मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअभावसे भाव उत्पन्न हो तब तो अभाव सभीको सर्वत्र सुलभ ही है। फिर कार्योत्पत्तिमें बाधा न होनेसे सदा ही कार्योत्पत्ति होती रहनी चाहिये। यदि कारण-व्यापारसे पूर्व कार्य असत् हो तो वह किसी तरहसे सत् नहीं बनाया जा सकता। सैकड़ों शिल्पियोंके प्रयत्नसे भी नील रूप पीत नहीं बनाया जा सकता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि सत्त्व-असत्त्व—दोनों ही घटके धर्म हैं; क्योंकि यदि घटधर्मी सत् हो तभी उसके धर्म हो सकते हैं, असत् धर्मीके धर्म कैसे हो सकेंगे? सत्त्व असत्त्व धर्मका आधार माननेपर भी घटादि कार्यको सत् ही कहना पड़ेगा। यदि असत्त्व धर्मका घटकी आत्मा या घटसे सम्बन्ध नहीं है, तो घटको असत् कैसे कहा जा सकता है ? तत्सम्बन्धितया तत्स्वरूप होनेसे ही किसी वस्तुमें तद्रूपताकी प्रतीति होती है। अतः कारण-व्यापारके ऊर्ध्व एवं पहले भी कार्य सत् ही होता है। उसी सत् कार्यकी कारणमे अभिव्यक्ति होती है, जैसे निपीडनद्वारा तिलमे तैल व्यक्त होता है अवघातद्वारा धान्यमे तण्डुलकी व्यक्ति होती है, दोहनसे गोदुग्ध, उसके मन्थनसे नवनीत अभिव्यक्त होता है, उसी तरह अङ्कुरादि कार्य भी सत् ही रहते हैं। कारण-व्यापारमे उनकी अभिव्यक्ति सम्भव है, परन्तु असत्की उत्पत्तिका कोई भी दृष्टान्त नह अभिव्यक्त होती वस्तु कहीं भी असत् नहीं देखी जाती। कार्यके लिये प्रतिनियत उपादान कारणोंका ग्रहण किया जाता है। पटार्थी तन्तु, घटार्थी मृत्तिका, कुण्डलार्थी सुवर्ण ढूँढता है। इससे मालूम पडता है कि वे कार्य उन उन कारणोंसे विशेषरूपसे सम्बद्ध रहते हैं। तभी प्रतिनियत कारण ढूँढना संगत हो सकता है। असत् कार्य होगा तो वह किसीसे कैसे सम्बद्ध होगा ! यदि कारणसे असम्बद्ध ही कार्य हो, तो असम्बद्धता समान होनेसे सब कार्य सभी कारणोंमे उत्पन्न होने चाहिये। फिर अमुक कार्य अमुक कारणसे उत्पन्न होनेका नियम न होना चाहिये। साथ ही कार्य-कारणकी स्पष्ट ही अव्यवस्था होगी। कुछ लोग कहते हैं, 'असम्बद्ध होनेपर भी जो कारण जिस कार्यके उत्पादन- में शक्त होता है, उस कारणसे वही कार्य उत्पन्न होता है। शक्ति फल-बलसे कल्प्य होती है। अर्थात् जिस कारणसे जिस कार्यकी उत्पत्ति होती दिखती है, उस कार्यकी उत्पत्तिकी शक्ति उसी कारणमें है, यह मालूम पड़ता है। अतः अव्यवस्था नहीं होगी।' सांख्यवादी सत्कार्यवादी होते हुए भी अचेतन प्रकृतिको ही कारण कहते हैं, परंतु वेदान्ती चेतन ब्रह्मको कारण कहते हैं। जो उत्पत्तिके पहले जिस रूपमें होता है, वह उसीसे उत्पन्न होता है। घट मृत्तिका-रूपमें उत्पत्तिसे पहले रहता है; यतः मृत्तिकासे उत्पन्न होता है। तैल उत्पत्तिमे पहले तिल-रूपमें रहता है, अतः तिलसे उत्पन्न होता है। वह सिकता-रूपमे नहीं रहता, अत. सिकतामे नहीं उत्पन्न