भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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४७८ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रबोध भी कैसे हो सकता था ? बीजके उपमर्दन होनेसे अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है, यह देखकर बौद्धलोग अभावसे ही अङ्कुरादि कार्योंकी उत्पत्ति कहते हैं। परंतु यदि ऐसी बात होती, तब तो बीजके दाहसे भी अङ्कुरकी उत्पत्ति होनी चाहिये, क्योकि बीज दाहमें भी तो बीजका उपमर्दन या अभाव हुआ ही। अतः बीजके अवयव ही अङ्कुरके कारण हैं । बीज अङ्कुरोत्पत्तिके पूर्वकी अवस्था है। जैसे घटोत्पत्तिके पहले मृत्तिकाकी पिण्डावस्था होती है। पिण्डमें, घटमें, कपालमें जो व्यापक है, वह मृत्तिका ही सबका कारण है । पिण्डादि सब मृत्तिकाके कार्य ही है । उसी तरह बीजावयव ही बीज एवं अङ्कुरादिमें व्यापक होनेसे वही कारण है । पिण्ड या बीज, घट-अङ्कुरादिमें व्यापक नहीं हैं, अतः वे कारण नही हैं। एक कारणमें युगपत् विरुद्ध अनेक कार्य नहीं हो सकते, अतः एक कारणसे होनेवाले कार्योंमें क्रमभाविता है। पिण्ड, घट, कपाल, बीज, अङ्कुर, नाल, स्कन्ध, शाखोपशाखादि कार्य क्रमसे ही होते हैं। जो कहते हैं कि पिण्ड, कपालादि कार्योंसे भिन्न होकर कारण मृत्तिका कुछ भी नहीं है, उन्हे अन्वय व्यतिरेकादि प्रमाणोंपर अवश्य ध्यान देना चाहिये। जैसे पुष्पोंके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी उनमें अनुवृत्त सूत्र उनसे भिन्न होता है, वैसे ही पिण्ड, घट, कपालादिके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी सबमें अनुवृत्त मृत्तिका स्पष्ट ही उन कार्योंसे पृथक् है। अतः इस कारणको असत् नहीं कहा जा सकता । इसी तरह उत्पत्तिके पहले कार्य भी सत् ही रहता है। जैसे अविज्ञात ही घट विज्ञात होता है, वही ज्ञायमान होता है और वही विस्मृत होता है और फिर उसीका स्मरण भी होता है। इसी तरह सामग्रीके अभावसे या कुड्यादि दीवाल आदि आवरणसे वर्तमान रहता हुआ भी घट प्रतीत नहीं होता है। पिण्डमें घट रहता हुआ भी आवृत्त होनेसे उपलब्ध नहीं होता। जैसे एक ही आकाशमें चन्द्र प्रकाश सौर्य प्रकाशसे आवृत्त होता है, एक ही घटमें नीर क्षीरसे आवृत्त होता है,वैसे ही एक देशस्थ ही घट पिण्डसे आवृत्त रहता है। एक ही मिट्टीमें पिण्ड आदि सहस्रों कार्य हैं, जिसकी अभिव्यक्तिकी सामग्री उपस्थित होती है, वही अभिव्यक्त होता है, अन्य आवृत्त रहते हैं। इस तरह पिण्डसे घट, घटसे कपाल, कपालसे घट आदि आवृत्त होते हैं। लोकमें अनेक ढंगसे अभिव्यक्ति होती है, दीपसे रूपकी अभिव्यक्ति होती है । दण्ड, चक्र, कुलालादिसे घट अभिव्यक्त होता है। जैसे दीपसे आवरणनाशके अतिरिक्त घट सप्रकाश बनाया जाता है, वैसे ही कुलालादि- द्वारा आवरणभङ्गके साथ घटाभिव्यक्ति हो जाती है । इसीलिये शिलाघातसे पिण्ड-भङ्ग होनेपर भी कुलालादि बिना घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती।