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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पशुतुल्य मनुष्य असंस्कृत मूक तभी होता है जब उसका सद्गुरु-सम्बन्ध नहीं होता । आज भी यह बात स्पष्ट है। जहाँ शिक्षण है, वहाँ ज्ञान-विद्या विकसित होती है, जहाँ शिक्षण नहीं है, वहाँ विकास नहीं होता । ईश्वरने ब्रह्माको नियुक्त करके उसे नित्य वेदोंका उपदेश दिया— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । (श्वेता० उप० ६।१८) ब्रह्माने सनकादिको एव मरीचि आदिकोको उत्पन्न करके उन्हें वेदादि शास्त्रोका उपदेश किया है । जिन मनुष्योका प्रमादवश उक्त सम्पर्क टूट गया, वे ही पशुतुल्य हो गये हैं । हान्स, लाक, रूसो आदिकी कल्पनाएँ परस्पर भी टकराती हैं । हान्सके मता- नुसार 'आदिम प्राणी समताकी स्थितिमे नहीं था, किंतु खूँखार था ।' लाकका 'आदिम मनुष्य बहुत नेक था', रूसोका भी ऐसा ही था । सुकरातके अनुसार 'मनुष्य स्वभावसे ही सामाजिक प्राणी है' इनके अनुबन्धीय राज्यको भी अन्य दार्शनिक अनैतिहासिक कहते हैं । हैकलका अनुमान केवल उसका दिमागी फितूर ही है । मनुष्यो एव पशुओके वैषम्यका कारण उनके जन्मान्तरीय कर्म मानने पड़ेंगे । निर्हेतुक शक्तिवैषम्यकी उपपत्ति हैकलके पास कुछ नहीं है । मनुष्योंमें भी कर्मतारतम्यसे ही उन्नतिकी शक्तिमें तारतम्य होता है और इसका भी अन्तिम उद्देश्य है उस आध्यात्मिक स्तरपर समता स्थापित करना, जिससे अधिक उन्नति हो ही नहीं सकती । व्यक्तिगत उन्नतिकी ओर कदम बढाना कभी भी अवनतिका कारण नहीं होता । व्यक्तिका समुदाय ही समाज है, व्यक्तिगत उन्नतिसे समाजकी उन्नति सुतरा सम्भव होती है । उन्नति एव सभ्यताका कोई भी कदम अवनतिका कदम नही है । क्या कोई विद्वान् बलवान् बनता है, एतावता किसीका नुकसान होता है ? इतनी सहज-सी चीजको आधुनिक सभ्योंने कितने उल्टे रूपमें ग्रहण किया है ? यदि किसी ऊँचे स्थानपर १०० मनुष्य चढनेके लिये अग्रसर होते हैं और यदि कुछ आलसियो, दीर्घसूत्रियोंको पीछे छोडकर कुछ लोग आगे बढते हैं तो स्पर्धासे दूसरे भी आगे बढनेके लिये दीर्घसूत्रता और आलस्य छोड़ेंगे ही । अतः आगे कदम बढ़ानेसे यदि विषमता होती है, तो यह भी उन्नत स्तरपर समताकी ओर ले जानेका ही प्रयत्न है । मुखिया, सरदार या राजाको सदा ही धर्मनियन्त्रित होना आवश्यक है । उच्छृङ्खल होना धर्महीनताका परिणाम है, सरदार या राजा होनेके कारण नहीं । धर्महीन राज्योंमें ही उच्छृङ्खल या निरङ्कुश शासन होते हैं, वेन, रावणादि इसके उदाहरण हैं । मनु, इक्ष्वाकु, नृग, नल, मान्धाता, राम, युधिष्ठिर आदि धर्मनियन्त्रित राजाओंमें निरङ्कुशताका लेश भी नहीं हो सकता था। समाजवादी ढंगकी समता उच्चकोटि मा० रा० ३२—

४९८ मार्क्सवाद और रामराज्य की होगी, यह उनके अपने, घरकी-ही कल्पना है। मुर्गों, कबूतरोंकी तरह साम्यवादी बन्धनमें मनुष्योंको सर्वथा परतन्त्र कर देना ही अगर समानता है, तो इससे कोई भी समझदार दूर ही रहना चाहेगा। यदि प्रकृति ही सबको सही रास्तेपर चलाती है, तब तो संसारमे प्रचलित शिक्षण-व्यवस्था एवं दण्डविधान सब पागलपन ही ठहरेगा और समाजवादियोका भी प्रचार और उपदेश सब व्यर्थ ही सिद्ध होगा। अतः इसे प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण समझना व्यर्थ है। प्रतिषेध कभी भी कारण नही हो सकता है। यदि प्रतिषेध ही कारण है, तब तो अवश्य ही मसलकर, जलाकर भी जौके दानेका प्रतिषेध होता ही है, फिर उससे अङ्कुरकी उत्पत्ति क्यो नही होती ? यदि विशिष्ट प्रतिषेधसे अङ्कुरकी उत्पत्ति है, तो कहना पड़ेगा कि वह प्रतिषेध नहीं है, किंतु परिणामोपयोगी विकारमात्र है, प्रतिषेध या विनाश अभावात्मक ही है, विशेषता प्रतियोगीमे ही हो सकती है, अभावमें नही, क्योकि कार्यके लिये विशिष्ट कारणका अन्वेषण होता है, प्रतिषेध या अभावका अन्वेषण नही होता । अतः प्रतिषेधसे या प्रतिषेधके प्रतिषेधसे किसी भी विशिष्टकार्यसिद्धिकी कल्पना व्यर्थ है। इसके अतिरिक्त प्रतिषेधका प्रतिषेध भावात्मक ही होता है। जैसे किसीको भ्रमवशात् रजतमे अरजत-बुद्धि होती है। तब वह कहता है कि 'नेदं रजतम्', पुनश्च जब उसका बोध होता है तब उस प्रतिषेधका प्रतिषेध होता है—'इदं नारजतम्' । यह अरजत नहीं है, इसका फल होता है रजतका व्यवस्थापन। प्रकृतिमे जिस बीजका प्रतिषेध होकर अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है, उस अङ्कुरके प्रतिषेधसे भी उस बीजका पुनः व्यवस्थापन नही होता । अतः वस्तुतः यहाँपर प्रतिषेधका प्रतिषेध हुआ ही नही। अङ्कुरको प्रतिषेधका फल किसी तरहसे कहा भी जाय, परंतु वह प्रतिषेधरूप नहीं हो सकता। और बीजको भी अङ्कुर प्रतिषेधका फल भले ही कहा जाय, परंतु अङ्कुरका प्रतिषेध अङ्कुर फल नही कहा जा सकता । अङ्कुरका कारणभूत बीज अन्य है, बीजसे अङ्कुरादि क्रमसे उत्पन्न फलरूप बीज उससे भिन्न होता है। पिता-पुत्रमे जैसे भेद होता है, वैसे ही प्रथम बीज एव बीजजन्य फलभूत बीजोमे भेद है। एक पिताके अनेक पुत्र होते हैं, वैसे ही एक बीजसे सैकडो फल उत्पन्न होते हैं। अतः यहाँ भी अन्तिम बीज प्रतिषेधका प्रतिषेध स्वरूप नही हो सकता । वस्तुतः प्रतिषेधके प्रतिषेधका व्यवहार वही होता है जहाँ प्रतिषेधके प्रतिषेधसे प्रथम प्रतिषेधके प्रतियोगीका सत्त्व-व्यवस्थापन किया जाता है। जैसे रजतनिषेधका निषेध करके रजतके सत्त्वका व्यवस्थापन किया जाता है । कहा जाता है कि 'विचारजगत् और द्वन्द्वन्याय तर्कशास्त्रका साधारण नियम है, 'हाँ' 'हाँ' है और 'नही' 'नहीं'। इसके विपरीत द्वन्द्वमान कहता है कि

