चैतन्य है, यह चार्वाक कहते हैं । इस दृष्टिसे अचेतनकी ही प्रवृत्ति सिद्ध होती है ।' इसपर अध्यात्मवादीका कहना है कि भले ही जिस देहमें प्रवृत्ति दिखायी देती है, उसीकी प्रवृत्ति मानी जाय, परंतु वह चेतनसे ही होती है; क्योंकि चेतनके रहनेपर ही प्रवृत्ति होती है, चेतन न रहनेसे प्रवृत्ति नहीं होती । यद्यपि काष्ठादिके आश्रय ही दहन, प्रकाशन आदिरूप क्रियाएँ देखी जाती हैं, केवल अग्निमें दहन, प्रकाशनादि नहीं उपलब्ध होते । चन्द्र, सूर्य, विद्युत्—सभी प्रकाश जलीय एवं पार्थिव-काष्ठ, लोहादिके ही आश्रित हैं, तथापि अग्निसे ही दाह-प्रकाश आदि होते हैं । क्योंकि अग्निसंयोग होनेसे ही काष्ठादिमें दाहकत्वादि होते हैं, अग्निवियोग होनेपर काष्ठादिमें दाह-प्रकाशादि उपलब्ध नहीं होते । चार्वाक भी चेतन देहके सम्पर्कसे ही अचेतन रथ आदिकी प्रवृत्ति मानते हैं । अतः चेतनकी प्रवर्त्तकतामें विवाद नहीं है । कहा जा सकता है कि कर-चरणादियुक्त प्राणी अपने व्यापारसे ही अचेतनका प्रवर्त्तक होता है । इधर ब्रह्मरूप चेतन तो प्रवृत्तिशून्य, कूटस्थ, नित्य है, वह कैसे प्रवर्त्तक होगा ? परंतु इसका समाधान यह है कि जैसे अयस्कान्त मणि एवं सुन्दररूप आदि स्वतः प्रवृत्तिरहित होनेपर ही लोह तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंके प्रवर्त्तक होते हैं, वैसे ही प्रवृत्तिरहित ब्रह्म भी अचेतनका प्रवर्त्तक होगा । कुछ लोग कहते हैं कि जैसे अचेतन क्षीरकी वत्सवृद्धिके लिये स्वतः प्रवृत्ति होती है, उसी प्रकार अचेतन जलवायु आदिमें भी स्वतः लोकोपकारके

४७६ मार्क्सवाद और रामराज्य लिये प्रवृत्ति होती है।' परंतु यह भी ठीक नहीं। यदि उभयवादिसम्मत रथ आदिमें चेतनाधिष्ठित प्रवृत्ति दृष्ट है, तब तो उसी दृष्टान्तसे क्षीर-जल आदिकी प्रवृत्तिमें भी चेतनाधिष्ठान होनेका अनुमान किया जा सकता है—जलादीनां प्रवृत्ति- श्चेतनाधीना अचेतनप्रवृत्तित्वाद् रथादिप्रवृत्तिवत् । रथादिके समान अचेतनकी प्रवृत्ति होनेसे जलादिकी प्रवृत्ति चेतनाधीन है। क्षीरका प्रवर्तक तो चेतन धेनु ही है। 'योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरः'योऽपोऽन्तरःयमयति'(बृहदा० उप० ३।७।४)एतस्य ००० वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते' (बृ० उ० ३।८।९) यह श्रुति कहती है कि अन्तर्यामी चेतन जलके भीतर रहकर उसका नियमन करता है, उसीके शासनसे नदियाँ बहती हैं। वत्सके चोषणसे भी दुग्धकी प्रवृत्ति होती है, जलके प्रवाहणके लिये निम्नभूमि प्रदेश आवश्यक होता है, चेतनापेक्षा तो सर्वत्र है ही। आधुनिक महायन्त्रोंमें भी मूल-प्रवर्तक चेतन रहता ही है। कुछ लोग कहते हैं, तृण पल्लवादि दूसरे निमित्तोंकी अपेक्षा बिना ही स्वभावसे ही क्षीरादिके रूपमे परिणत होते हैं, उसी तरह प्रकृति या भूत भी स्वभावसे ही विविध प्रपञ्चाकारसे परिणत होता है। क्योकि क्षीर आदि बननेमें दूसरा कोई निमित्त उपलब्ध नहीं होता। यदि कोई निमित्त होता तब तो उन-उन निमित्तोंकोलेकर यथेष्ट क्षीर बनाया जा सकता था। परंतु यह भी कथन ठीक नहीं है, तृणादिका क्षीर आदि परिणाम निष्कारण नहीं है।' धेनुसे खाये हुए तृणादिसे ही क्षीर बनता है। यदि धेनु दुग्ध बननेका असाधारण निमित्त न होती तो धेनुसे अनुपभुक्त या वृषभ आदिसे उपभुक्त तृणसे भी क्षीर बनना चाहिये था। अतएव धेनु आदि निमित्तोंको लेकर दुग्ध यथेष्ट बनाया ही जा सकता है। धेनु एवं उसकी उदर-वह्नि आदि ही तृणादिको क्षीर बनाती हैं। अधिक दुग्ध चाहनेवाले धेनुको पर्याप्त दाना-घास देकर उसे प्राप्त करते हैं। संसारमें कई वस्तु मानुष-सम्पाद्य वस्तुएँ होती हैं और कई देवसम्पाद्य होती हैं। जो लोग प्रकृति-भूतों या परमा- णुओंमें भी चेतन-शक्तिकी कल्पना करते हैं, वे तो फिर जड़वादी नहीं रह जाते। साथ ही अनेक चेतन परमाणुभूत या परमाणु विद्युत्को कारण माननेकी अपेक्षा लाघवार्थ एक व्यापक सर्वशक्ति चेतन ईश्वरको ही कारण मानना कहीं श्रेष्ठ है। जड परमाणुओसे संयुक्त होकर कार्यारम्भके लिये कर्म अपेक्षित होगा। देखा जाता है कि तन्तुओंमें कर्म (हलचल) होता है। तभी संयोग आदिद्वारा पटादिकी उत्पत्ति होती है। कर्म भी कार्य है, अतः उसका भी कोई निमित्त चाहिये। यदि कोई निमित्त न होगा, तो परमाणुमें आद्यकर्म ही नहीं होगा। यदि लोकानुसार प्रयत्न या अभिघातादि परमाणु कर्मका निमित्तमान्य है, तब तो तदर्थ चेतन ईश्वर मानना ही युक्त है। कहा जाता है कि 'ज्ञानस्वरूप ब्रह्मसे प्रपञ्चकी उत्पत्ति इसीलिये नहीं हो सकती कि प्रपञ्च ब्रह्मसे विलक्षण है। सुवर्णसे उत्पन्न मुकुट-कुण्डलादिमें, मृत्तिका-

से उत्पन्न घटादिमे समानता होती है । मृत्तिकासे मुकुट-कुण्डलादि नहीं बनते । जगत् अचेतन है, अतः इसका कारण भी अचेतन होना ठीक है । इस तरह ज्ञानसे विलक्षण होनेसे प्रपञ्च ज्ञानका कार्य नहीं । प्रीति, परिताप, विषादका हेतुभूत प्रपञ्च चेतनका कार्य नहीं हो सकता, किंतु प्रकृतिका ही कार्य होना चाहिये । विपरीत दृष्टान्त भी मिलते ही हैं । लोकमें चेतनत्वेन प्रसिद्ध पुरुष, पशु आदिसे विलक्षण केश, नख आदिकी उत्पत्ति होती है । तथा अचेतनत्वेन प्रसिद्ध गोमय, केश, काष्ठ आदिसे वृश्चिक, यूका, दीमकादिकी उत्पत्ति होती है । इसपर भी कहा जा सकता है कि वस्तुतः अचेतन शरीरोंसे ही अचेतन केश आदिकी उत्पत्ति होती है । इसी तरह गोमयादिसे वृश्चिकादिके अचेतन शरीरकी उत्पत्ति होती है । तो भी उक्त दृष्टान्तोंसे कारण-कार्योंकी विलक्षणता तो सिद्ध ही हो जाती है । गोमयकी अपेक्षा वृश्चिक शरीरमें शरीरकी अपेक्षा केश आदिकी विलक्षणता भोगा- यतन और भोगानायतनरूपसे स्पष्ट ही है । कारण-कार्यमें अति समानता होनेसे तो कार्य-कारणभाव ही नहीं होता । कुछ समानता तो इधर भी है ही । ब्रह्मगत सत्ता स्फूर्ति जगत्में भी अनुगत है ही । मार्क्सवादी तो स्वयं ही अचेतनभूतसे चेतनाकी उत्पत्ति मानते हैं । वे भी गोमयादिसे वृश्चिकादिकी उत्पत्तिका दृष्टान्त उपस्थापित करते हैं । इस दृष्टिसे भी चेतन ब्रह्मसे तद्विलक्षण अचेतन प्रपञ्चकी उत्पत्तिमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती । किंच जैसे पृथिवीत्व जातियुक्त पाषाणोंमें ही हीरक, पद्मराग आदि बहुमूल्य रत्न होते हैं, कोई मध्य वीर्यके सूर्यकान्त आदि मणिहोते हैं, कोई कुत्ता, बगुला, कौवाके हटानेके लायक सामान्य पाषाण होते हैं, बीजोसे ही बहुविधपत्ते, पुष्प, फल, गन्ध, रसादि विचित्र वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, वैसे सभी बीज पार्थिव ही हैं । फिर पृथक् बीजोसे पृथक् ढंगके पत्र, पुष्प, फल, रसादि उत्पन्न होते हैं । एक ही अन्नरसके लोहितादि, रस, केश, नख आदि विचित्र कार्य होते हैं । उसी तरह एक ही ब्रह्मसे विविधवैचित्र्योपेत प्रपञ्चका निर्माण होता है । बौद्धलोग सम्पूर्ण प्रपञ्चको उत्पत्तिके पहले असत् कहते हैं, अर्थात् सत्‌के अभावको ही विश्वका मूल कारण कहते हैं । इस कथनमें यह असंगति है कि असत् है, या असत् था । इस प्रकार असत् या अभावके साथ अस्तित्वका सम्बन्ध कैसे होगा ? क्योंकि सत्‌के साथ ही सत्‌का सम्बन्ध हो सकता है । खपुष्पके तुल्य असत् या अभावके साथ सत्ताका सम्बन्ध सम्भव नहीं । इसी तरह प्रमाण या प्रमाता होनेपर ही भाव या अभावका बोध हो सकता है । यदि प्रमाता एव प्रमाणका अस्तित्व था, तब तो असत् या अभाव कैसे कहा जा सकेगा ? क्योंकि प्रमाता और प्रमाण- का ही अस्तित्व था । यदि प्रमाता-प्रमाण नहीं थे, तब तो फिर अभाव या असत्‌का

