मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोना चाहिये । किं च सम्बन्धियोंके अधीन ही समवायका निरूपण होता है । फिर भी वह सम्बन्धियोंके भेदसे भिन्न नहीं होता । उनकी उत्पत्ति विनाशमें उत्पन्न तथा नष्ट नहीं होता, किंतु नित्य एव एक ही समवाय रहता है, वैसे ही संयोग भी क्यों न हो ? किं च कार्य द्रव्य अवयवी है, कारणरूप द्रव्यमें रहता है । यहाँ यह प्रश्न होता है कि सम्पूर्ण अवयवोंमें अवयवी रहता है, अथवा व्यस्त पृथक्- पृथक् अवयवोंमें ? यदि कहे सम्पूर्णमें, तो अवयवी द्रव्यका प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकेगा, क्योंकि समस्त अवयवोंके साथ सन्निकर्ष ही अशक्य है । समस्त आश्रयोंमें वर्तमान बहुत्व व्यस्त आश्रयोंके ग्रहणमें नहीं गृहीत होता । यह भी नहीं कहा जा सकता कि अवयवशः समस्त अवयवोंमें कार्य ( अवयवी ) रहता है । क्योंकि इस तरह तो आरम्भक अवयवोंसे भिन्न अवयवीके अवयव मानने पड़ेंगे जिनके द्वारा आरम्भक अवयवोंमें अवयवी रहता है । जैसे म्यानके अवयवोंसे भिन्न अपने अवयवोंद्वारा तलवार म्यानमें व्याप्त होती है । किंतु इस तरह अनवस्था-दोष होगा, क्योंकि उन अवयवोंमें भी रहनेके लिये कार्यके अन्य अवयव मानने पड़ेंगे । यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवीको मानें तब तो एक अवयवमें जब अवयवी रहेगा, उस समय अन्य अवयवोंमें नहीं रहेगा । क्योंकि देखते ही हैं, जब देवदत्त काश्मीरमें रहता है, उसी समय काशीमें नहीं रहता । यदि एक कालमें अनेकों स्थलोंमें अस्तित्व कहा जायगा तो अवश्य ही अवयवीका नानात्व हो जायगा । जैसे काशी, काश्मीरमें रहनेवाले चैत्र, मैत्र अनेक ही होते हैं । फिर भी कहा जाता है कि जैसे गोत्व जाति प्रत्येक व्यक्तिमे होनेपर भी प्रत्येकमें गृहीत होती है, फिर भी एक ही है । उसी तरह अवयवी प्रत्येक अवयवमें रहते हुए उपलब्ध होगा और एक ही रहेगा, परंतु यह सब कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवी पूर्णरूपसे उपलब्ध होगा तब तो गोके श्रृङ्गसे भी स्तनका कार्य एव पुच्छसे पृष्ठका कार्य होना चाहिये, किंतु ऐसा होता नहीं, अतः कारणसे अभिन्न ही कार्य है । यदि कार्य उत्पत्तिके पहले असत् है, तब तो वह उत्पत्ति क्रियाका कर्ता भी नहीं बनेगा । उत्पत्ति भी एक क्रिया है । क्रिया कभी अकर्तृका नहीं होती । घटकी उत्पत्तिका कर्ता घट ही होता है । 'घट उत्पद्यते' घट उत्पन्न होता है, ऐसा ही व्यवहार सर्वसम्मत है । यदि घटोत्पत्तिके कर्ता कुलालादि हों, तब तो 'कुलालादय उत्पद्यन्ते' कुलालादि उत्पन्न हो रहे हैं, ऐसा व्यवहार होना चाहिये । स्पष्टरूपसे कुलालादिकी उत्पद्यमानता नहीं प्रतीत होती । घटकी उत्पद्यमानता प्रतीत होती है । कुछ लोग कहते हैं स्वकारण एवं सत्ताके साथ सम्बन्ध ही कार्यकी उत्पत्ति है, परंतु यदि कार्य स्वयं असत् है, निरात्मक है तब उसका किसीके साथ सम्बन्ध