मार्क्स दर्शन ४९९ 'हाँ' नहीं है और 'नहीं' हाँ है। उपरी दृष्टिसे द्वन्द्वमानकी भाषा बहुत ही विरोधपूर्ण है। लेकिन कुछ विचार करनेपर इसकी सत्यता प्रमाणित हो जायगी। तर्कशास्त्रके तीन बुनियादी नियम हैं। १. एकताका नियम, २. विरोधका नियम और ३. मध्यपरिहारका नियम। पहले नियमके अनुसार 'क' है, या 'क'='क' दूसरा नियम पहले नियमका नकारात्मक रूप है। इसका रूप है 'क' नहीं है=न 'क'। तीसरे नियमके अनुसार किसीके लिये दो विरोधी गुण एक साथ नहीं हो सकते, वास्तवमें या तो 'क', 'ख' है या 'क', 'ख' नहीं है। यदि इनमेंसे एक बात सत्य है तो दूसरी असत्य है और दूसरी सत्य है तो पहली असत्य है। इनके मध्यमे कोई बात नहीं हो सकती। 'युवेरवेगके निर्देशानुसार दूसरे और तीसरे नियमोंको इस प्रकार मिलाया जा सकता है। किसी विशिष्ट प्रश्नका, किसी वस्तुविशेषका अमुक गुण है या नहीं ? उत्तर हो सकता है 'हाँ' या नहीं। 'हाँ' और 'ना' दोनोंमे उसका उत्तर नहीं दिया जा सकता। इन नियमोंमे कोई भूल नहीं मालूम पडती। फिर द्वन्द्वमानका नियम क्योंकर सही है ? प्रकृतिमे ही इसका उत्तर मिल जाता है, जिसका विवरण पहले दिया जा चुका है और अभी आगे चलकर फिर दिया जायगा। अतिभौतिक विचारप्रणालीकी जो कि तर्कशास्त्रमे मिलती है, गडबडी यह है कि व्यष्टि और समष्टि, इकाई और समूह-सबको एक साथ मिला दिया जाता है। इसी प्रकार निश्चित परिमाणोमे हाइड्रोजन, उद्रजन और आक्सीजनके मिश्रणसे पानी बनता है। आधिभौतिकवादके लिये पानीमे अम्लजन और उद्रजनका पृथक् अस्तित्व बना रहता है। केवल तर्कन्यायमें पानी तथा अम्लजान और उद्रजनका एकीकरण होता है। यह रहस्यमय कल्पना है। इससे यह परिणाम निकलता है कि अम्लजन और उद्रजन तथा पानी-सभी एक साथ आसपास रहते हैं और अनन्त कालतक रहेंगे।' वस्तुतः पाश्चात्य अतिभौतिकवाद भी भौतिकवादके समान ही निस्तत्त्व है। वास्तविक अध्यात्मवाद एवं तर्क वेदान्तके सिद्धान्त बिना समझे हुए मार्क्सवादी उसके खण्डनकी निरर्थक चेष्टा करते हैं। अध्यात्मवादी जब कहता है, सत् सत् ही है असत् नहीं, असत् असत् ही है सत् नहीं, तब उसका तात्पर्य है कि कोई वस्तु उसी रूपसे उसी दृष्टिसे सत् एव असत् दोनो नहीं हो सकती। इसी आधार- पर अनेकान्तवादका खण्डन किया जाता है। सभी देशकालमें व्यभिचरित वस्तु ही है, किसी देशकालमे व्यभिचरित वस्तु असत् है। मृत्तिकाविकार घटादिमें मृत्तिका अव्यभिचरितरूपसे विद्यमान होती है। अतः वह घटादिकी अपेक्षा सत् है। परंतु मृत्तिकाका कारण जल है, जलकी अपेक्षा मृत्तिका असत् है। उनकी

अपेक्षा जल सत्, परंतु सर्वकारण, स्वप्रकाश, अखण्डबोधस्वरूप सत् सर्वदेश, काल तथा वस्तुओंमें अव्यभिचरित होनेसे निरपेक्ष सत् है। तद्भिन्न सब वस्तु असत् ही है। यदि सत्-असत्‌की अव्यवस्था हो तो किन्हीं भी सिद्धान्तो, मन्तव्यो अर्थात् अनेकान्तवाद या मार्क्सवाद एव द्वन्द्ववादके सम्बन्धमें भी वही बाते लागू होगी। -मार्क्सवाद भी एकान्ततः सत्य नही है। किसी रूपमे सत् है, अन्य रूपोमे असत् -भी है। फिर अनिश्चित सिद्धान्तमे किसीकी प्रवृत्ति कैसे होगी ? अपेक्षा-बुद्धिसे भाव-अभावकी एकत्र स्थिति तो भारतीय दर्शनोमे अधिक प्राचीनकालसे मान्य है— भावान्तरमभावो हि कयाचित्त्वपेक्षया। अर्थात् किसी अपेक्षासे दूसरा भाव ही अभाव है। जैसे घटघट-रूपसे भाव होनेपर भी पटरूपसे अभाव भी है। इसीलिये स्वरूप-पररूपसे हरेक वस्तु सत्, असत्, उभयात्मक है— स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मकम्। परंतु इतने मात्रसे सत्-असत्‌का अविरोध नही कहा जा सकता। स्वरूपसे सत् असत् नहीं हो सकता। अन्यरूपसे सत्‌का असत् होना यह अपेक्षाबुद्धिकृत है। नियम तभी निर्दोष होता है जब वह अव्याप्ति, अतिव्याप्ति तथा असम्भव दोषोसे मुक्त हो। विचित्र ससारमे गुणधर्मकी विचित्रता स्वाभाविक है। केवल कतिपय स्थलोमे सहचार-दर्शनमात्रसे व्याप्ति नही होती। पार्थिवत्व एवं लोह लेख्यत्वका सर्वत्र सहचार होनेपर भी केवल हीरकमे अव्याप्ति होनेमात्रसे यह व्याप्ति अशुद्ध समझी जाती है। फिर द्वन्द्वमानके तो लगभग सभी नियम अव्याप्ति-अतिव्याप्ति दोषोसे ग्रस्त होते हैं। कहा जाता है कि 'द्वन्द्वमान इस स्थावर आधिभौतिकताका भेदन कर जाता है। 'मनुष्य' शब्दमे सब सम्भव मनुष्य सम्मिलित हैं। लेकिन मनुष्यजाति और मनुष्यगण यद्यपि भिन्न और पृथक् तर्कसिद्ध श्रेणियाँ हैं, लेकिन केवल तार्किक दृष्टिसे ही वे ऐसे हैं। एक ही घटनावलीके देखनेके लिये ये विभिन्न दृष्टिकोण हैं। व्यापकताके दृष्टिकोणसे अर्थात् उस दृष्टिकोणसे, जिसमे एक ही मनुष्य जातिका सदस्य होनेके नाते सब एक समान हैं। 'मनुष्यजाति' सब मनुष्योकी समष्टि है। मनुष्यगण सब मनुष्योकी समष्टिकी ही एक और कल्पना है, लेकिन इस अर्थमे कि कोई भी मनुष्य किसी दूसरे मनुष्यके समान नही है। द्वन्द्वमानके लिये विशेष और व्यापक याने 'साधारण एक और सब' विरोध रहते हुए भी ये दोनों एक दूसरेमे और एक दूसरेके द्वारा अवस्थित हैं। 'श्याम' का 'श्यामत्व' और उसके मनुष्यत्वसे पृथक् रूपमे न रह सकता है न उसके रहनेकी कल्पना ही की जा सकती है। मनुष्यको मनुष्यरूपमें हम उस साधारण गुणसे जानते हैं— जो सब विशिष्ट मनुष्योमे विद्यमान है, और हर विशिष्ट मनुष्यकी पहचान तभी हो सकती है, जब व्यापक मनुष्यरूपसे उसकी भिन्नताको दिखलाया जाय।

हेगेलके तर्कशास्त्रका यही गुण है कि वह विरोधियोंके एकत्वको मानता है और उनको श्रेणीबद्ध करता है । 'तर्कसिद्धके रूपमें, एक ओर पूर्णरूपसे व्यापक और दूसरी ओर पूर्णरूपसे एक । हेगेलीय भाषामें दो विरोधियों—उद्जन, अम्लजन— का एकत्व ही पानी है। ये तर्ककी दृष्टिमें विरोधी हैं। उन दो विरोधियोंके मेलसे जो पानीरूप वस्तु बनती है वह न उद्जन है और न अम्लजन । गुणात्मकरूपसे दोनोंका अन्तर्धान हो जाता है और बिल्कुल नये गुणोंके संयोगकी सृष्टि हो जाती है । परिणाम तो उतना ही रहता है, लेकिन रूप परिवर्तित हो जाता है।' उपर्युक्त कथन भी निःसार है । यह तो अध्यात्मवादमें ही स्वीकृत है कि वस्तुओंमें सामान्य-विशेषभाव एवं साधर्म्य-वैधर्म्य विभिन्नरूपसे मान्य होते हैं । जाति एवं गुणकी दृष्टिसे समष्टि-व्यष्टिका उपर्युक्त विवेचन भ्रान्तिपूर्ण है । नित्य एक एव अनेकोंमें समवेत जाति है । जैसे अनेक गोव्यक्तियोंमें एक गोत्वजाति रहती है, उसीके आधारपर सभी गोव्यक्तियोंको जाना जाता है, परंतु गण या समूह तो विशेषों (नैयायिकस्वीकृत पदार्थ) का भी कहा जा सकता है, जिनमें जाति नहीं है। अनेक जातिके मनुष्योंके समूहको भी गण कहा जा सकता है, परंतु उन्हें एक जातिका नहीं कहा जा सकता यह प्रसङ्ग ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व आदि अवान्तर जातिका है । मनुष्यत्व जाति तो सभी मनुष्योंमें होती ही है । व्यष्टि और समष्टि अध्यात्मवादमें वृक्ष और वनके तुल्य है । व्यष्टित्व और समष्टित्वका तो भेद होता ही है । ऐसे अनेक गुणधर्म समष्टिमें मान्य होते हैं, जो व्यष्टिमें नहीं होते । जैसे-एक-एक तन्तुओंसे शीतापनयन नहीं होता, परंतु वही तन्तु-समुदाय पटरूपमें परिवर्तित होकर अङ्गप्रावरण, शीतापनयन आदि कार्य करते हैं। व्यक्ति-समुदायसे भिन्न होकर समष्टि कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है । जिन तत्त्वोंसे जिस वस्तुका निर्माण होता है उन तत्त्वोंका किसी-न-किसी रूपमें उस वस्तुमें बना रहना स्वाभाविक है । कर्त्ता, निमित्त आदिके बिना भी कार्य रह सकता है, परंतु उपादान या समवायी कारण बिना तो कार्यकी स्थिति सम्भव ही नहीं होती । कोई नियम तभी निर्दोष माना जाता है, जब वह अव्याप्ति- अतिव्याप्ति आदि दोषोंसे रहित हो । ब्राह्मणत्व मनुष्यत्वका व्याप्य धर्म है, सुतरां व्यापक धर्मके बिना व्याप्य धर्मकी अवस्थिति नहीं हो सकती । जैसे क्षितित्व, जलत्व आदि द्रव्यत्व-व्याप्त धर्म है । अतः क्षितित्व, जलत्व आदि द्रव्यत्वके बिना नहीं रह सकते । विभिन्न विशेषोंमें ही सामान्यका पर्यवसान होता है । वस्तुतः जिस रूपमें आक्सीजन और हाइड्रोजन जलके जनक होते हैं; उस रूपमें वे विरोधी नहीं हैं । यद्यपि अग्नि और तेल किसी रूपमें विरोधी हैं;

