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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 810, कुल 866 में से

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पृष्ठ 810

पशुतुल्य मनुष्य असंस्कृत मूक तभी होता है जब उसका सद्गुरु-सम्बन्ध नहीं होता । आज भी यह बात स्पष्ट है। जहाँ शिक्षण है, वहाँ ज्ञान-विद्या विकसित होती है, जहाँ शिक्षण नहीं है, वहाँ विकास नहीं होता । ईश्वरने ब्रह्माको नियुक्त करके उसे नित्य वेदोंका उपदेश दिया— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । (श्वेता० उप० ६।१८) ब्रह्माने सनकादिको एव मरीचि आदिकोको उत्पन्न करके उन्हें वेदादि शास्त्रोका उपदेश किया है । जिन मनुष्योका प्रमादवश उक्त सम्पर्क टूट गया, वे ही पशुतुल्य हो गये हैं । हान्स, लाक, रूसो आदिकी कल्पनाएँ परस्पर भी टकराती हैं । हान्सके मता- नुसार 'आदिम प्राणी समताकी स्थितिमे नहीं था, किंतु खूँखार था ।' लाकका 'आदिम मनुष्य बहुत नेक था', रूसोका भी ऐसा ही था । सुकरातके अनुसार 'मनुष्य स्वभावसे ही सामाजिक प्राणी है' इनके अनुबन्धीय राज्यको भी अन्य दार्शनिक अनैतिहासिक कहते हैं । हैकलका अनुमान केवल उसका दिमागी फितूर ही है । मनुष्यो एव पशुओके वैषम्यका कारण उनके जन्मान्तरीय कर्म मानने पड़ेंगे । निर्हेतुक शक्तिवैषम्यकी उपपत्ति हैकलके पास कुछ नहीं है । मनुष्योंमें भी कर्मतारतम्यसे ही उन्नतिकी शक्तिमें तारतम्य होता है और इसका भी अन्तिम उद्देश्य है उस आध्यात्मिक स्तरपर समता स्थापित करना, जिससे अधिक उन्नति हो ही नहीं सकती । व्यक्तिगत उन्नतिकी ओर कदम बढाना कभी भी अवनतिका कारण नहीं होता । व्यक्तिका समुदाय ही समाज है, व्यक्तिगत उन्नतिसे समाजकी उन्नति सुतरा सम्भव होती है । उन्नति एव सभ्यताका कोई भी कदम अवनतिका कदम नही है । क्या कोई विद्वान् बलवान् बनता है, एतावता किसीका नुकसान होता है ? इतनी सहज-सी चीजको आधुनिक सभ्योंने कितने उल्टे रूपमें ग्रहण किया है ? यदि किसी ऊँचे स्थानपर १०० मनुष्य चढनेके लिये अग्रसर होते हैं और यदि कुछ आलसियो, दीर्घसूत्रियोंको पीछे छोडकर कुछ लोग आगे बढते हैं तो स्पर्धासे दूसरे भी आगे बढनेके लिये दीर्घसूत्रता और आलस्य छोड़ेंगे ही । अतः आगे कदम बढ़ानेसे यदि विषमता होती है, तो यह भी उन्नत स्तरपर समताकी ओर ले जानेका ही प्रयत्न है । मुखिया, सरदार या राजाको सदा ही धर्मनियन्त्रित होना आवश्यक है । उच्छृङ्खल होना धर्महीनताका परिणाम है, सरदार या राजा होनेके कारण नहीं । धर्महीन राज्योंमें ही उच्छृङ्खल या निरङ्कुश शासन होते हैं, वेन, रावणादि इसके उदाहरण हैं । मनु, इक्ष्वाकु, नृग, नल, मान्धाता, राम, युधिष्ठिर आदि धर्मनियन्त्रित राजाओंमें निरङ्कुशताका लेश भी नहीं हो सकता था। समाजवादी ढंगकी समता उच्चकोटि मा० रा० ३२—

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