मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें-वादमें तो कारणको कार्याकाररूपसे व्यवस्थापन करनेमें कारकव्यापार सार्थक है, परंतु असत्-कार्यवादमें तो कारकव्यापार सर्वथा निर्विषय हो जायेंगे । जैसे आकाशके हननके लिये खड्ग् आदिका प्रयोग व्यर्थ है, वैसे ही कार्याभावया असत्में भी कारकव्यापार व्यर्थ होंगे । कहा जाता है कि समवायी कारणमे अर्थात् तन्तु- मृत्तिका आदिमें कारकव्यापार होगा, परंतु यह भी ठीक नही, क्योकि अन्यविषयक व्यापारसे अन्यकी निष्पत्ति असम्भव है । अन्यथा यदि समान ही है तो फिर सिकता- विषयक व्यापारसे भी पट क्यो नहीं उत्पन्न होता ? जो कहते हैं कि समवायी कारणका ही आत्मातिशय कार्य है, उन्हे तो सत्कार्यवाद मानना ही पडेगा । अतः क्षीर आदि द्रव्य ही द्रव्याद्याकारसे अवस्थित होकर कार्य-द्रव्यके रूपमें व्यवहृत होते हैं, वेदान्तमतानुसार तो मूल कारण परब्रह्म ही घटादि अन्तिमकार्य पर्यन्त उस-उस कार्यके आकारसे नटवत् सर्वव्यवहारका आस्पद होकर प्रतीत होता है । जैसे लपेटा हुआ वस्त्र स्पष्ट नहीं दीखता, फैला हुआ स्पष्ट दीखता है, उसी तरह कारणा- वस्थित कार्य स्पष्ट नहीं उपलब्ध होता, कार्यावस्थित होकर स्पष्ट दीखता है । यह भी शङ्का होती है कि लोकमे कुलाल घट आदि कार्योंके लिये मृत्तिका दण्ड-चक्रादिका सग्रह करते हैं परंतु ब्रह्म विना सामग्री-संग्रहके किस तरह विश्व- निर्माण कर सकेगा ? परंतु जैसे क्षीर स्वभावसे दधिनिर्माणक्षम होता है, जल हिमरूपसे परिणत हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म भी प्रपञ्चात्मना व्यक्त हो जाता है । यद्यपि औष्ण्य, शैत्य आदिकी अपेक्षा करके ही क्षीर, नीर आदि दधि, हिम आदि रूपमें परिणत होते हैं, तथापि इन साधनोसे केवल शीघ्रता-सम्पादन की जाती है । यदि स्वय दधि आदि बननेकी शक्ति न होती तो बाह्य साधनोसे भी क्षीर आदि दधि आदि नहीं बन सकते । इसीलिये वायु, आकाश आदिसे दधि नहीं बनता; क्योकि उनमें दधि बननेका स्वभाव नहीं है । जैसे ऋषि, मुनि, देवादि बाह्य साधनोके बिना ही विविध शरीरो एव प्रासाद आदिका निर्माण कर सकते हैं, तन्तुनाभ (मकडी) बिना बाह्य साधनके तन्तु-निर्माण करती है, बलाका ( बगुली ) बिना शुक्रके ही घन-गर्जन-श्रवणसे गर्भ धारण करती है, कमलिनी बिना किसी गमन-साधनके ही दूसरे सरोवरमे पहुँच जाती है, उसी तरह बाह्य साधन बिना चेतनब्रह्म भी विश्वकी रचना करता है । यद्यपि कहा जा सकता है कि 'देवाद्दिका अचेतन शरीर ही अन्य शरीरका कारण है। यहाँ अचेतन ही कारण है, मकडीका मुखलालादि ही कठोर होकर तन्तु बन जाता है, बलाका भी गर्जन-श्रवणसे गर्भ धारण करती है, यहाँ भी बाह्य निमित्त है ही । इसी तरह पद्मिनी चेतनप्रयुक्त अचेतन शरीरसे ही दूसरे सरोवरमे जाती है, जैसे लता वृक्षपर आरूढ होती है, तथापि कुलालादिसे विलक्षणता तो इन कारणोंमें स्पष्ट ही है। वस्तुतः लक्षण एव प्रमाणसे ही वस्तुकी सिद्धि होती है। जो-जो पदार्थ प्रमाण-सिद्ध होते हैं, उन्हींका अस्तित्व माना जाता है। विज्ञान आदिके प्रयोग-