परंतु वे ही युक्तिसे समन्वित होकर दीपक-प्रज्वलनका भी काम करते हैं। जल-अग्नि परस्पर विरोधी हैं, परंतु युक्तिसे समन्वित होकर बाष्पद्वारा यन्त्र संचालन करते हैं । वे विरोधी अन्यरूपसे हैं, कार्यवाहक अन्यरूपसे हैं। इसीलिये स्वरूपसे भाव, अभाव, सत्, असत्‌की एकता नहीं हो सकती । अन्यथा सरोवर- कमल और गगन-कमलकी तथा मित्रातनय एव वन्ध्यातनयकी एकता भी कही जानी चाहिये । अतः इस प्रकारके काल्पनिक विरोधके दृष्टान्तसे सत्, असत्, भाव, अभावकी तरह उसी सम्बन्धसे उसी देशमे उसी वस्तुका भाव-अभाव नहीं रह सकता । जैसे भूतलके उसी प्रदेशमें संयोग सम्बन्धसे उसी प्रकारके उसी घटका भाव-अभाव-दोनो नही हो सकते । यदि यह हो सके तब तो ससारसे विरोधमात्र ही दत्तजलाञ्जलि हो जायगा । उद्रजन, अम्लजन दो विरोधियोंके मिलनेसे पानी बना । उद्रजन, अम्लजन केवल इतनेमात्रसे विरोधी नहीं होते क्योकि एक वह है जो दूसरा नहीं है । इतना दूर क्यो जाया जाय, और सरल लौकिक दृष्टान्त लें । अनेक तन्तुओसे पट बनता है, तन्तुओमे भी एक वह नहीं है, जो दूसरे हैं। एक दृष्टिसे सब परस्पर भाव एवं अभावस्वरूप हैं और उनके मिलनेसे ही पट बनता है । पटमे तन्तुओका अन्तर्भाव हो जाता है, एक नयी वस्तु पट बन जाती है । परंतु यह कलाबाजी अविचारित रमणीय ही है । तन्तुओको परस्पर विरोधी कहनेकी अपेक्षा परस्पर सहयोगी कहना प्रत्यक्ष-प्रमाणके अधिक अनुकूल है । विरोधी तो उन्हे एक दूसरेका अभावात्मक होनेसे केवल ' अपेक्षा-बुद्धिसे कहा जाता है । इसी तरह पट बननेपर तन्तुका लुप्त हो जाना, पटरूपी नयी वस्तुका बन जाना भी अविचारित रमणीय है । विचारनेपर अब भी तन्तुओसे भिन्न होकर पट कोई वस्तु नही है । शीतापनयनादि-अर्थ- क्रियाकारिता विशेषरूपसे अवस्थित समुदायका गुण है। समुदाय समुदायीसे भिन्न नहीं, एव विशेष अवस्थिति अवस्थावालोसे भिन्न नही हो सकती है । व्यष्टिवृक्षोसे भिन्न होकर समष्टि वन नहीं है। पटसे भिन्न होकर उसकी संकुचित-प्रसारित अवस्था भी भिन्न नहीं है । यही स्थिति उद्रजन, अम्लजनकी है, उन्हे परस्पर विरोधी न कहकर सहयोगी कहना अधिक उपयुक्त है। पञ्चभूत भी परस्पर विरुद्ध कहे जा सकते हैं । जलसे अग्निका निर्वाण हो जाता है, किसी ढगसे अग्निसे जलका शोषण हो जाता है; पर साथ ही उनका कार्य-कारणभाव भी है । तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है और तेजमे ही जलका सहार होता है । ब्रह्मसे ही विश्वकी उत्पत्ति होती है, उसीमे उसका संहार भी होता है । इस दृष्टिसे ब्रह्म ही विश्वका उत्पादक भी है, सहारक भी है । परंतु यह विरोध अपेक्षा बुद्धिकृत है । सत्, असत्का-सा विरोध नहीं है । इसी

तरह सत्त्व, रज, तमका भी परस्पर विरोध कहा जा सकता है । सत्त्व प्रकाशात्मक है, रज चल है, तम आवरणात्मक एव अवष्टम्भात्मक है । व्यवहारमें भी सत्त्वके बढनेपर रज-तमका घटना अनिवार्य है । रजके बढनेपर अन्यका घटना अनिवार्य है, तो भी महदादि कार्यकी उत्पत्तिमें दोनों सहयोगी बनते हैं । अवश्य ही जबतक उनका सम परिणाम चलता रहता है, तबतक वे कोई कार्य नहीं आरम्भ कर सकते, परन्तु विषमता होनेपर प्रधानके अप्रधान सहयोगी हो जाते हैं, फिर कार्यका उत्पादन करते हैं और हर एक कार्यमें वे उपलब्ध भी होते हैं । यही चीज हर एक उपादानकारणके सम्बन्धमें कही जा सकती है। अगर आक्सीजन, हाइड्रोजन जलके कारण हैं, तो अवश्य ही उनमें सयोग अपेक्षित है । इसी तरह कार्यावस्थामें भी उनका अस्तित्व रहना ही चाहिये । और कार्य भी कारणसे भिन्न होकर सर्वथा नयी वस्तु नहीं है । जैसे पटकी ही अवस्थाविशेष, उनका सकोच और प्रसार है, वैसे ही कारणकी अवस्थाविशेष ही कार्य है । इसीलिये जलसे पुनरपि हाइड्रोजन, आक्सीजन निकल आनेपर जल कुछ भी नहीं रह जाता है । भाव-अभावके समान उद्जन, अम्लजनकका विरोध नहीं होता । अतएव उनका सम्बन्ध होता है, सम्बन्धसे जल बनता है, किंतु भाव-अभावके सम्बन्धसे, सत्-असत्के सम्बन्धसे किसी कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती । इसी तरह कहा जाता है कि 'तर्कशास्त्रके अनुसार आरम्भ क्या है ? यह कुछ ( अस्तित्व ) नहीं है, क्योंकि आरम्भमात्र है । लेकिन इसी कारणसे वह कुछ नहीं भी नहीं हो सकता । इस प्रकार आरम्भ न अस्तित्व है, न नास्तित्व है । साथ ही वह अस्तित्व, नास्तित्व—दोनों ही है । यही अस्तित्व-नास्तित्वकी एकता है । एकका दूसरेमें रूपान्तर है । संक्षेपमें यह होनेकी एक क्रिया है जिसमें अस्तित्व और नास्तित्वकी साधारण बुनियाद है । इस तर्कको वास्तविकताके रूपमें देखा जाय तो श्याम एक मनुष्य है । जो एक मनुष्य-श्रेणीका है जिसमें सब मनुष्य सम्मिलित हैं । श्यामका और अन्य मनुष्योंमें व्यावर्तक धर्मोंसे भेद होता है, जो कि एकमें होते हैं, दूसरेमें नहीं । इस तरह वे विशिष्ट अंगोंमें भिन्न होते हुए भी मनुष्यत्वेन समान हैं । उन चीजोंको देकर जो उनमें नहीं हैं, किंतु दूसरोंमें हैं । लेकिन इस प्रभेदका अर्थ यही है कि अपने विशिष्ट गुणोंके अलावा वह और मनुष्योंके समान है । इस प्रकार तार्किक दृष्टिसे श्यामका पूरा ज्ञान हो जाता है । जब उसकी कल्पना विशिष्ट 'श्याम' तथा सर्वसाधारण मनुष्योंके एकत्वके रूपमें की जाय ।' मार्क्सवादी इसे एक सहज और महान् सत्य कहते हैं । विशुद्ध सत् विशुद्ध असत्से अभिन्न है । विशेष गुणोंके द्वारा ही एक वस्तुको दूसरीसे अलग किया जा सकता है और इस अलग करनेका अर्थ ही है दो बातोंका एक साथ

