भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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से उत्पन्न घटादिमे समानता होती है । मृत्तिकासे मुकुट-कुण्डलादि नहीं बनते । जगत् अचेतन है, अतः इसका कारण भी अचेतन होना ठीक है । इस तरह ज्ञानसे विलक्षण होनेसे प्रपञ्च ज्ञानका कार्य नहीं । प्रीति, परिताप, विषादका हेतुभूत प्रपञ्च चेतनका कार्य नहीं हो सकता, किंतु प्रकृतिका ही कार्य होना चाहिये । विपरीत दृष्टान्त भी मिलते ही हैं । लोकमें चेतनत्वेन प्रसिद्ध पुरुष, पशु आदिसे विलक्षण केश, नख आदिकी उत्पत्ति होती है । तथा अचेतनत्वेन प्रसिद्ध गोमय, केश, काष्ठ आदिसे वृश्चिक, यूका, दीमकादिकी उत्पत्ति होती है । इसपर भी कहा जा सकता है कि वस्तुतः अचेतन शरीरोंसे ही अचेतन केश आदिकी उत्पत्ति होती है । इसी तरह गोमयादिसे वृश्चिकादिके अचेतन शरीरकी उत्पत्ति होती है । तो भी उक्त दृष्टान्तोंसे कारण-कार्योंकी विलक्षणता तो सिद्ध ही हो जाती है । गोमयकी अपेक्षा वृश्चिक शरीरमें शरीरकी अपेक्षा केश आदिकी विलक्षणता भोगा- यतन और भोगानायतनरूपसे स्पष्ट ही है । कारण-कार्यमें अति समानता होनेसे तो कार्य-कारणभाव ही नहीं होता । कुछ समानता तो इधर भी है ही । ब्रह्मगत सत्ता स्फूर्ति जगत्में भी अनुगत है ही । मार्क्सवादी तो स्वयं ही अचेतनभूतसे चेतनाकी उत्पत्ति मानते हैं । वे भी गोमयादिसे वृश्चिकादिकी उत्पत्तिका दृष्टान्त उपस्थापित करते हैं । इस दृष्टिसे भी चेतन ब्रह्मसे तद्विलक्षण अचेतन प्रपञ्चकी उत्पत्तिमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती । किंच जैसे पृथिवीत्व जातियुक्त पाषाणोंमें ही हीरक, पद्मराग आदि बहुमूल्य रत्न होते हैं, कोई मध्य वीर्यके सूर्यकान्त आदि मणिहोते हैं, कोई कुत्ता, बगुला, कौवाके हटानेके लायक सामान्य पाषाण होते हैं, बीजोसे ही बहुविधपत्ते, पुष्प, फल, गन्ध, रसादि विचित्र वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, वैसे सभी बीज पार्थिव ही हैं । फिर पृथक् बीजोसे पृथक् ढंगके पत्र, पुष्प, फल, रसादि उत्पन्न होते हैं । एक ही अन्नरसके लोहितादि, रस, केश, नख आदि विचित्र कार्य होते हैं । उसी तरह एक ही ब्रह्मसे विविधवैचित्र्योपेत प्रपञ्चका निर्माण होता है । बौद्धलोग सम्पूर्ण प्रपञ्चको उत्पत्तिके पहले असत् कहते हैं, अर्थात् सत्‌के अभावको ही विश्वका मूल कारण कहते हैं । इस कथनमें यह असंगति है कि असत् है, या असत् था । इस प्रकार असत् या अभावके साथ अस्तित्वका सम्बन्ध कैसे होगा ? क्योंकि सत्‌के साथ ही सत्‌का सम्बन्ध हो सकता है । खपुष्पके तुल्य असत् या अभावके साथ सत्ताका सम्बन्ध सम्भव नहीं । इसी तरह प्रमाण या प्रमाता होनेपर ही भाव या अभावका बोध हो सकता है । यदि प्रमाता एव प्रमाणका अस्तित्व था, तब तो असत् या अभाव कैसे कहा जा सकेगा ? क्योंकि प्रमाता और प्रमाण- का ही अस्तित्व था । यदि प्रमाता-प्रमाण नहीं थे, तब तो फिर अभाव या असत्‌का