मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 807, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंभेदके बिना आदिम समष्टिवादकी अवस्था में रहा है', पर यह ऐतिहासिक तत्त्व आधुनिक लोगोंका स्वगोष्ठिनिष्ठ सिद्धान्तमात्र है। संसारके सबसे प्राचीन इतिहास महाभारत और रामायण हैं, जिनकी बहुत कुछ सत्यता मोहन-जो-दड़ो तथा हरप्पाके भूगर्भसे मिली हुई वस्तुओसे सिद्ध होती है। उन आर्ष इतिहासों एवं अपौरुषेय वेदादि शास्त्रोसे सिद्ध है कि न केवल मनुष्योंमें ही किंतु देवताओ, पशुओ, वृक्षोंमें भी ब्राह्मण आदि भेद सृष्टिकालसे ही है। अवश्य यह श्रेणी-भेद शोषक तथा शोषितके आधारपर नहीं हुआ, किंतु धर्मके आधारपर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि श्रेणी-भेद और उसके अनुसार ही श्रौत-स्मार्त धर्म एव जीविकाओंके विधान हुए, 'न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्ड्यो न दाण्डिकः' (महा०शा०५९।१४) आदि पूर्वोक्त सर्वोत्कृष्ट धर्म-नियन्त्रणके युगमें भी धर्म तथा ब्राह्म आदि श्रेणियोंकी सत्ता थी ही। 'पुराकालमे सब ब्राह्मण ही थे, क्षत्रिय आदि न थे। स्त्रियाँ भी विवाहित न होती थी, सम्पत्ति सामूहिक होती थी।' आदि बाते भी अत्यन्त असङ्गत है। अनादि सृष्टि-सहारकी परम्परामें मूलभूत धर्मपरम्परा भी अनादि है। तन्मूलक वर्णाश्रम-धर्म, पातिव्रत्यादि-धर्म भी अनादि ही है। कभी भी उत्पत्ति-क्रममें कार्योत्पत्तिके पहले कारण ही रहता है, वायुकी उत्पत्तिके पहले आकाश था ही। क्रम-वर्णनमे क्षत्रिय आदि उत्पत्तिके पहले ब्राह्मण ही थे, विवाह होनेके पहले स्त्रियाँ आज भी अविवाहित होती हैं। आज भी घट बननेके पहले मृत्तिका ही रहती है, परंतु इससे ब्राह्मणादि वर्णों तथा विवाहादि धर्मोंकी अनादितामें कोई बाधा नहीं आती। अतएव इन सबोका उत्पत्ति-क्रम-वर्णनमे ही तात्पर्य है। आकाशसे वायु, वायुसे तेज एव तेजसे जल तथा जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति होती है। यह कहा जा सकता है कि पृथ्वी, जलके उत्पत्तिके पहले तेज ही था, तेजसे भी पहले वायु ही था, वायुसे भी पहले आकाश था और कुछ नहीं था। उसी तरह भगवान्की मुखशक्तिसे ब्राह्मणकी उत्पत्तिके पश्चात् बाहुकी शक्तिसे क्षत्रियकी उत्पत्ति हुई। अतः उदर या ऊरुसे वैश्य, पादसे शूद्रकी उत्पत्ति हुई। उत्पत्तिक्रममे पौर्वापर्य होता ही है, उसीमे अभावका व्यवहार होता है। जब कि अनादि वेदोंद्वारा ही प्रतिकल्पकी सृष्टि होती है और अनादि वर्णाश्रम-धर्मका प्रतिपादन होता है। अनादि ही पातिव्रत-धर्मका प्रतिपादन है, तब अमुकवर्ण या अमुक धर्म पहले नहीं था - इत्यादि कल्पनाएँ निराधार एव अप्रमाणित हैं। जीव ईश्वरके समान ही धर्माधर्म भी अनादि हैं। तदनुसार ही तद्बोधक शास्त्र एवं तदनुयायी वर्णाश्रम-धर्म भी अनादि हैं। ब्राह्म आदि विवाहोंसे सवर्णामें उत्पन्न ही ब्राह्मणादि वर्ण हैं, अतः विवाह आदि सभी अनादि हैं। श्वेतकेतु आदिकी कथाएँ गुणवादसे लक्ष्यार्थमें पर्यवसित हैं, वाच्यार्थमें नहीं। अर्थात् कुन्तीको देवताओसे सन्तानोत्पादनमे प्रवृत्त करनेके लिये यह अर्थवाद है और अर्थवाद भी