कहना । भावात्मकरूपसे वही वस्तु एक है और अभावात्मकरूपसे अन्य । इस प्रकार विचारमें एक वस्तुको दूसरेसे पृथक् करना हाँ और ना दोनो करना है और इसमें विरोध और पुनर्मिलन दोनो है । समरूपता और पार्थक्य-दोनोका रहना आवश्यक है, नहीं तो एकको दूसरेसे पृथक् नहीं किया जा सकता । "यही तत्त्व है सत् और असत्के एकत्वका । हेगेलकी इस तार्किक प्रथाका रूप है वाद ( थिसिस ), प्रतिवाद ( एन्टीथिसिस ) और समन्वितवाद ( सिन्थिसिस ) । दूसरे शब्दोंमें भाव-अभाव, अभावका अभाव या प्रतिषेधका प्रतिषेध । इस त्रिगुट सम्बन्धकी विशेषता यह है कि ये एक साथ विराजमान रहते हैं । एकके बाद दूसरेका आविर्भाव नहीं होता । जब कहा जाता है कि 'राम मनुष्य है' तो राम और अरामका विरोध तथा उसका साथ-साथ इन सबकी कल्पना एक साथ हो जाती है । मनमें तर्ककी जो क्रिया होती है, उसमें इन दोनोके पृथक्करणका पहले एक सिरा, फिर दूसरा सिरा और फिर दोनोका सम्बन्धित अस्तित्व दीखता है । लेकिन वास्तवमें इस त्रिगुट सम्बन्धका अस्तित्व आरम्भसे ही है और तर्कक्रिया इस अस्तित्वको मान लेती है । हेगेलने लिखा है कि इस त्रिगुट क्रियाको हम चतुष्क्रियाके रूपमें भी देख सकते हैं । पहला है अविभाजित एक, दूसरा विभाजन, तीसरा भावात्मक तथा अभावात्मक, फिर विभाजितरूपमे उस एककी पुनः स्थापना । जीवन संघर्षमें अवयवद्वारा परिवर्तनीयता और वंशानुक्रमिकताके विरोधी ऐक्यका प्रदर्शन अवयवके विकासका मुख्य स्तम्भ है ।' विरोधियोंके एकत्वके नियमको हेगेलने इस भाषामें लिखा है—'यह समझा जाता है कि भाव और अभावका अन्तर अमिट है । लेकिन तहमें ये दोनो चीजें एक हैं । कोई एक नाम दूसरेमें परिवर्तित हो सकता है । इस प्रकार जमा और उधार सम्पत्तिके दो विशेष प्रकार नहीं हैं । कर्ज लेनेवालेके लिये जो अभाव है, देनेवालेके लिये वह भाव है । पूरवका रास्ता पश्चिमका भी रास्ता है। भाव और अभाव एक दूसरेके ऊपर निर्भर है और परस्पर सम्बन्धमें ही इनका रूप प्रकाशित है । चुम्बक पत्थरका उत्तरी ध्रुव बिना दक्षिणी ध्रुवके नहीं रह सकता । किसी चुम्बकको दो भागोंमें काटनेपर एक हिस्सेमें उत्तरी और दूसरेमें दक्षिणी ध्रुव नहीं रहता । इसी प्रकार बिजलीकी दो धाराएँ-धनात्मक और ऋणात्मक, एक दूसरेसे स्वतन्त्र नही होतीं ।' वस्तुतः उपर्युक्त बाते भी वागाडम्बरके अतिरिक्त कुछ नहीं हैं—यह पीछे कहा जा चुका है । किसी अपेक्षासे भावान्तर ही अभाव होता है । स्वरूपसे कोई भी वस्तु सत् है, किंतु वही अन्य रूपसे असत् है परंतु स्वरूपसे ही कोई वस्तु सत्-असत् नहीं हो सकती । परमाणुवादियोकी दृष्टिसे समवायी कारण

मार्क्स-दर्शन ५०५ तन्तुओमे पटका आरम्भ होता है, जो पहले असत् ही रहता है। इसका असत्- कार्यवादकी दृष्टिसे खण्डन हो जाता है। असत् खपुष्प सहस्रों प्रयत्नोंसे निर्मित नहीं होता । अतः सत् ही कार्यकी अभिव्यक्ति मात्र कारकव्यापारोंसे होती है। इस स्थितिमें आरम्भके पहले, आरम्भकालमें तथा कार्य सम्पन्न होनेपर—इन तीनो अवस्थाओमे भी कारणरूपसे कार्य सत् ही रहता है। अतः स्वेन रूपेण आरम्भ या आरब्ध वस्तु सत् ही है, 'हाँ' हाँ ही है, उसे 'नहीं' नहीं कहा जा सकता । इसलिये आरम्भको अस्तित्व नास्तित्वकी एकता नहीं कहा जा सकता । राम-श्याम नामका कोई मनुष्य भी हो सकता है । कोई भी मनुष्य अपनेमें असाधारणता भी रखता है और इतर साधारणता भी है । विशिष्ट रूपसे इतर भिन्नता और तदितर व्यापक सामान्य रूपसे अभिन्नता कहनेकी अपेक्षा यह कहना अधिक सङ्गत है कि अमुक मनुष्यमें कुछ अपने असाधारण गुण हैं और कुछ मनुष्य-सामान्य-गुण । एक मनुष्य कुछ गुणोंकी अविशेषतासे ही इतर मनुष्योंसे भिन्न नहीं है। मनुष्यत्व सामान्य रहनेपर भी व्यक्तियोंमें परस्पर भिन्नता रहती है, अतः यह अस्तित्व-नास्तित्वकी एकताका उदाहरण नहीं कहा जा सकता । इस उदाहरणसे अस्तित्व-नास्तित्वकी एकाधिकरणता और विरोधपरिहार नहीं कहा जा सकता । विरोधका स्वरूप यही होता है कि— यस्य यद्देशावच्छिन्नयत्कालावच्छिन्नयत्सम्बन्धावच्छिन्नयद्धर्मावच्छिन्न- यदधिकरणता यत्र, तत्र तस्य तद्देशावच्छिन्नतत्कालावच्छिन्नतत्सम्बन्धावच्छिन्न- तद्धर्मावच्छिन्नतदत्यन्ताभावो न सम्भवति । जिस वस्तुका जिस देशमें, जिस कालमें, जिस सम्बन्धसे, जिस धर्मसे, जिस रूपसे जहाँ भाव रहता है, उस वस्तुका उसी देशमें, उसी कालमें, उसी सम्बन्ध- से, उसी रूपसे अभाव नहीं कहा जा सकता । पर्वतमें धूमत्वेन धूम रहनेपर भी वह्नित्वेन धूम नहीं है, तो भी यह अभाव अग्निके अनुमानमें बाधक नहीं हो सकता । विशेष गुणोंके कारण विशिष्टकी सामान्यसे भिन्नताका अर्थ विलक्षणता- मात्र है। इससे एक वस्तुमें सालक्षण्य-वैलक्षण्यका सह अस्तित्व सिद्ध होता है। नैयायिकोंके मतानुसार साधर्म्य-वैधर्म्य अनेक पदार्थोंमें सहावस्थित होते हैं, परंतु एतावता मूल वस्तुमें भेद नहीं सिद्ध होता । जैसे प्रसारित पट और संकुचित पटमें वैलक्षण्य प्रतीत होनेपर भी वस्तुमे भेद नही सिद्ध होता । व्यावर्तक भेदक धर्मसे वस्तुकी भिन्नता या व्यावृत्ति होती है। इसका अभिप्राय यही है कि—'नील- मुत्पलम्' नीलता कमलकी विशेषता है, इससे वह अनील श्वेत, अरुण आदि कमलोसे भिन्न सिद्ध होता है। नीलताको छोड़कर वह अन्य कमलोसे अभिन्न ही

