मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स दर्शन ४९९ 'हाँ' नहीं है और 'नहीं' हाँ है। उपरी दृष्टिसे द्वन्द्वमानकी भाषा बहुत ही विरोधपूर्ण है। लेकिन कुछ विचार करनेपर इसकी सत्यता प्रमाणित हो जायगी। तर्कशास्त्रके तीन बुनियादी नियम हैं। १. एकताका नियम, २. विरोधका नियम और ३. मध्यपरिहारका नियम। पहले नियमके अनुसार 'क' है, या 'क'='क' दूसरा नियम पहले नियमका नकारात्मक रूप है। इसका रूप है 'क' नहीं है=न 'क'। तीसरे नियमके अनुसार किसीके लिये दो विरोधी गुण एक साथ नहीं हो सकते, वास्तवमें या तो 'क', 'ख' है या 'क', 'ख' नहीं है। यदि इनमेंसे एक बात सत्य है तो दूसरी असत्य है और दूसरी सत्य है तो पहली असत्य है। इनके मध्यमे कोई बात नहीं हो सकती। 'युवेरवेगके निर्देशानुसार दूसरे और तीसरे नियमोंको इस प्रकार मिलाया जा सकता है। किसी विशिष्ट प्रश्नका, किसी वस्तुविशेषका अमुक गुण है या नहीं ? उत्तर हो सकता है 'हाँ' या नहीं। 'हाँ' और 'ना' दोनोंमे उसका उत्तर नहीं दिया जा सकता। इन नियमोंमे कोई भूल नहीं मालूम पडती। फिर द्वन्द्वमानका नियम क्योंकर सही है ? प्रकृतिमे ही इसका उत्तर मिल जाता है, जिसका विवरण पहले दिया जा चुका है और अभी आगे चलकर फिर दिया जायगा। अतिभौतिक विचारप्रणालीकी जो कि तर्कशास्त्रमे मिलती है, गडबडी यह है कि व्यष्टि और समष्टि, इकाई और समूह-सबको एक साथ मिला दिया जाता है। इसी प्रकार निश्चित परिमाणोमे हाइड्रोजन, उद्रजन और आक्सीजनके मिश्रणसे पानी बनता है। आधिभौतिकवादके लिये पानीमे अम्लजन और उद्रजनका पृथक् अस्तित्व बना रहता है। केवल तर्कन्यायमें पानी तथा अम्लजान और उद्रजनका एकीकरण होता है। यह रहस्यमय कल्पना है। इससे यह परिणाम निकलता है कि अम्लजन और उद्रजन तथा पानी-सभी एक साथ आसपास रहते हैं और अनन्त कालतक रहेंगे।' वस्तुतः पाश्चात्य अतिभौतिकवाद भी भौतिकवादके समान ही निस्तत्त्व है। वास्तविक अध्यात्मवाद एवं तर्क वेदान्तके सिद्धान्त बिना समझे हुए मार्क्सवादी उसके खण्डनकी निरर्थक चेष्टा करते हैं। अध्यात्मवादी जब कहता है, सत् सत् ही है असत् नहीं, असत् असत् ही है सत् नहीं, तब उसका तात्पर्य है कि कोई वस्तु उसी रूपसे उसी दृष्टिसे सत् एव असत् दोनो नहीं हो सकती। इसी आधार- पर अनेकान्तवादका खण्डन किया जाता है। सभी देशकालमें व्यभिचरित वस्तु ही है, किसी देशकालमे व्यभिचरित वस्तु असत् है। मृत्तिकाविकार घटादिमें मृत्तिका अव्यभिचरितरूपसे विद्यमान होती है। अतः वह घटादिकी अपेक्षा सत् है। परंतु मृत्तिकाका कारण जल है, जलकी अपेक्षा मृत्तिका असत् है। उनकी