४७८ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रबोध भी कैसे हो सकता था ? बीजके उपमर्दन होनेसे अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है, यह देखकर बौद्धलोग अभावसे ही अङ्कुरादि कार्योंकी उत्पत्ति कहते हैं। परंतु यदि ऐसी बात होती, तब तो बीजके दाहसे भी अङ्कुरकी उत्पत्ति होनी चाहिये, क्योकि बीज दाहमें भी तो बीजका उपमर्दन या अभाव हुआ ही। अतः बीजके अवयव ही अङ्कुरके कारण हैं । बीज अङ्कुरोत्पत्तिके पूर्वकी अवस्था है। जैसे घटोत्पत्तिके पहले मृत्तिकाकी पिण्डावस्था होती है। पिण्डमें, घटमें, कपालमें जो व्यापक है, वह मृत्तिका ही सबका कारण है । पिण्डादि सब मृत्तिकाके कार्य ही है । उसी तरह बीजावयव ही बीज एवं अङ्कुरादिमें व्यापक होनेसे वही कारण है । पिण्ड या बीज, घट-अङ्कुरादिमें व्यापक नहीं हैं, अतः वे कारण नही हैं। एक कारणमें युगपत् विरुद्ध अनेक कार्य नहीं हो सकते, अतः एक कारणसे होनेवाले कार्योंमें क्रमभाविता है। पिण्ड, घट, कपाल, बीज, अङ्कुर, नाल, स्कन्ध, शाखोपशाखादि कार्य क्रमसे ही होते हैं। जो कहते हैं कि पिण्ड, कपालादि कार्योंसे भिन्न होकर कारण मृत्तिका कुछ भी नहीं है, उन्हे अन्वय व्यतिरेकादि प्रमाणोंपर अवश्य ध्यान देना चाहिये। जैसे पुष्पोंके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी उनमें अनुवृत्त सूत्र उनसे भिन्न होता है, वैसे ही पिण्ड, घट, कपालादिके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी सबमें अनुवृत्त मृत्तिका स्पष्ट ही उन कार्योंसे पृथक् है। अतः इस कारणको असत् नहीं कहा जा सकता । इसी तरह उत्पत्तिके पहले कार्य भी सत् ही रहता है। जैसे अविज्ञात ही घट विज्ञात होता है, वही ज्ञायमान होता है और वही विस्मृत होता है और फिर उसीका स्मरण भी होता है। इसी तरह सामग्रीके अभावसे या कुड्यादि दीवाल आदि आवरणसे वर्तमान रहता हुआ भी घट प्रतीत नहीं होता है। पिण्डमें घट रहता हुआ भी आवृत्त होनेसे उपलब्ध नहीं होता। जैसे एक ही आकाशमें चन्द्र प्रकाश सौर्य प्रकाशसे आवृत्त होता है, एक ही घटमें नीर क्षीरसे आवृत्त होता है,वैसे ही एक देशस्थ ही घट पिण्डसे आवृत्त रहता है। एक ही मिट्टीमें पिण्ड आदि सहस्रों कार्य हैं, जिसकी अभिव्यक्तिकी सामग्री उपस्थित होती है, वही अभिव्यक्त होता है, अन्य आवृत्त रहते हैं। इस तरह पिण्डसे घट, घटसे कपाल, कपालसे घट आदि आवृत्त होते हैं। लोकमें अनेक ढंगसे अभिव्यक्ति होती है, दीपसे रूपकी अभिव्यक्ति होती है । दण्ड, चक्र, कुलालादिसे घट अभिव्यक्त होता है। जैसे दीपसे आवरणनाशके अतिरिक्त घट सप्रकाश बनाया जाता है, वैसे ही कुलालादि- द्वारा आवरणभङ्गके साथ घटाभिव्यक्ति हो जाती है । इसीलिये शिलाघातसे पिण्ड-भङ्ग होनेपर भी कुलालादि बिना घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती।

जैसे अज्ञानताकी निवृत्तिके लिये प्रमातालोग प्रमाणका उपादान करते हैं, प्रमाणके सम्बन्धसे प्रमेयकी अज्ञातता नष्ट होती है, प्रमातामे प्रमाणकी अभिव्यक्ति होती है। निष्पन्न प्रमाण प्रमेयमे सङ्गत होकर उसी तरह प्रमेयाकार हो जाता है, जैसे कुल्या ( नहर ) का जल नालियोद्वारा क्षेत्रमे जाकर क्षेत्राकार हो जाता है, प्रमाणके प्रमेयाकार होनेसे अज्ञानताके नष्ट होनेसे प्रमेयकी अभिव्यक्ति होती है। इसी तरह दीपप्रकाशसे घट सप्रकाश होता है। वही घटनिष्ठ प्रकाश घटनिष्ठ तम- का अपनোদন करता है। इसी तरह मृत्तिकामें स्थित घटाकार दण्ड-चक्रादिसे स्फुट होता है। शिलादिसे पिण्डभङ्ग होनेपर दूसरे चूर्णादि कार्य सम्पन्न हो जाते हैं, वे भी घटके आवरण ही हैं, अतः घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती । इसीलिये भिन्न-भिन्न घटादि कार्योंकी अभिव्यक्तिके साधन नियत हैं । प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव आदि भी अन्योन्याभावके