५०६ मार्क्सवाद और रामराज्य

रहता है । यद्यपि भेद-अभेद दोनो असमानता तथा समानताके ही बोधक हैं, भिन्नता अर्थात् भिन्नजातीयता अभिन्नता अर्थात् अभिन्नजातीयता । परंतु इस समानजातीयता, असमानजातीयताका भेदाभेदके समान परस्पर विरोध नहीं होता, क्योकि कमल व्यापक है । नील कमल उसका ही अवान्तर भेद है, जैसे मनुष्यजातिके भीतर ब्राह्मणत्व आदि जातियाँ हैं । एक ब्राह्मणमें ब्राह्मणत्व भी है, मनुष्यत्व भी । इनका आपसमें कोई विरोध नही होता । यह भावात्मक-अभावात्मक वस्तुओका एकीकरण नहीं कहा जा सकता । इतनेमात्रके लिये इतनी दूर भटकनेकी आवश्यकता नही । यो तो सहयोगी वस्तुओमे भी भावात्मकता, अभावात्मकताका सह अस्तित्व किसी अपेक्षा-भेदसे मिलता ही है । यह विरोध परिहार स्वमनःपरिकल्पित ही है । जैसे कोई अपने मनसे ही प्रेतकी कल्पना करके उससे संग्राम करता हो और कहता हो कि हमने अपने प्रतिद्वन्द्वीको हरा दिया, ठीक यह भी वैसा ही है । भाव, अभाव एव अभावका अभाव या वाद, प्रतिवाद, समन्वितवाद अथवा अविभक्त एक तथा उसका भावात्मक, अभावात्मक विभाजन, फिर विभक्त स्वरूपोसे एक वस्तुकी स्थापना आदि कल्पना मनोरञ्जक अवश्य है, पर है सारशून्य ही । यह केवल बौद्धोंके विनाश ( अभाव ) कारणवादके आधारपर गढी गयी है । बौद्धोने देखा कि बीजसे अङ्कुर उत्पन्न होनेमें बीजका स्वरूप नष्ट हो जाता है; अतः अङ्कुरोत्पत्तिके अव्यवहितपूर्व क्षणवर्ती विनाश ही है; अतः विनाशहीको कारण मानना ठीक है । परंतु साख्यो और वेदान्तियोने उसका खण्डन किया है । यदि विनाश ही कारण है तो बीजदाहसे भी अङ्कुर उत्पन्न होना चाहिये । यदि अभाव ही कारण है तो वह तो सर्वत्र सुलभ है तो फिर कार्योत्पत्तिके लिये कारण-सामग्री ढूँढनेकी प्रवृत्ति क्यों होती है ! फिर कार्यमें कारणांश सत्की अनुवृत्ति देखी जाती है । विनाश, अभाव या असत्की अनुवृत्ति नहीं देखी जाती । अतः भाव ही कार्यका कारण है, अभाव नहीं । इस मण्डन एवं खण्डनसे प्रभावित होकर मार्क्सवादियोने मूलबीजको अविभाजित एक वस्तु मान पुनः उसका विभाजन मानकर भाव, अभावकी कल्पना की और उनके समन्वयसे अङ्कुरकी उत्पत्ति मान ली । परंतु वस्तुतः यहाँ भाव-अभाव-जैसा विभाजन और उसके समन्वयका कोई प्रश्न ही नहीं उठता ! विनाश, अभाव या असत्से न कोई कार्य उत्पन्न हो सकता है, न सत्-असत्का कोई सम्बन्ध हो सकता है । न ख-पुष्प, वन्ध्यापुत्रसे किसीकी उत्पत्ति हो सकती है, न किसीसे उनका कोई सम्बन्ध ही हो सकता है । बीजावयव ही अङ्कुरके कारण हैं और उन्हींका कार्यमें अनुवेध भी रहता है । परंतु एक उपादानमे कार्यान्तरकी

मार्क्स-दर्शन [५०७]

उत्पत्तिके लिये पूर्वकायका तिरोधान आवश्यक होता है। इसीलिये बीजावस्थाका तिरोभाव नान्तरीयक रूपसे होता है। अवयवद्वारा परिवर्तनीयता और वंशानुक्रमिकताके विरोधी ऐक्यका उदाहरण भी ऐसा ही है। जैसे आम्रादि बीजसे आम्रादि वृक्षकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही मनुष्य, पशु आदि बीजोसे ही मनुष्य, पशु आदि देहोंकी उत्पत्ति होती है। अवयव- परिवर्तनादिद्वारा गोलाङ्गूल, मनुष्य आदिके विकासकी कल्पना सर्वथा अप्रमाणित है। उसमें मुख्य आपत्ति यह है कि उन-उन प्राणियोंकी परम्परा स्वतन्त्ररूपसे आज भी प्रचलित है, आज वैसा कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं होता। न तो पूँछ घिसनेसे आज कोई मनुष्य बनता है और न मनुष्यसे आगे कोई विकसित वर्ण दिखायी देता है। न कोई मनुष्यका अङ्ग बढ़ रहा है और न कोई घट रहा है। यों परिणामवादमें कार्याके रूपमें भिन्नता और कारणात्मना अभिन्नताका सिद्धान्त मान्य है ही। इसका तत्त्व भेदाभेद-विवेचनमें आ चुका है। हीगेलके दृष्टान्तोंसे भाव-अभाव, सत्-असत्का विरोध मिट नहीं सकता। जमा-उधार, लेना-देना, ऋण-धन, पूर्व-पश्चिम आदिमें भाव, अभावकी अपेक्षा बुद्धिजन्य कल्पनामात्र है। उनकी सम्पत्ति या रास्तेके एक स्थानमें ऋण-धन ओर पूर्व-पश्चिमकी एकता हो सकती है, परंतु क्या इसी तरह उसी देशमें, उसी कालमें, उसी सम्बन्धसे, उसी रूपमें, उसी घटका भाव और उसीका अभाव साथ-साथ रह सकता है? क्या इसी तरह मित्रापुत्र और वन्ध्यातनयका सह अस्तित्व हो सकता है? वस्तुस्थिति यह है—'क्वचिदप्युपाधौ सत्त्वेन प्रतीयमानत्वा- नधिकरणत्व' ही असत् है। अर्थात् जो किसी भी उपाधि या अधिकरणमें सत्त्वेन प्रतीत न हो वही असत् है। जो प्रातिभासिक रजतादि कहीं शुक्तिकादिमें सत्त्वेन प्रतीत होता है, वह शुक्ति रजतादि प्रातिभासिक सत् है। कारण ब्रह्ममें सत्त्वेन प्रतीत आकाशादि व्यावहारिक सत् है और अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाशरूपसे भासमान सत् पारमार्थिक सत् है। ऐसे सत्-असत्की भी यदि एकता हो सकती है, तब संसारमें विरोध क्या है। फिर शोषक शोषित-वर्गोंका ही अमिट विरोध क्यों? उनमें तो एकता स्पष्ट ही है। दूसरोंके भक्षक जंगली जानवर या पानीकी मछली आदि स्वयं ही दूसरोंद्वारा भक्षित होते हैं, फिर यहाँ तो एक स्थानमें ही शोषकत्व, शोषितत्व स्पष्ट है। वस्तुतः सत्-असत्का भेद अपेक्षाबुद्धिजन्य कल्पनामात्र नहीं है। हाँ, जहाँ भावान्तर ही अभाव है, वहाँ विरोधकी चर्चा व्यर्थ है। पटाभाव घट स्वरूप है, अतः घटका, पटाभावका कोई विरोध नहीं है, एतावता घटाभावका भी घटके साथ विरोध नहीं है, यह कहना उपहासास्पद ही

है । साथ ही भाव, अभाव एक दूसरेके ऊपर निर्भर है—इसका दो अर्थ हो सकता है । एक तो यह कि अभाव किसी वस्तुका और किसी अधिकरणमे होता है, अर्थात् प्रतियोगिनिरूपक ( जिसका अभाव हो ) और दूसरा अनुयोगी, ( जैसे 'भूतले घटो नास्ति' 'भूतलमे घट नहीं है' ) । भूतलका तथा घटका ज्ञान हुए बिना घटाभावका ज्ञान नही हो सकता । अभाव अधिकरणस्वरूप है, इस दृष्टिसे अनुयोगिस्वरूप तो अभाव कहा जा सकता है, परंतु अभाव और प्रतियोगी भी कभी एक हो जाते हो, ऐसी बात नहीं है । इसके अतिरिक्त अभाव तो अवश्य ही अनुयोगी-प्रतियोगीकी अपेक्षा रखता है, परंतु भाव इस प्रकार अभावकी अपेक्षा नहीं रखता । निरुपाख्य असत्त्व इससे भी अधिक अव्यवहार्य है । चुम्बकके उत्तरी ध्रुव, दक्षिणी ध्रुव एवं बिजलीकी धनात्मक-ऋणात्मक दो धाराएँ परस्पर विरोधी होनेपर भी भावरूप हैं । उनका जुट सकना सम्भव है, परंतु इसी तरह भाव-अभाव, सत्-असत्का जुटना असम्भव है । उपर्युक्त विरोध सत्त्व, रज, तमके विरोध- जैसा है, जो कि विरोध होनेपर भी समन्वित होकर कार्यारम्भक होते हैं । इस प्रकार भाव-अभाव, सत्-असत्का समन्वय होकर कार्यारम्भकता सम्भव नही है । कहा जाता है कि 'प्रकृतिके दृश्यगत घटनाओके मूलमे भूतकी गति है । इसका विरोध स्पष्ट है । यदि कोई पूछे कि कोई गतिशील पदार्थ किसी विशेष समयपर किसी स्थानपर है या नही, तो युवेरवेगके नियमके अनुसार इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता कि 'हाँ' 'हाँ' है और 'नहीं' 'नहीं' है । गतिशील पदार्थ एक बिन्दुपर है भी और नही भी है । इसका विचार इसी संकेतसे किया जा सकता है कि 'हाँ' 'नहीं' है और 'नहीं' 'हाँ' । गतिशील पदार्थ 'विरोधके तर्क' की अकाट्य दलील है और जो इस तर्कको नहीं मानता, उसको जैनोके साथ कहना पड़ेगा कि गति इन्द्रियोका भ्रममात्र है । जो ऐसा नहीं मानते उन्हे या तो युवेरवेगके तर्कशास्त्रके बुनियादी नियमको मानकर गतिका त्याग करना पड़ेगा अथवा गतिको मानकर इस बुनियादी नियमका परिहार करना होगा ।' पहले ही कहा जा चुका है कि प्रकृतिकी दृश्यगत घटनाओकी बुनियादी बात है भूतकी गति । लेकिन गति एक विरोध है । इसका विचार द्वन्द्वमानके नियमसे किया जाना चाहिये अर्थात् इस संकेतसे कि 'हाँ' नहीं है और 'नहीं' 'हाँ' है । इसलिये यह मानना पड़ेगा कि दृश्यगत घटनाओके सम्बन्धमे हम विरोधी तर्कके राज्यमे हैं । लेकिन गतिशील भूतके अणुओके संयोगसे वस्तुओकी सृष्टि होती है । यह संयोग कम या अधिक क्षणस्थायी होकर तिरोहित हो

