भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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होता। अतः उत्पत्तिके पहलेका कार्य कारणरूप ही रहता है। उत्पत्तिके पश्चात् भी कार्य कारणसे अभिन्न ही रहता है। इसीलिये श्रुतिने भी इदं पदार्थ कार्य- प्रपञ्चको उत्पत्तिके प्रथम सद्रूप ही बतलाया है—'सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्। असद् वा इदमग्र आसीत् ॥' यहाँ अव्याकृत या अव्यक्त ही असत्पदसे कहा गया है, कारण असत् किसी कालसे सम्बद्ध नहीं हो सकता। असत्‌का आसीत्‌के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि आसीत्‌से सत्ता बोधित होती है, तथा च सत्ता एवं असत्‌का परस्पर विरोध होनेसे असत्‌का आसीत्‌के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता। संसारमें घट, कुण्डल और दधि चाहनेवाले क्रमेण मृत्तिका, सुवर्ण तथा क्षीर ग्रहण करते हैं। दधि चाहनेवाला मिट्टी या घट चाहनेवाला क्षीर नहीं ढूँढ़ता। यह बात सत्कार्यवादमे ही बनती है। यदि उत्पत्तिके पहले कार्य अत्यन्त असत् हो तो असत् तो सर्वत्र ही अविशिष्ट-रूपसे है, फिर क्षीरसे दधि क्यो उत्पन्न होता है,