तुल्य ही भावरूप हैं । जैसे घटान्योन्याभाव घटरूप ही है वैसे ही प्रागभाव पिण्डरूप है। प्रध्वंसाभाव कपालादिरूप है। भावान्तर ही किसी दृष्टिसे अभाव कहा जाता है—'भावान्तर- मभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया ।' जो प्रागभाव, प्रध्वंसाभावको शून्य ही कहता है, उससे यह भी प्रश्न होगा कि उन दोनोंमें भेद है या नहीं ? यदि कहा जाय कि भेद नहीं है, तो भेद- व्यवहार क्यों है ? अगर भेद है तो उन दोनोंका भेदक क्या है ? अगर विलक्षण स्वरूपको ही भेदक कहे तो भी ठीक नहीं, क्योंकि शून्यमात्रमें विलक्षणस्वरूपता क्या हो सकती है ? विलक्षणस्वरूपता हो तो शून्यता भी कैसी होगी ? शून्यके साथ उपाधि सम्बन्ध भी नहीं बन सकता, अतः औपाधिक भेद भी नहीं कहा जा सकता । 'घट-प्रागभावकी पिण्ड ही उपाधि है' ऐसा कहें, तो उसमें प्रमाण बतलाना पडेगा। यदि प्रत्यक्ष-प्रमाण कहें, तो भी ठीक नहीं, कारणरूप तथा स्पर्शहीन प्राग- भावके साथ चक्षु आदिका सम्बन्ध सम्भव नहीं है। अतः प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता। यदि पिण्डके दर्शनसे ही प्रागभावका दर्शन मानें, तब तो प्रागभावके भाव रूप माननेसे ही सब काम चल ही सकता है। 'स्वरूपपररूपाभ्यां नित्य सद्सदात्मकम्' इस दृष्टिसे अभाव या असत्‌से जगत् या कार्यकी उत्पत्ति असङ्गत है, किंतु स्व- प्रकाश चेतन ब्रह्मसे ही पूर्वोक्त युक्तियोमे जगत्‌की उत्पत्ति सङ्गत है । इसी तरह अचेतन अदृष्ट आदि भी चेतनके बिना कर्मके कारण नहीं हो सकते । परमाणु यदि सावयव हैं, तब तो वे भी कार्य एवं अनित्य ही होंगे । उनकी उत्पत्तिमें कारणान्तर ढूँढना पड़ेगा । यदि निरवयव हैं, तब तो उनका दूसरे परमाणुओंसे संयोग होनेपर परिमाणवृद्धि न होगी, क्योंकि एक देशसे संयोग होनेपर तो संयोगसे अव्याप्त देशोद्वारा प्रथिमा ( विस्तार ) हो सकता है । परन्तु इस दशामें सावयवत्व, अनित्यत्वादि-दोष होते हैं । निरवयवका तो सम्पूर्णरूपसे ही

अव्यवधानेन संयोग मानना होगा तथा च एक दूसरेहीमें समा जायेंगे, वृद्धिकी कोई आशा नहीं होती। इसके अतिरिक्त ससारमें प्रदेशवाले पदार्थोंका ही संयोग होता है, फिर निष्प्रदेश, निरवयव परमाणुओंका संयोग भी कैसे होगा ? इसी तरह परमाणुओंको प्रवृत्तिस्वभाव, निवृत्तिस्वभाव, उभयस्वभाव या अनुभयस्वभाव मानना पड़ेगा, परंतु इनमें कोई पक्ष ठीक नहीं है। प्रवृत्तिस्वभाव है, तब तो नित्य ही प्रवृत्ति होनेसे वस्तुनाशरूप प्रलय नहीं होगा। निवृत्तिस्वभाव होनेसे कभी सृष्टि न होगी। विरोधात् उभयस्वभाव भी नहीं कहा जा सकता । अनुभयस्वभाव कहेंगे तब तो दूसरे किसी निमित्तसे उनकी प्रवृत्ति माननी पड़ेगी, फिर वहीं सर्वज्ञ चेतन अपेक्षित होगा। इसके अतिरिक्त लोकमें रूपादिमान् वस्तु अपने कारणकी अपेक्षा स्थूल एवं अनित्य होती है। जैसे पट तन्तुओंकी अपेक्षा स्थूल एवं अनित्य होते हैं। अंशुओंकी अपेक्षा तन्तु स्थूल तथा अनित्य होते हैं। परमाणु भी यदि रूपादिमान् हैं, तो उनका भी कारण होना चाहिये और उसकी अपेक्षा उनमे स्थूलता एवं अनित्यता भी होनी चाहिये। इसके अतिरिक्त यह भी देखा जाता है कि गन्ध, रस, रूप, स्पर्श गुण- संयुक्त पृथ्वी स्थूल है। तदपेक्षया रूप, रस, स्पर्श गुणसंयुक्त जल सूक्ष्म है। इसीप्रकार रूप, स्पर्श गुणवाला तेज एवं स्पर्श गुणवाला वायु और भी सूक्ष्म है। तद्वत् पृथिव्यादि परमाणुओंमें सूक्ष्मता, स्थूलताका तारतम्य होना चाहिये। यदि गुणोंकी अधिकतासे पृथ्वी, जल परमाणुमें मूर्तिवृद्धि होगी, तब फिर वे परमाणु ही क्या रहेंगे ? जब कार्योंमें गुणोंके उपचयसे मूर्तिवृद्धि होती है तो परमाणुमें भी गुणो- पचयसे मूर्तिवृद्धि क्यों न होगी ? यदि परमाणुओंमें गन्धादिगुण न मानें तो उनके कार्योंमे ही गन्धादि कहाँसे आयेंगे ? क्योकि कारण गुण ही कार्यगुणोंके आरम्भक माने जाते हैं। यदि सबमे एक ही गुण माने जायँ, तब तो पृथ्वीमें रस, जलमें रूप, तेजमे स्पर्श नही उपलब्ध होने चाहिये। यदि समताके लिये सभीको गन्धादि चारों गुणोंसे युक्त मानेंगे, तब तो जलसे भी गन्ध एवं तेजमें भी गन्ध, रस उपलब्ध होने चाहिये। वायुमें भी रस-गन्धका उपलम्भ होना चाहिये, परंतु ऐसा होता नहीं। द्रव्य एवं गुण यदि अत्यन्त भिन्न हों, तो जैसे पुष्प-पलाशादि भिन्न हैं, स्वतन्त्र हैं, वैसे ही गुण भी द्रव्यसे पृथक् स्वतन्त्र होने चाहिये। परंतु यहाँ तो गुण द्रव्य-परतन्त्र ही होता है। द्रव्यके साथ-साथ सहभाव होनेसे द्रव्यमात्र ही गुण है, यही मानना ठीक है। धूम, अग्निके समान-द्रव्य-गुणमें भेद नहीं प्रतीत होता- इसी प्रकार कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय भी द्रव्य ही है। जैसे एक ही देवदत्त विभिन्न सम्बन्धिरूपोंकी अपेक्षासे मनुष्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, बाल, युवा, वृद्ध, पिता, पुत्र, पौत्र, भ्राता या जामाता आदि रूपसे कहा

जाता है, जैसे एक ही अङ्क स्थानविशेषके योगसे दस शत, सहस्र आदि शब्दोंसे व्यवहृत होता है । विचार करनेपर कारणसे भिन्न होकर कुछ नहीं होता । मिट्टीसे भिन्न होकर घटादि पदार्थ उपलब्ध नहीं होते । जन्मके पहले प्रध्वंसके पश्चात् कार्यकी उपलब्धि नहीं होती, अन्तःकरणसे भिन्न उनकी सत्ता नहीं होती । सद्बुद्धि तथा असद्बुद्धि- दोनों ही सर्वत्र उपलब्ध होती हैं । जिस विषयकी बुद्धि कभी भी व्यभिचरित नहीं होती, वही सद्बुद्धि और जिस विषयकी बुद्धि व्यभिचरित होती है, वह असद्बुद्धि होती है। 'नीलम् उत्पलम्' के तुल्य 'सन् घटः, सन् पटः, सन् हस्ती', इसी तरह सन्- सन् सर्वत्र घटादिमें सद्बुद्धि बनी रहती है। घटादि बुद्धि व्यभिचरित होती है, अतएव घटादि बुद्धिके विषय घटादि असत् हैं, क्योंकि उसका व्यभिचार होता है । सद्बुद्धिका विषय सत् है, क्योंकि उसका व्यभिचार नहीं होता । कहा जा सकता है कि घट नष्ट होनेपर तो घटबुद्धि व्यभिचरित (बाधित) हो ही जाती है, परन्तु यह कहना ठीक नहीं, कारण पटादिमें सद्बुद्धि रहती ही है । 'सन् घटः' 'सन् पटः' इस रूपसे घट, पट विशेष्यरूपसे, सन् विशेषण रूपसे प्रतीत होता है । घटके नष्ट हो जानेपर विशेष्य न रहनेपर विशेषणबुद्धि नहीं होती । जैसे गो व्यक्ति न रहनेपर अभिव्यञ्जक न रहनेसे गोत्वकी प्रतीति नहीं होती, यह नहीं कि गोत्व नहीं रह गया । वैसे ही गोत्वके समान सत्‌के विद्यमान होते हुए भी अभिव्यञ्जकविशेष्य घटादि न रहनेपर सत् प्रतीत नहीं होता । इसीलिये यह भी नहीं कहा जा सकता कि जैसे घट नष्ट होनेपर पट आदिमें सद्बुद्धि बनी रहती है, वैसे ही घटबुद्धि भी घटान्तरमें बनी रहती है, क्योंकि भले घटान्तरमें घटबुद्धि बनी रहे, परन्तु फिर भी पटादिमें तो घटबुद्धिका व्यभिचार है ही, परन्तु सद्बुद्धिका तो कहीं भी व्यभिचार नहीं होता । कहा जा सकता है कि घट नष्ट हो जानेपर उसमें सद्बुद्धि भी नहीं रहती, परन्तु यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि विशेष्य न रहनेसे सद्बुद्धि नहीं होती । सद्बुद्धि विशेषणविषया होती है, विशेष्य नहीं होनेसे विशेषणता नहीं बनती । फिर सद्बुद्धि कैसे हो सकती है ? यह नहीं कहा जा सकता कि सद्बुद्धिका विषय सत् रहा ही नहीं, इसलिये सद्बुद्धि नहीं रहती । यहाँ यह शङ्का होती है कि घटादि विशेष्य असत् हैं, तो उसके साथ सत्- का सामानाधिकरण्य नहीं होना चाहिये ? परन्तु इसका समाधान यह है कि जैसे रज्जु-सर्पके सम्बन्धमें सर्पके बाधित होनेपर भी इदमंशके साथ 'अयं सर्पः' सामाना- धिकरण्य-व्यवहार होता है । इसी तरह घटादिके असत् होनेपर भी 'घटः सन्, पटः सन्' इस रूपसे अबाधित सत्‌के साथ असद् घटादिका सामानाधिकरण्य व्यवहार बन जाता है । मा० रा० ३१—