जाता है और दूसरे संयोग इसका स्थान ले लेते हैं। जो अनन्त है, वह है भूतकी गति । जब बाहरी गतिके कारण भूतके एक विशिष्ट संयोगका आविर्भाव होता है और गतिहीके कारण जबतक उसका अन्तर्धान नहीं होता, तबतक इसके अस्तित्वके प्रश्नको भावात्मकरूपसे ही हल किया जा सकता है । यही कारण है कि यदि कोई बुधग्रहको दिखाकर हमसे पूछे कि उसका अस्तित्व है या नहीं ? तो हम निःसंकोच यह उत्तर देंगे कि ‘हाँ’ है । इसका अर्थ यह है कि स्पष्ट वस्तुओंके सम्बन्धमें हम युवेरवेगके ही नियमका अनुसरण करेंगे । इस राज्यमें ‘हाँ’ ‘हाँ’ है और ‘नहीं’ ‘नहीं’ का ही संकेत लागू होता है । लेकिन इस नियमका राज्य अबाध नहीं है । जब कोई वस्तु उत्पत्तिकी अवस्थामें है तो उसका उत्तर देनेमें कुछ संकोच नहीं होता । जब किसी मनुष्यके सरके बाल काफी उड़े देखे जाते हैं, तो कहा जाता है कि वह गंजा है । लेकिन वह कब पूरा गंजा हो जायगा, ठीक उस मुहूर्त्तका निश्चय नहीं किया जा सकता । ‘किसी विशिष्ट प्रश्नका कि अमुक वस्तुका अमुक गुण है या नहीं, ‘हाँ’ या ‘ना’ में ही उत्तर दिया जा सकता है । लेकिन जब कोई वस्तु परिवर्तनकी स्थितिमें है, किसी विशेष गुणका उसमें संयोग या वियोग हो रहा हो, तब इसका उत्तर दिया जा सकता है—‘हाँ’ ‘नहीं’ है तथा ‘नहीं’ है ‘हाँ’ । वेरवेगके नियमके अनुसार इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता । यह एतराज किया जा सकता है कि जिस गुणका वियोग हो रहा है उसका अभी अन्तर्धान नहीं हुआ और जिस गुणका संयोग हो रहा है, अभी [L

५१० मार्क्सवाद और रामराज्य काल वड़ा सूक्ष्म होता है, अतः किसी स्थलपर समकालमे गतिशील पदार्थका अस्तित्व, नास्तित्व नही कहा जा सकता । उसी वस्तुको रूपान्तरसे भाव एव रूपान्तरसे अभाव कहना सम्भव है । परंतु उसी रूपसे भाव अभाव—दोनो कोटि-कोटि प्रयत्नोसे भी सम्भव नहीं हैं, तीव्रगामी बाण या तलवारसे समवेत सहस्र कमलपत्रका छेदन समकालमें ही प्रतीत होता है । पापड़ खाते समय समकालमें ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धकी प्रतीति समकालमे मालूम पडती है, फिर भी सर्वत्र क्रमिकता ही है। हाँ, क्रम इतना सूक्ष्म है कि परिलक्षित नहीं होता, फिर भी उसका अनुमान तो होता ही है । इस तरह अति तीव्रगतिमे, अतिसूक्ष्मकालमें अस्तित्व-नास्तित्वका क्रम भी बदल जाता है । इसीलिये अस्तित्व- नास्तित्व एकत्र स्थलमे क्रमिक ही रहता है; समकालिक नही । सामान्य गतिमान् पदार्थका जब विभिन्न स्थानीय अस्तित्व, नास्तित्व, भिन्नकालिक है, तो इसी तरह तीव्र गतिमान् पदार्थोंका भी एकत्र अस्तित्व, नास्तित्व भिन्नकालिक ही मानना उचित है । इस तरह उसे अकाट्य तर्क समझना भ्रम ही है । युवेरवेग हो या कोई और हो, यौक्तिक विचारमे जिसका पक्ष उचित हो ग्रहण करना चाहिये । अयुक्तियुक्त किसीका भी मत त्याज्य होना चाहिये । किसी भी नियमसे सत् असत्, असत् सत् नही हो सकता । द्वन्द्वमानकी बाजीगरी भी इस सम्बन्धमे व्यर्थ ही है । सिर्फ घटका स्वेन रूपेण अस्तित्व है, अन्यरूपेण नास्तित्व है । इसके सिवा अस्ति, नास्तिकी एकत्र अवस्थिति सर्वथा असम्भव है । गतिशील परमाणुओके संयोगसे दृश्य वस्तुओका निर्माण हो अथवा प्रतिक्षण परिणामी प्रकृति-तत्त्वका परिणामस्वरूप दृश्य वस्तु हो उसकी अस्थिरता निश्चित है । फिर भी वस्तुके भाव-अभावमे संदेह नही होना चाहिये । संदेह होता है स्थिरता एवं अस्थिरतामे । नदीप्रवाह एव दीपशिखामें स्थूलदृष्टिसे स्थिरता एव एकता प्रतीत होती है, किंतु वस्तुतः उनमे स्थिरता-एकता सादृश्यमूलक भ्रम ही है । गगन, पर्वत, समुद्र, नक्षत्रादि—सभीमे स्थिरता, एकता, प्रत्यभिज्ञा इसी प्रकार सादृश्यमूलक भ्रम ही है । फिर भी अविचारित रमणीय एकता आदिका व्यवहार चलता ही है । सदृश परिणाम जबतक चलता है, तबतक एकता विसदृश परिणाम होनेसे ही भिन्नता, अनेकताकी प्रतीति होने लगती है । सदृश-विसदृश किसी भी परिणाममे अस्तित्व तो रहता ही है, आविर्भाव, तिरोभावके आधारपर होने- वाले भाव-अभावके व्यवहारमे भी क्रम अनिवार्य है । समकालमे, समदेशमे, समसम्बन्धसे, समरूपसे एक ही वस्तुका भाव या अभाव नही रह सकता । यह पर्वतवत् अकम्प्य विरोध है, यह कहा जा चुका है । प्रमाणकी दृष्टिसे सब स्पष्ट ही होता है, अस्पष्ट नही । सिरके अधिकांश बालोंके उड़ जानेपर भी हम यही कह सकते हैं कि 'वह खल्वाट हो रहा है ।'

