भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 785

४७२ मार्क्सवाद और रामराज्य भी क्या होगा ? क्योकि दो सत्‌का ही सम्बन्ध होता है, सत् तथा असत्‌का एवं दो असत्‌का भी सम्बन्ध नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त अभाव या असत् निरुपाख्य असत् ही होता है तब उत्पत्तिके प्रथम कार्य असत् था—यह मर्यादा- करण भी नहीं बन सकता । यह व्यवहार नहीं होता कि अमुक राजाके पहले वन्ध्यापुत्र राजा था । यदि कारकव्यापारसे वन्ध्यापुत्र, खपुष्प भी उत्पन्न हो सके तभी यह कहा जा सकता है कि उत्पत्तिके पहले असत् कार्य कारकव्यापारसे उत्पन्न हुआ है । कहा जा सकता है कि जैसे प्रथमसे ही सिद्ध होनेसे कारणकी स्वरूप सिद्धिके लिये कोई व्यापृत नहीं होता तो उसी तरह यदि कारकव्यापारके पहले भी कार्य स्वरूप सिद्ध ही हो तो उसके लिये कौन व्यापृत होगा ? कारणसे यदि कार्य अनन्य ही है, तब कारणके समान ही कार्यके लिये भी कारकव्यापार नहीं होना चाहिये । परंतु व्यापार देखा जाता है, अतः कारकव्यापारकी सार्थकताके लिये उत्पत्तिके पहले कार्यका अभाव मानना उचित ही है । किंतु यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि कारणको कार्याकारसे व्यवस्थापन करनेके लिये ही कारकव्यापार अपेक्षित होता है । वह कार्याकार कारणका आत्म- भूत ही है; विशेष दर्शनमात्रसे वस्तुभेद नहीं होता । देवदत्त हाथ-पाँव फैलाने या संकुचित करनेसे भिन्न नहीं हो जाता है; क्योकि ‘स एवायम्’ वही यह है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा (पहचान) होती है । प्रतिदिन ही पिता, माता, भ्राता आदिमें ह्रास- विकास आदि होते रहते हैं । फिर भी वस्तुभेद नहीं प्रतीत होता; क्योकि पिता- माता, भ्राताकी एक रूपसे प्रत्यभिज्ञा होती रहती है । यदि कहा जाय कि वहाँ जन्मका व्यवधान न होनेसे ही अभेद प्रतीत होना ठीक है परंतु कार्य-कारणमें ऐसा नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि यहाँ तो कारण बीज, मृत्पिण्डादिका नाश एवं अङ्कुर, घटादिकी उत्पत्ति होती है, अतः प्रत्यभिज्ञा नहीं होती । किंतु यह भी ठीक नहीं, क्योकि यहाँ भी कारण नाश आदि नहीं अनुभूत होता । क्षीरादिका दधि आदि रूपसे संस्थान प्रत्यक्ष दिखायी देता है । वट-बीजादिसे समान जातीय अवयवोंके उपचयद्वारा अङ्कुर वृक्षादिकी उत्पत्ति एवं अवयवोंके अपचयसे विनाशका व्यवहार होता है । वस्तुतः कारणका विनाश और कार्यकी उत्पत्ति यहाँ भी नहीं है । जैसे मृत्पिण्डके अवयव घटमें अन्वित हैं, वैसे ही वटबीजके अवयव वटबीज भी अन्वित हैं । इस तरहके अवयवोपचय तथा अवयवापचयसे यदि वस्तुमें भिन्नता हो और इसीसे सत्‌की उत्पत्ति तथा सत्‌का विनाश हो तो गर्भस्थ तथा पर्यङ्क स्थ शिशुमे भी भेद कहना पड़ेगा, और बाल्य- यौवनादि शरीरमे भी भेद कहना पड़ेगा; क्योकि अवयवोंका उपचय-अपचय वहाँ भी देखा ही जाता है। फिर तो पित्रादि व्यवहार भी बाधित होगा । इस तरह सत्कार्य-

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