४८२ मार्क्सवाद और रामराज्य

पूँजीका स्वरूप

कहा जाता है कि 'अर्थशास्त्रके क्षेत्रमे पूँजी स्वयं उदाहरण है। वह धनका एक निम्नतम परिमाण है, जिसके रहनेपर ही उसका स्वामी पूँजीपति कहला सकता है। मार्क्सने उद्योगकी किसी शाखाके एक श्रमिकका उदाहरण लिया है, जो आठ घंटेतक अपने लिये अर्थात् अपनी मजदूरीका अर्थ उत्पन्न करनेके लिये श्रम करता है और चार घंटे अतिरिक्त अर्थ पैदा करनेके लिये जो उसके मालिक- की जेबमे जाता है। इस विशेष दृष्टान्तमें यदि पूँजीपति अपने अतिरिक्त अर्थके द्वारा मजदूर-श्रेणीका जीवन भी बिताना चाहता है तो उसके पास इतना धन होना चाहिये कि वह दो मजदूरोंके लिये मजदूरी, कच्चा माल तथा उत्पादनके साधनोका बदोबस्त कर सके। लेकिन पूँजीपतिका उद्देश्य केवल जीना नहीं है, बल्कि अपनी सम्पत्तिकी वृद्धि करना है। इसलिये इस धनका मालिक अभी पूँजीपति नहीं है। अब यदि पूँजीपतिको मजदूरसे दुगुना अच्छा जीवन व्यतीत करना है और अतिरिक्त अर्थका आधा कारोबारमें फिर डालना है तो उसे आठ मजदूरोको काममे लगाना चाहिये और पहले अर्थ-संग्रहका चौगुना कारोबारमें लगाना चाहिये। अब यह अर्थसंग्रह पूँजीका आकार ले लेता है। इस प्रकार अर्थ- संग्रहका परिमाण बढते-बढते एक सीमापर वह पूँजीके रूपमें परिणत हो जाता है।' परन्तु यह कहना ठीक नहीं, कारण, मार्क्सका अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त मूल्यकी कल्पना ही निराधार है, इसका विवेचन पीछे हो चुका है। यह भी कहा जा चुका है कि व्यापार या उद्योगद्वारा धनार्जनका तरीका ही इस प्रकार- का होता है जिसमे बुद्धिमानीसे एक मृतमूषिकोद्धारा भी कोटिपति बन जा सकता है। मार्क्सके मतानुसार उत्पादन-साधन ही पूँजी है, उसकी मात्रा अल्प हो या बड़ी। इसीलिये किसानोके खेत भी उत्पादन-साधन हैं। इस दृष्टिसे किसान भी पूँजीपति रहते हैं। समाज-विज्ञानके क्षेत्रमें इस गुणात्मक परिवर्तनकी गवाहीके लिये एंजिल्सने नेपोलियनको साक्षी माना है। वह कहता है कि 'फ्रांसीसी घुड़सवार, जो नियन्त्रित सिपाही थे, लेकिन कोई अच्छे घुड़सवार नही थे और मामेलुक जो बहुत अच्छे घुडसवार थे लेकिन जिनमें नियन्त्रण नही था। उनकी लडाईके सिलसिलेमें दो मामेलुक आसानीसे तीन फ्रांसीसियोका मुकाबला कर सकते थे। सौ मामेलुक सौ फ्रांसीसियोके बराबर थे। लेकिन ३०० फ्रांसीसी साधारणतया ३०० मामेलुकोको हरा देते थे। और १ हजार फ्रांसीसी १५ सौ मामेलुकोको हरा देते थे। पहलेके उदाहरणकी तरह इससे यह स्पष्ट है कि नियन्त्रित सिपाहियोंके जत्थेके परिमाणके बढ़नेपर उसका किस प्रकार गुणात्मक परिवर्तन होता है और वह अपनेसे अधिक संख्याकी फौज हरा देता है।'

परन्तु इससे भी यही सिद्ध होता है कि अनियन्त्रण, अनुशासनहीनता अल्प- संख्यकोंमें इतनी हानिकर नहीं होती जितनी कि बहुसंख्यकोंमें । उसी प्रकार नियन्त्रणका गुण अल्पसंख्यकोंमें भले कुछ प्रकट हो, किंतु बहुसंख्यकोंमें अधिकरूपसे फलदायी होता है । नियन्त्रित संघटित समुदाय शक्तिशाली होता है। तृणादिनिर्मित रज्जु ही इसका दृष्टान्त है । परिणामवादानुसारी सत्- कार्यवादमें कोई भी विद्यमान ही गुण किसी अवस्थाविशेषमें प्रकट होता है । सिकतामें तेल नहीं होता, अतः कभी नहीं व्यक्त होता । तिलमें तेल होता है, अत. वह कभी प्रकट होता है । वेदान्त-मतानुसार कारणकी अपेक्षा कार्यमें भिन्नता न होनेपर भी कुछ अनिर्वचनीय गुण भी सिद्ध होते हैं । जैसे मृत्तिकाद्वारा जला- नयन नहीं होता, फिर भी मृत्तिकानिर्मित घटादिद्वारा जलानयन आदि कार्य होते हैं । तन्तुद्वारा अङ्गप्रावरण, शीतापनयन नहीं होता, फिर भी तन्तुनिर्मित पट- द्वारा वह कार्य होता है। आकाशमे स्पर्श नहीं होता, फिर भी तन्निर्मित वायुमें स्पर्शगुण है, वायुमें रूप नहीं तथापि वायुपरिणामभूत तेजमें रूप गुण उपलब्ध होता है। इसी तरह एक-एक व्यक्ति या अल्प व्यक्तिमें जो गुण नहीं व्यक्त होते, अधिक- संख्यक उन्हीं व्यक्तियोंमें वे गुण प्रकट होते हैं । इसी तरह एक या अन्य व्यक्तियो- में अनियन्त्रणका जो दुष्परिणाम नहीं व्यक्त होता, बहुसंख्यकोंमें वह दुष्परिणाम स्पष्ट हो जाता है ।