जिसे पूरे मुहूर्तका पता लगाना अभीष्ट है, उसे घडी लेकर त्राटक लगाकर बैठना ही पड़ेगा । जिसे गर्दभके बालोंकी जिज्ञासा है, उसे गिननेका श्रम करना ही पड़ेगा । जैसे अमुक वस्तुका अमुक गुण है या नहीं, इस प्रश्नका उत्तर हाँ या नहींमें ही देना उचित है, वैसे ही परिवर्तनकी हालतमें भी निश्चित उत्तर दिया ही जा सकता है । सांख्यीय सत्कार्यवादके अनुसार छोटे-से वटबीजके अंदर वटवृक्षकी सत्ता है तभी उसका प्रादुर्भाव होता है । फिर भी जबतक उसका आविर्भाव नहीं है तबतक अभावका व्यवहार चलता है ओर जिस कालमें अङ्कुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पल्लवादिकी अवस्था है उस कालमें स्पष्टतया उसी रूपमें उसका भाव, अन्य रूपमें अभाव कहनेमें कोई अडचन नहीं हो सकती । युवककी ठोढ़ीमें बालोंकी जो अवस्था है, उसी रूपमें उसका भाव अन्यरूपमें अभाव कहनेमें भी कोई अडचन नहीं । उसी भूतलपर देश-कालभेदसे, सम्बन्ध तथा रूपभेदसे, वटके भाव-अभावका व्यवहार होता ही है । वस्तुओं तथा उनके गुणके सम्बन्धमें यही स्पष्ट मत है । 'हाँ' नहीं है, 'नहीं' हाँ है, यह मत कभी भी स्पष्ट मत नहीं कहा जा सकता । कारणमें कार्यका अस्तित्व रहता है; इसलिये बीजमे भी अङ्कुर है । युवक क्या, शिशुकी भी ठोढीमे वालोका अस्तित्व है । जबतक आविर्भाव नहीं है तबतक अङ्कुरके तुल्य बालोका भी अभाव है । जितना प्रादुर्भाव है उतनेका भाव, जितनेका नहीं उतनेका अभाव है, इससे अधिक स्पष्टता क्या हो सकती है । एफीसियसका प्राचीन दार्शनिक कहता है कि 'सभी चीजे परिवर्तनशील हैं, सभी परिवर्तित हो रही हैं । जिन संयोगोंको हम वस्तु नाम देते हैं, वे सदा ही परिवर्तनकी स्थितिमें हैं।' जबतक ऐसे संयोगोंका अनुपात कायम रहता है, उनका विचार हम हाँ-हाँ ओर नहीं-नहींके संकेतसे कर सकतें हैं । लेकिन जिस समय उनमें ऐसा परिवर्तन होता है कि वह पहिला अनुपात नहीं रहता, तब उनका विचार विरोधके तर्कसे ही हो सकता है । हमें हाँ और ना दोनोंमें उत्तर देना पड़ेगा । वह है भी और नहीं भी है । 'जैसे स्थिरता गतिका एक विशिष्ट प्रकार है उसी तरह साधारण तर्कशास्त्र द्वन्द्वमान तर्कका एक विशेष प्रकार है।' प्लेटोके शिष्य क्रेटिलसके विषयमें कहा जाता है कि जब हेराक्लिट्सने कहा कि एक ही नदीमे हम दो बार प्रवेश नहीं कर सकते, तब उसने कहा कि एक बार भी हम उसमें प्रवेश नहीं कर सकते, क्योंकि प्रवेश करते-करते उसमें परिवर्तन होता रहता है । वह एक दूसरी नदी हो जाती है । ऐसी रायमें होनेकी क्रियाको उसके अस्तित्वसे अधिक महत्त्व दिया जाता है । यह द्वन्द्वमानका अपव्यवहार है । हेगेलका कहना है कि 'कुछ' सर्वप्रथम 'प्रतिषेधका प्रतिषेध' है ।

द्वन्द्वमान और भौतिकवादका आपसमें कोई विरोध नहीं है । वास्तवमें द्वन्द्वमानकी बुनियाद ही भौतिकवाद है । यदि प्रकृतिकी भौतिकवादी धारणाका अन्त हो जाय तो साथ ही द्वन्द्वमानका भी अन्त हो जायगा । हीगेलकी प्रथा मे 'द्वन्द्वमान और अतिभौतिकवाद दोनो समानार्थसूचक हैं । मार्क्सय दर्शनमे द्वन्द्वमान प्राकृतिक सिद्धान्तके सहारे खड़ा है । हीगेलके अनुसार धारणाओमें जो विरोध है उनके आविष्कार और हलसे ही विचारधारा आगे बढती है । भौतिकवादी सिद्धान्तके अनुसार धारणाओमें अवस्थित विरोध उन विरोधोके प्रतिबिम्बमात्र हैं जो दृश्यगत जगत् वर्तमान हैं और जिनका मूल कारण प्रकृतिका अन्तर्विरोध यानी उसकी गति है ।' एफेशियसके प्राचीन दार्शनिककी दृष्टि भी इस सम्बन्धमें भ्रमात्मक ही है । सूक्ष्मकालभेदके अनुसार सूक्ष्मपरिवर्तित अवस्थाओका भी सुस्पष्ट अस्ति या नास्तिरूपसे निरूपण किया जा सकता है । अनिश्चित अवस्था सदा ही अज्ञानकी अवस्था है, प्राकृतिक एवं यान्त्रिक प्रत्यक्ष साधनो, अनुमानो या आर्षविज्ञानों अथवा अपौरुषेय आगमोके आधारपर उस अज्ञानको मिटाना ही उचित है । उभयतः आकर्षणकी स्थिरता एक गतिका प्रकार भले मान्य हो, परतु सब गतियो एवं गतिमानोकी अधिष्ठानभूत आत्मसत्ता गतिका प्रकारविशेष नहीं है । एकत्व-भ्रमके मूल कारण सादृश्य-ज्ञानके लिये 'तेनेदं सदृशम्' 'के ते नेदं सदृशम्' जाननेके लिये अनेककालावस्थायी द्रष्टाको स्वतः स्थिर मानना पड़ता है । इसीलिये सांख्योने सब पदार्थोंको क्षणपरिणामी मानते हुए भी चित्-शक्तिको कूटस्थ माना है— क्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्तेः । व्यवहारमे गतिमान, पशुपक्ष्यादि जंगम तथा स्थावर भूमि पर्वतादि स्वतन्तरूपसे मान्य है । अतः गतिविशेष ही स्थिरता है, यह दृष्टान्त ही असङ्गत है । इस तरह सत्‌को असत्, असत्‌को सत् कहनेवाला द्वन्द्वमान कोई तर्क ही नही है । नदीके प्रथम प्रवेगकालमें ही नहीं, किंतु प्रतिक्षण भिन्नता क्रैटिलससे बहुत पहले भारतीय दर्शनोंने बता रखा है— नित्यदा ह्यङ्ग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च । कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दृश्यते ॥ यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पतेः । तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादयः कृताः ॥ सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् । सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ( श्रीमद्भा० ११ । २२ । ४२—४४ )

निषेधका निषेध है अथवा घटध्वंसका ध्वंस है, वह ध्वंस" Wait, look at "निषेध": it looks like "निषेध" or "निषेध"? It's "निषेध"! Wait, look at "ध्वंस": it has "ध्वंस".

Let's read every line carefully from top to bottom:

Title: मार्क्स दर्शन Page number: ५१३

नित्य ही भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलय अलक्ष्य वेगवाले कालद्वारा होना रहता है। सूक्ष्म होनेके कारण वह प्रतीत नहीं होता। दीपादि अग्नि-ज्वालाओं, सरिताओं, फलो तथा वनस्पतियों एवं सभी भूतोंका वय एव अवस्थाओंके (Wait, "फलो" has no bindi? In L3: "फलो तथा वनस्पतियों एवं सभी भूतोंका वय एव अवस्थाओंके" - "फलो", "एव" has no anusvara or has? Look: "वय एव अवस्थाओंके" - it's "वय एव" or "वय एवं"? It looks like "वय एव"). अनुसार क्षण-क्षणपर उत्पत्ति और प्रलय होता रहता है। क्षण-परिवर्तनशील होनेपर भी 'यह वही दीप है, यह वही जल है, यह वही पुत्रादि है', इस प्रकारकी (Note: single quotes around 'यह वही दीप है, यह वही जल है, यह वही पुत्रादि है') [L6

