मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपर्युक्त कथन भी असङ्गत ही है; क्योकि किसी भी शास्त्रार्थमें जब एक पक्षका खण्डन होता है तब वह दूसरे प्रकारसे अपने खण्डित पक्षका समर्थन करता है। जैसे द्वैत-अद्वैत पक्षके ही शास्त्रार्थकी बात लीजिये । श्रीमध्वके द्वैतका खण्डन मधुसूदनने ‘सिद्धान्तबिन्दु’ ग्रन्थके द्वारा किया। उसका खण्डन करके 'न्यायामृत'- द्वारा पुनः द्वैतका प्रतिष्ठापन हुआ । उसका खण्डन पुनः 'अद्वैतसिद्धि'द्वारा हुआ । पुनश्च 'न्यायामृत-तरङ्गिणी'द्वारा उसका प्रतिष्ठापन हुआ, पुनश्च 'गौड़ब्रह्मानन्दी' द्वारा उसका खण्डन हुआ, 'न्यायभास्कर' द्वारा पुनः प्रतिष्ठापन हुआ । 'न्यायेन्दुशेखर'- द्वारा पुनः खण्डन होनेपर पुनः प्रतिष्ठापनार्थ प्रयत्न हुआ, परंतु एतावता उनके पहलेके द्वैत और अद्वैतसे पिछले द्वैत-अद्वैतमे कोई भेद नही हुआ । इसी तरह जड़वाद एवं भौतिकवादका भले ही सहस्रो बार खण्डन तथा मण्डन हो तथापि वस्तुत्वमे कोई अन्तर नही पडता । ऐसे प्रतिषेधके प्रतिषेधको प्रतिप्रसव कहा जाता है । दर्शनशास्त्रोमें सिद्धान्ततः भी इसके उदाहरण मिलते हैं । जैसे सन्यासका विधान, पुनश्च कलियुगके लिये निषेध, पुनश्च कलिमें भी वर्णविभाग वैदिकधर्म-प्रवृत्ति-पर्यन्त विधानद्वारा प्रतिषेधके प्रतिषेध होनेसे विधानका प्रतिप्रसव होता है । यह निर्दोष उदाहरण है । इसी प्रकार व्याकरणकी दृष्टिसे राम शब्दके प्रथमा या द्वितीयाके द्विवचनमे ‘राम औ’ इस स्थितिमें ‘वृद्धिरेचि’से वृद्धि प्राप्त होती है । उसका बाधकर ‘प्रथमयोः पूर्वसवर्णः’ से पूर्वसवर्ण दीर्घ प्राप्त होता है । पुनश्च ‘नादिचि’से उसका बाध होकर ‘वृद्धिरेचि’से वृद्धि हो जाती है । तब ‘रामौ’ शब्द बनता है । भौतिकवाद एवं आदर्शवादके तत्त्वोमे कोई भी अन्तर नही है । यह नहीं कहा जा सकता कि वस्तुतः पहले भौतिकवादका खण्डन हो गया था और अब वह पुनः सिद्ध ही हो गया है । रूसो हैकेल आदिकोके मनःकल्पित इतिहासकी अपेक्षा ऋषियोके आर्ष इतिहासका महत्त्व कहीं अधिक है । तदनुसार सृष्टिकालके वशिष्ठ, अत्रि आदि उच्चकोटिके महामानव थे । उनके धर्म, योग, वेदान्त आदिके सिद्धान्त आजके सभ्य कहे जानेवाले नरपशुओको दुर्विज्ञेय ही हैं । उनमें जो आध्यात्मिक समता थी, वह आज भी है । विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ (गीता ५ । १८) सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ (गीता ६ । ९) विद्वान् सदा ही सर्वत्र समब्रह्मका दर्शन करता है, यही समता है । शरीर- बुद्धि या कर्म अथवा उसके फलकी दृष्टिसे न कभी समता थी, न होनेवाली है ।