भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 789

४७६ मार्क्सवाद और रामराज्य लिये प्रवृत्ति होती है।' परंतु यह भी ठीक नहीं। यदि उभयवादिसम्मत रथ आदिमें चेतनाधिष्ठित प्रवृत्ति दृष्ट है, तब तो उसी दृष्टान्तसे क्षीर-जल आदिकी प्रवृत्तिमें भी चेतनाधिष्ठान होनेका अनुमान किया जा सकता है—जलादीनां प्रवृत्ति- श्चेतनाधीना अचेतनप्रवृत्तित्वाद् रथादिप्रवृत्तिवत् । रथादिके समान अचेतनकी प्रवृत्ति होनेसे जलादिकी प्रवृत्ति चेतनाधीन है। क्षीरका प्रवर्तक तो चेतन धेनु ही है। 'योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरः'योऽपोऽन्तरःयमयति'(बृहदा० उप० ३।७।४)एतस्य ००० वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते' (बृ० उ० ३।८।९) यह श्रुति कहती है कि अन्तर्यामी चेतन जलके भीतर रहकर उसका नियमन करता है, उसीके शासनसे नदियाँ बहती हैं। वत्सके चोषणसे भी दुग्धकी प्रवृत्ति होती है, जलके प्रवाहणके लिये निम्नभूमि प्रदेश आवश्यक होता है, चेतनापेक्षा तो सर्वत्र है ही। आधुनिक महायन्त्रोंमें भी मूल-प्रवर्तक चेतन रहता ही है। कुछ लोग कहते हैं, तृण पल्लवादि दूसरे निमित्तोंकी अपेक्षा बिना ही स्वभावसे ही क्षीरादिके रूपमे परिणत होते हैं, उसी तरह प्रकृति या भूत भी स्वभावसे ही विविध प्रपञ्चाकारसे परिणत होता है। क्योकि क्षीर आदि बननेमें दूसरा कोई निमित्त उपलब्ध नहीं होता। यदि कोई निमित्त होता तब तो उन-उन निमित्तोंकोलेकर यथेष्ट क्षीर बनाया जा सकता था। परंतु यह भी कथन ठीक नहीं है, तृणादिका क्षीर आदि परिणाम निष्कारण नहीं है।' धेनुसे खाये हुए तृणादिसे ही क्षीर बनता है। यदि धेनु दुग्ध बननेका असाधारण निमित्त न होती तो धेनुसे अनुपभुक्त या वृषभ आदिसे उपभुक्त तृणसे भी क्षीर बनना चाहिये था। अतएव धेनु आदि निमित्तोंको लेकर दुग्ध यथेष्ट बनाया ही जा सकता है। धेनु एवं उसकी उदर-वह्नि आदि ही तृणादिको क्षीर बनाती हैं। अधिक दुग्ध चाहनेवाले धेनुको पर्याप्त दाना-घास देकर उसे प्राप्त करते हैं। संसारमें कई वस्तु मानुष-सम्पाद्य वस्तुएँ होती हैं और कई देवसम्पाद्य होती हैं। जो लोग प्रकृति-भूतों या परमा- णुओंमें भी चेतन-शक्तिकी कल्पना करते हैं, वे तो फिर जड़वादी नहीं रह जाते। साथ ही अनेक चेतन परमाणुभूत या परमाणु विद्युत्को कारण माननेकी अपेक्षा लाघवार्थ एक व्यापक सर्वशक्ति चेतन ईश्वरको ही कारण मानना कहीं श्रेष्ठ है। जड परमाणुओसे संयुक्त होकर कार्यारम्भके लिये कर्म अपेक्षित होगा। देखा जाता है कि तन्तुओंमें कर्म (हलचल) होता है। तभी संयोग आदिद्वारा पटादिकी उत्पत्ति होती है। कर्म भी कार्य है, अतः उसका भी कोई निमित्त चाहिये। यदि कोई निमित्त न होगा, तो परमाणुमें आद्यकर्म ही नहीं होगा। यदि लोकानुसार प्रयत्न या अभिघातादि परमाणु कर्मका निमित्तमान्य है, तब तो तदर्थ चेतन ईश्वर मानना ही युक्त है। कहा जाता है कि 'ज्ञानस्वरूप ब्रह्मसे प्रपञ्चकी उत्पत्ति इसीलिये नहीं हो सकती कि प्रपञ्च ब्रह्मसे विलक्षण है। सुवर्णसे उत्पन्न मुकुट-कुण्डलादिमें, मृत्तिका-