भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 8

( ७ ) साम्यवाद ( जिसकी आज सर्वाधिक चर्चा है ) के आचार्य मार्क्सके नामपर तो यह पुस्तक ही है। उसके प्रत्येक अङ्गपर इसके पृथक् पृथक् अध्याय हैं, जिनमें उनकी पोल खोलकर तर्कद्वारा ही उनकी धज्जी उड़ायी गयी है। साथ ही अपने गूढ़तम अकाट्य न्याय तथा वेद-वेदान्तके सिद्धान्तोंको भी विस्तारपूर्वक समझाया गया है। अन्तमें संक्षिप्त प्राचीन भारतीय निर्दोष शासन प्रणाली भी दे दी गयी है। शीघ्रताके कारण पुस्तकमें आये हुए व्यक्तियो तथा पारिभाषिक शब्दोंकी वर्णानुक्रम-सूची नहीं बन पायी। विषय-सूचीसे केवल थोड़ेसे नाम हैं। पाश्चात्योंका मत उद्धरणचिह्न ( “ ” या ‘ ’ ) मे रखा गया है। इसके बाद तुरंत ही भारतीय मत रखा गया है। पाश्चात्य ग्रन्थोंका उल्लेख पृष्ठोंमें न हो सका, उसकी सूची अन्तमें दे दी गयी है। अपने ग्रन्थोंका उल्लेख यथास्थान पुस्तकके पृष्ठोमे ही है। इसी तरह इस एक ही पुस्तकमें इतनी अधिक सामग्री आ गयी है कि उसे दर्शन तथा राजनीतिका 'विश्वकोष' कहना भी अनुपयुक्त न होगा। डिमाई साइजके ८०० से भी अधिक पृष्ठोमे ( छोटे तथा घने अक्षरोंमें ) सार-सार बातोंका संग्रह है। यह सब देखते हुए इसका मूल्य कम ही है। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य एवं धर्मके साक्षात् विग्रह श्री- स्वामीजी महाराजकी कृपा तथा गीताप्रेसकी तत्परता देखकर ऐसा लगता है कि इस कार्यके भीतर परम मङ्गलमय परमात्माकी ही शुभ प्रेरणा है। इसके अनुशीलनमें जो मेरा समय लगा, वह भी भगवत्कृपाका ही परिणाम है। मेरा विश्वास है कि जो सज्जन इसे एक बार ध्यानसे पढ़ लेंगे, वे तामस अविवेकके क्लेशसे मुक्त होकर सात्त्विक ज्ञान तथा हृत्प्रसादको निश्चय प्राप्त करेंगे, दर्शन एवं राजनीतिका निर्मल ज्ञान तो उन्हे प्राप्त होगा ही। द्वितीय संस्करणका निवेदन पहला संस्करण छपनेके बाद तुरंत ही समाप्त हो गया। तबसे इसके दूसरे संस्करणकी माँग बराबर आती रही। पर एक बड़ी मशीनके टूट जाने तथा कुछ पुर्जोंके मार्गमें ही खो जानेसे दूसरी एक नयी मशीनके व्यर्थ पड़े रहनेसे प्रकाशनमे देर होती रही। अन्तमें ग्राहकोंके तीव्र आग्रहसे यह दूसरा संस्करण जैसे-तैसे तैयार किया गया है। इस बार बौद्धदर्शनके बहुतसे नये पृष्ठ जोड़े गये हैं, फिर भी मूल्य वही रखा गया है। इस पुस्तककी राहुलजीने एक छोटी-सी आलोचना लिखी थी। पर उससे तत्त्वकी कोई बात न थी,