प्रतिषेधका प्रतिषेध

इसी तरह प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण मार्क्सवादी उपस्थित करते हैं कि 'यदि यवका एक दाना जमीनमें डाला जाय तो गर्मी और नमीके प्रभावसे इसमे एक विशेष परिवर्तन होता है। इसमेंसे पौधा उगने लगता है। उस दानेके अस्तित्वका अन्त हो जाता है। उसका प्रतिषेध हो जाता है । उसके स्थानपर जो पौधा उगता है, वह उस दानेका प्रतिषेध है । वह पौध बढता है, उसमे फल आते हैं और फिर उसमे यवके दाने उत्पन्न होते हैं, लेकिन इन दानोंके पकनेके साथ ही उस पौधेका भी अन्त हो जाता है । अब प्रतिषेधका प्रतिषेध होकर नये यवके दाने हो गये । एक ही दाना नहीं, बल्कि मूल दानेका दस, बीस या तीस गुना ।' इसी तरह पतंगोंके सम्बन्धमें उनका कहना है कि 'ये अंडेने निकलते हैं। उसके प्रतिषेधके बाद ये पतंगे बढकर पूर्ण यौन विकासको प्राप्त होते हैं और यौन सम्बन्धमे अंडे पैदा होकर मर जाते हैं। प्रतिषेधका प्रतिषेध करके फिर अंडे पैदा हो गये, एक नहीं अनेक ।' इस सम्बन्धमें पीछे कहा जा चुका है कि बीज विनाश या बीज प्रतिषेध अङ्कुरादि कार्यका कारण नहीं है, किंतु बीजके अवयव ही अङ्कुरके कारण हैं,

४८४ मार्क्सवाद और रामराज्य क्योकि उनका ही अनुवेध कार्यमें होता है। बीजके विनाशका कारण यह है कि एक उपादान कारणमें एक कार्यकी अभिव्यक्ति होनेपर कार्यान्तरोकी निवृत्ति होती है। बीज भी एक अवयवोकी ही कार्यावस्था है। अङ्कुररूप कार्यकी अभिव्यक्तिसे उसकी निवृत्ति आवश्यक है। जहाँ पूर्व कार्यकी निवृत्ति आवश्यक नही है, वहाँ प्रतिषेधके प्रतिषेधका कोई अर्थ नहीं है। आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती है, फिर भी आकाश नही निवृत्त होता। वायुसे तेजकी उत्पत्ति होती है, परंतु वायुकी निवृत्ति नहीं होती। मृत्तिकासे घट उत्पन्न होता है, किंतु मृत्तिकाकी निवृत्ति नहीं होती। आम्रादि वृक्षोसे फलोकी उत्पत्ति होती है, परंतु वृक्षोका नाश या प्रतिषेध नहीं होता। मनुष्य-पशु आदिसे ही दूसरे मनुष्य-पशु आदि उत्पन्न होते हैं, परंतु उत्पादकोका विनाश नही होता। भूतोकी उत्पत्तिका सिद्धान्त यह है कि कारण व्यापक, सूक्ष्म तथा स्वच्छ एव निर्गुण, निर्विशेष है। कार्य व्याप्य, स्थूल, अस्वच्छ, सगुण एव सविशेष है। परंतु साख्यमतानुसार कार्यकी विशेषताओंकी भी अभिव्यक्ति ही होती है, उत्पत्ति नही। अत्यन्त असत्की उत्पत्ति नही होती— यह बात सत्कार्यवादके प्रसङ्गमे कही जा चुकी है। वेदान्तमतानुसार जो आदिमे तथा अन्तमें नही होती, मध्यमें प्रतीत होती है, वह वस्तु रज्जु-सर्प आदिके तुल्य सदसद्विलक्षण अतएव अनिर्वचनीय ही होती है। वह शुक्ति रजतादि मिथ्या पदार्थोंके समान होनेपर भी सत्य-सी प्रतीत होती है। आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः॥ (माण्डू०का०२।