मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 808, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंजहाँ प्रमाणान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादक होता है, वहाँ भूतार्थवाद न होकर गुणवाद ही होता है अर्थात् उसका वाच्यार्थमें कुछ भी तात्पर्य न होकर प्रशंसा या निन्दाद्वारा प्रवृत्ति या निवृत्तिमें ही तात्पर्य होता है। सिद्धान्ततः ह्रास-विकासका चक्र ही सिद्ध है। तदनुसार कभी ब्राह्मणोंकी बहुलता, कभी शूद्रोंकी बहुलता होती है, अर्थात् कभी ज्ञान-विज्ञानप्रधान मनुष्योंकी बहुलता होती है, कभी शिल्पादि कर्म-प्रधान मनुष्योंकी— यथा कृतयुगे पूर्वमेकवर्णमभूत् किल। तथा कलियुगस्यान्ते शूद्रीभूताः प्रजास्तथा॥ (मत्स्यपुराण अध्याय १४३।७८) मार्क्सवादी कहते हैं कि 'दर्शनके क्षेत्रमें स्वयं द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ही एक ऐसा उदाहरण है। पहलेके भौतिकवादका प्रतिषेध हुआ आदर्शवाद, और इस आदर्शवादका प्रतिषेध हुआ, फिर भौतिकवाद। लेकिन यह भौतिकवाद यान्त्रिक भौतिकवाद नहीं, बल्कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। दार्शनिक क्षेत्रमे एक और उदाहरण है, रूसोके समतावादका तथ्य। रूसोके अनुसार प्राकृतिक बर्बर- युगमें सब मनुष्य समान थे। रूसो भाषाको भी इस प्राकृतिक अवस्थाका विकार मानता है, उसके अनुसार एक ही जातिके पशुओंके बीचकी समताको उन पशु-मनुष्योंके लिये भी लागू करना चाहिये जिनको हेकलने एक आनुमानिक श्रेणीयुक्त किया है, आलालीमूक। लेकिन इन पशु-मनुष्योंको अन्य पशुओंकी अपेक्षा एक सुविधा थी उन्नतिकी शक्ति और यही असमताका कारण थी। इसलिये असमतामें भी रूसो उन्नतिका कारण देखता है। लेकिन यह उन्नति विरोधपूर्ण थी। यह साथ-ही-साथ अवनति भी थी। उन्नतिका मार्ग यही था कि मनुष्य व्यक्तिगतरूपसे पूर्णताकी ओर कदम बढ़ाता, लेकिन यही कदम मनुष्य- जातिके लिये अवनतिका भी कदम था। सभ्यताका हर एक कदम असमताकी ओर अग्रसर होता था। यह निर्विरोध सत्य है और वैज्ञानिक नियमका मूल सत्य भी है कि लोग सरदारोंको चुनते हैं अपनी स्वतन्त्रताकी रक्षाके लिये न कि उसका अन्त करनेके लिये। फिर भी ये सरदार अवश्य ही लोगोंको सतानेवाले बन जाते हैं और यहाँ तक सताते हैं कि यह असमता चरम सीमापर पहुँचकर अपने विपरीत बन जाती है और समताका कारण बन जाती है, क्योंकि निरङ्कुश शासकके सामने सब समान हैं, सब शून्य हैं। लेकिन यह शासक तभीतक प्रभु है जबतक वह जबरदस्त है और जब वह निकाला जाता है तब जबरदस्तीकी शिकायत नहीं कर सकता। शक्ति ही उसकी प्रभुता बनाये रखती है। अन्तमें शक्तिसे ही उसका पतन होता है। सब प्राकृतिक और सही रास्तेपर ही चलते हैं। इस प्रकार असमता फिर एक बार समतामें रूपान्तरित हो जाती है। लेकिन यह मूक प्राथमिक मनुष्य- की प्राकृतिक समता नहीं है, यह समाजकी उन्नत समता है। सतानेवाले सताये- जानेवाले हो जाते हैं, प्रतिषेधका प्रतिषेध हो जाता है।'