भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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४९८ मार्क्सवाद और रामराज्य की होगी, यह उनके अपने, घरकी-ही कल्पना है। मुर्गों, कबूतरोंकी तरह साम्यवादी बन्धनमें मनुष्योंको सर्वथा परतन्त्र कर देना ही अगर समानता है, तो इससे कोई भी समझदार दूर ही रहना चाहेगा। यदि प्रकृति ही सबको सही रास्तेपर चलाती है, तब तो संसारमे प्रचलित शिक्षण-व्यवस्था एवं दण्डविधान सब पागलपन ही ठहरेगा और समाजवादियोका भी प्रचार और उपदेश सब व्यर्थ ही सिद्ध होगा। अतः इसे प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण समझना व्यर्थ है। प्रतिषेध कभी भी कारण नही हो सकता है। यदि प्रतिषेध ही कारण है, तब तो अवश्य ही मसलकर, जलाकर भी जौके दानेका प्रतिषेध होता ही है, फिर उससे अङ्कुरकी उत्पत्ति क्यो नही होती ? यदि विशिष्ट प्रतिषेधसे अङ्कुरकी उत्पत्ति है, तो कहना पड़ेगा कि वह प्रतिषेध नहीं है, किंतु परिणामोपयोगी विकारमात्र है, प्रतिषेध या विनाश अभावात्मक ही है, विशेषता प्रतियोगीमे ही हो सकती है, अभावमें नही, क्योकि कार्यके लिये विशिष्ट कारणका अन्वेषण होता है, प्रतिषेध या अभावका अन्वेषण नही होता । अतः प्रतिषेधसे या प्रतिषेधके प्रतिषेधसे किसी भी विशिष्टकार्यसिद्धिकी कल्पना व्यर्थ है। इसके अतिरिक्त प्रतिषेधका प्रतिषेध भावात्मक ही होता है। जैसे किसीको भ्रमवशात् रजतमे अरजत-बुद्धि होती है। तब वह कहता है कि 'नेदं रजतम्', पुनश्च जब उसका बोध होता है तब उस प्रतिषेधका प्रतिषेध होता है—'इदं नारजतम्' । यह अरजत नहीं है, इसका फल होता है रजतका व्यवस्थापन। प्रकृतिमे जिस बीजका प्रतिषेध होकर अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है, उस अङ्कुरके प्रतिषेधसे भी उस बीजका पुनः व्यवस्थापन नही होता । अतः वस्तुतः यहाँपर प्रतिषेधका प्रतिषेध हुआ ही नही। अङ्कुरको प्रतिषेधका फल किसी तरहसे कहा भी जाय, परंतु वह प्रतिषेधरूप नहीं हो सकता। और बीजको भी अङ्कुर प्रतिषेधका फल भले ही कहा जाय, परंतु अङ्कुरका प्रतिषेध अङ्कुर फल नही कहा जा सकता । अङ्कुरका कारणभूत बीज अन्य है, बीजसे अङ्कुरादि क्रमसे उत्पन्न फलरूप बीज उससे भिन्न होता है। पिता-पुत्रमे जैसे भेद होता है, वैसे ही प्रथम बीज एव बीजजन्य फलभूत बीजोमे भेद है। एक पिताके अनेक पुत्र होते हैं, वैसे ही एक बीजसे सैकडो फल उत्पन्न होते हैं। अतः यहाँ भी अन्तिम बीज प्रतिषेधका प्रतिषेध स्वरूप नही हो सकता । वस्तुतः प्रतिषेधके प्रतिषेधका व्यवहार वही होता है जहाँ प्रतिषेधके प्रतिषेधसे प्रथम प्रतिषेधके प्रतियोगीका सत्त्व-व्यवस्थापन किया जाता है। जैसे रजतनिषेधका निषेध करके रजतके सत्त्वका व्यवस्थापन किया जाता है । कहा जाता है कि 'विचारजगत् और द्वन्द्वन्याय तर्कशास्त्रका साधारण नियम है, 'हाँ' 'हाँ' है और 'नही' 'नहीं'। इसके विपरीत द्वन्द्वमान कहता है कि