६) परिणाम- वादमे कारणको कार्याकारतया परिणत होनेके लिये कारणमे आवश्यक विचार होना ही चाहिये। एतावता अन्तर्विरोध या प्रतिषेध कार्यका कारण नहीं हो जाता। यदि प्रतिषेध कारण होता तो सर्वत्र वह सुलभ ही, है, फिर कार्योत्पत्तिके लिये कारणोपादान ही व्यर्थ होगा। यदि प्रतिषेध ही कार्योत्पत्तिका कारण होता तो दग्ध बीजसे भी कार्योत्पत्ति होनी चाहिये थी, क्योंकि दाहसे भी बीजका प्रतिषेध हुआ ही। हम स्पष्ट देखते हैं कि कार्यके लिये कार्यार्थी तत्कारणोंका अन्वेषण करते हैं। वेदान्तानुसार कारण ब्रह्म ही अनिर्वचनीय माया एवं तदंश विभिन्न उपाधियों- द्वारा कार्याकारेण विवर्तित होता है। अंडे भी पतंगोके फल हैं, प्रतिषेधरूप नहीं। कहा जाता है कि मूल वस्तुके अन्तर्विरोध ( विध्वंस ) से समन्वयद्वारा वस्त्वन्तरकी उत्पत्ति होती है—'नानुपमृद्य प्रादुर्भावात्' विनष्ट बीजसे ही अङ्कुर उत्पन्न होता है। मृतपिण्डके उपमर्दनसे ही घट निर्माण होता है। विनष्ट क्षीरसे ही दधिका निर्माण होता है। यदि कूटस्थ कारणसे ही कार्य उत्पन्न हो तब तो अविशेषेण सभीसे सब कार्यकी उत्पत्ति होने लगे। अर्थात् कूटस्थ कारणका यदि कार्य-जनन स्वभाव है तब तो तत्काल ही उससे कार्य उत्पन्न होना चाहिये, कालक्षेप न होना चाहिये। यदि कूटस्थ कारणमे कार्यजनक स्वभाव नहीं है, तब उससे कभी भी कार्य न उत्पन्न होना चाहिये। यदि कहा जाय कि समर्थ होते हुए भी

मार्क्स-दर्शन ४८५ क्रमेण सहकारियोंकी अपेक्षासे ही कार्य उत्पन्न होता है, परन्तु सहकारी कुछ उपकार करते हैं या नहीं ? यदि नहीं तो वे सहकारी ही क्यों होंगे ? यदि उपकारका आधान करते हैं तो भी भिन्न या अभिन्न उपकारका आधान करेंगे । यदि उपकार अभिन्न हैं तब तो वह कूटस्थ कारणका ही स्वरूप ठहरा । फिर कार्यमें विलम्ब क्यों होना चाहिये ? यदि उपकार भिन्न है, तब तो उस उपकारके होनेपर ही कार्य होता है, उसके अभावमें कार्य नहीं होता । फिर तो अन्वय-व्यतिरेकसे उपकार ही कार्यका कारण हुआ । कूटस्थ कारणके रहनेपर भी कार्य नहीं होता, अतः कूटस्थ उत्पादक नहीं हुआ— वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्यस्ति तयोः फलम् । चर्मोपमश्चेत् सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलः ॥ ( नैष्कर्म्यसिद्धि एव सर्वदर्शनसंग्रह ) अतः अभावग्रस्तबीज आदिसे ही कार्यकी उत्पत्ति होती है । ब्रह्मात्मवादी इसका भी खण्डन करते हैं । उनका कहना है कि अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं हो सकती, यदि अभावसे भाव उत्पन्न हो तब तो अभाव सर्वत्र सुलभ ही है, फिर कारण-विशेषकी कल्पना व्यर्थ ही होगी । उपमर्दित बीजोंका अभाव एव शशविषाण दोनो ही समानरूपसे निःस्वभाव हैं । अतः उनके अभावत्वमें भी कोई भेद नहीं है । फिर बीजमे अङ्कुर, क्षीरसे दधिके उत्पन्न होनेका नियम व्यर्थ ही है। यदि निर्विशेष अभाव कारण है तब तो शशविषाण, खपुष्पादिसे भी अङ्कुरादिकी उत्पत्ति होनी चाहिये, परन्तु ऐसा होता नहीं । यदि उत्पलमें नीलत्वके तुल्य अभावमे कुछ विशेषता स्वीकृत है तब तो विशेषवान् होनेसे अभाव भाव ही हो जायगा । विशेष्यवान् होनेसे उत्पल जैसे भाव है, वैसे ही विशेष्यवान् होनेसे अभाव भी भाव ही हो जायगा । और फिर तो अभाव कार्य उत्पत्तिका हेतु भी नहीं हुआ, जैसे शशविषाणादि किसीका हेतु नहीं होता । इसके अतिरिक्त यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तब तो हर एक कार्यमें अभावका ही अन्वय दिखायी देना चाहिये, परन्तु देखा जाता है कि इसके विपरीत सभी कार्य भावरूपसे ही उपलब्ध होते हैं । जैसे मृत्तिकासे अन्वित घटादिको तन्तु आदिका विकार नहीं कहा जाता, किंतु मृत्तिकाका ही विकार कहा जाता है; वैसे ही भावान्वित कार्य भावके ही विकार हैं, अभावके नहीं । जो कहा जाता है 'स्वरूप-उपमर्दके बिना किसी भी कूटस्थ कारणमे कार्य- की उत्पत्ति नहीं होती, अतः अभावसे भावकी उत्पत्तिका सिद्धान्त ही ठीक है'— यह कहना भी ठीक नहीं । स्थिर स्वभाववाले सुवर्ण, मृत्तिका आदि स्पष्टरूपमे कार्यमें प्रत्यभिज्ञात होते हैं, अतः स्थिरभावमें ही कार्य-कारणभाव मानना युक्त है। बीज आदिका उपमर्द देखा जाता है, इससे उपमृद्यमाना पूर्वावस्था उत्तरावस्थाका कारण नही है, किंतु अनुपमृद्यमान बीजावयव ही अङ्कुरादिमें अनुगत होकर कारण