५१४ मार्क्सवाद और रामराज्य एक आकस्मिक बटोर है, जहाँ वे एक दूसरेसे विच्छिन्न तथा स्वतन्त्र हैं ।' इसके विपरीत द्वन्द्वमान इन वस्तुओ और दृश्यमान घटनाओको एक सूत्रमें बाँधता है जिसमें उनकी पारस्परिक निर्भरता प्रकाश पाती है । इसलिये द्वन्द्वमानके अनुसार किसी प्राकृतिक घटनाको स्वतन्त्ररूपसे, अपने बहिरावेष्टनसे अलगकर नहीं समझा जा सकता; क्योकि वे इन बहिरावेष्टनोसे सम्बन्धित हैं और अपनी पारिपार्श्विक अवस्थाद्वारा सीमित हैं । अतिभौतिकवादके विपरीत द्वन्द्वमान यह मानता है कि प्रकृतिकी अवस्था स्थिर और गतिहीन नहीं है, बल्कि अविराम गति और परिवर्तनकी अवस्था है, अविराम नवीन और विकासकी अवस्था है जहाँ किसी-न-किसी चीजका उत्थान और विकास होता है और किसी-न-किसी चीजका ध्वंस और निर्माण । इसलिये द्वन्द्वमानके तरीकेकी यह माँग है कि दृश्यगत घटनाओका विचार न केवल उनके पारस्परिक सम्बन्ध और उनकी पारस्परिक निर्भरताके दृष्टिकोणसे होना चाहिये, बल्कि उनकी गति, उनका परिवर्तन, विकास, आविर्भाव और अन्तर्धानकी दृष्टिसे भी होना चाहिये । द्वन्द्वमानका तरीका मुख्यरूपसे उसको महत्त्व नहीं देता जो उस मुहूर्तमें स्थायी और दृढ मालूम होता है, लेकिन जिसका अन्त होना आरम्भ हो गया हो, बल्कि उसको जिसका उत्थान और विकास हो रहा हो, यद्यपि उस क्षणमें वह भंगुर ही मालूम पड़ रहा है, क्योकि द्वन्द्वमान उसीको अजेय मानता है जिसका उत्थान और विकास हो रहा हो । एजिल्सके शब्दोमें सारी प्रकृति, छोटी-से-छोटी लेकर बड़ी-से-बड़ी चीज, एक बालूके कणसे सूर्यतक, प्रोटिस्टा ( प्राथमिक जीवित कोष ) से मनुष्यतक, लगातार आविर्भाव और तिरोधानकी अवस्थामें है, सदा परिवर्तनशील है और परिवर्तनकी अवस्थामें है इसलिये एजिल्सका कहना द्वन्द्वमान वस्तुओं और उनके मानसिक प्रतिबिम्बोको उनके पारस्परिक सम्बन्ध और संयोगमें उनकी गति, उनके उत्थान और अन्तर्धानमें देखता है । 'अतिभौतिकवादके विपरीत द्वन्द्वमान विकासकी क्रियाको सामान्य वृद्धिके रूपमें, जहाँ परिमाणकी वृद्धि और ह्राससे गुणोंका परिवर्तन नहीं होता, नहीं देखता, बल्कि ऐसे विकासके रूपमें देखता है, जो नगण्य और अदृश्य परिवर्तनसे बुनियादी गुणोके परिवर्तनके रूपमें परिणत होता है । इस विकासमें गुणात्मक परिवर्तन धीरे-धीरे नहीं होता, बल्कि एकाएक और द्रुतगतिसे; जो एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें कुदानका रूप लेता है । यह आकस्मिकरूपसे घटित नहीं होता, बल्कि क्रमवर्धमान परिमाणात्मक परिवर्तनोंके संग्रहका परिणाम है । द्वन्द्वमानके तरीकेके लिये यह आवश्यक है कि इस विकासकी क्रियाको हम चक्रगतिके रूपमें न देखे, न इस रूपमें कि जो कुछ पहले घटित हो चुका है,

मार्क्स-दर्शन ५१९ उसकी सामान्य पुनरावृत्ति हो रही है, बल्कि एक अनुगति और ऊर्ध्वगतिके रूपमें, एक गुणात्मक अवस्थासे दूसरी नयी गुणात्मक अवस्थामें परिवर्तनके रूपमें, साधारणसे असाधारण, निम्नस्तरसे उच्चस्तरपर विकासके रूपमें देखना चाहिये।' अवश्य ही वस्तु-वैचित्र्य विचार-विस्तारमें उपयोगी है, फिर भी वस्तु बिना भी स्वप्नों, मनोरथोंमें विचार, विस्तार परिलक्षित होते हैं, परन्तु विचार बिना तो वस्तुका विकास असम्भव ही है। जैसे वैज्ञानिक यन्त्र, रासायनिक तत्त्वोंका विकास, विश्लेषण विचारप्रभूत हैं, वैसे ही प्राकृतिक, भौतिक गति या विकास भी ईश्वरीय विचारमूलक ही हैं। इसीलिये— 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति' (छा० उ० ६।२।३) —इत्यादि वचनोंमें उपनिषदोंमें स्पष्टरूपसे कहा गया है कि स्वप्रकाश, सत्, चेतनने ही ईक्षणपूर्वक विश्व-निर्माण किया। द्वन्द्वमानके जादूसे जड-प्रकृति या जड- भूतोंमें स्वतः चन्द्र, सूर्य आदि निर्माणकी क्षमता नहीं सिद्ध होती। पशु- मनुष्य एवं उसके दिव्य मस्तिष्क आदि यदि केवल भूतोंका ही करिश्मा है, तो विविध यन्त्रोंके निर्माणके लिये भी चेतन मनुष्यकी अपेक्षा न होनी चाहिये । अध्यात्मवादमें प्रकृति, वस्तुओं एवं घटनाओंका आकस्मिक बटोर नहीं है । यह कल्पना तो असमीक्ष्यकारी जड़में ही हो सकती है। अध्यात्मवादमें तो संसारके किसी पदार्थकी चेष्टा कर्मसापेक्ष ईश्वरके विचारसे ही होती है। किसी भद्दे पाश्चात्य अध्यात्मवादमें प्रकृतिको वस्तुओं एवं घटनाओंका आकस्मिक बटोर कहा जा सकता है। मार्क्सवादका प्रकृति शब्द भी भ्रामक है, वस्तुतः वे सांख्योंकी प्रकृतितक पहुँच भी नहीं सके हैं। वे तो भूतों, परमाणुओं तथा उसके कतिपय विश्लेषणों- तक ही पहुँच सके हैं। अध्यात्मवादियोंकी दृष्टियोंमें आकाशसे भी सूक्ष्म शब्द तन्मात्रा और उससे भी सूक्ष्म अह, अहसे भी सूक्ष्म महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे भी सूक्ष्म प्रकृति है। इसका विस्तृत विवेचन अन्यत्र किया जा चुका है। प्रपञ्चकी विचित्रतासे सम्बन्धकी भी विचित्रता होती है, अतएव विच्छिन्न, अविच्छिन्न, स्वतन्त्र, अस्वतन्त्र —अनेक प्रकारके पदार्थ संसारमें होते हैं। प्रत्येक भोग्य पदार्थ भोक्तृसम्बद्ध होते हैं। प्रत्येक कार्य, कारणसम्बद्ध भी होते हैं। साथ ही अनेक पदार्थ परस्पर सम्बद्ध होते हैं, कई असम्बद्ध होते हैं। कई अनुकूल सम्बन्ध- वाले, कई प्रतिकूल सम्बन्धवाले होते हैं। भौतिकवादी सम्मत-प्रपञ्चकी अप्रामाणिक एक सूत्रबद्धताकी अपेक्षा ईश्वर, काल, कर्म तथा भोक्तामें उसकी सम्बद्धता कहीं श्रेष्ठ है। घटनाओंके सम्बन्धमें भी यही बात कही जा सकती है । संसारमें कितने ही पदार्थ उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, उनकी परम्परासे भी परस्पर सम्बन्ध नहीं होता, फिर प्रत्येक पदार्थको परस्पर निर्भर कैसे कहा जा सकता

५१६ मार्क्सवाद और रामराज्य है ? द्वन्द्वमात्रमें ही नहीं, किसी भी दर्शनमे किसी वस्तुको समझने, पहचाननेके लिये अपेक्षित अङ्गोपाङ्गका ज्ञान सम्पादित किया जाता है । किसी रोगको समझनेके लिये उसके निदान, आहार-विहार, देश-काल, साक्षात् या परम्परासे प्रभाव डालनेवाले पदार्थों तथा घटनाओपर विचार किया ही जाता है । इसी प्रकार सम्बन्धित सभी घटनाओके सम्बन्धमे विचार किया ही जाता है । प्रकृतिकी अविराम गति और प्राचीनका तिरोभाव, नवीनका आविर्भाव आदि कल्पनाएँ सांख्योकी ही हैं । इसी आविर्भाव-तिरोभावको निर्माण तथा ध्वंस कहा जा सकता है । अवश्य ही सांख्यके मतानुसार सत्‌का ही आविर्भाव-तिरोभाव होता है, अत्यन्त असत्‌का नहीं— नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । ( गीता २ । १६ ) यह कोई द्वन्द्वमानका नया दृष्टिकोण नहीं है । सभी विचारक किसी भी घटनामे आविर्भाव-तिरोभावके विचारको आदर देते हैं । जिसकी आयति (भविष्य) उत्तम होती है, वही महत्त्वपूर्ण होता है । इसीलिये द्वितीयाके चन्द्रका वन्दन किया जाता है, क्योकि वह उत्तरोत्तर वर्धमान दशामें रहता है । आयतिशून्य पूर्णिमाका पूर्ण चन्द्र भी इतना माङ्गलिक नहीं माना जाता, क्योकि उसके अभ्युदयके दिन समाप्त हो चुके होते हैं, अब उसका उत्तरोत्तर ह्रास ही होनेवाला है—‘प्रतिपच्चन्द्रमिव प्रजाः’ । फिर भी यह नही कहा जा सकता कि जो ह्रासको प्राप्त हो रहा है, अब उसका विकास होगा ही नही । देखते ही हैं कि जिस चन्द्रमाका ह्रास होता है, उसीका पुनः विकास होता है । जिस समुद्रमे भाटा आता है, उसमें पुनः ज्वार आता है । अनेक बार मनुष्यकी रुग्णता और पुनः स्वस्थता होती है। माली हालतमे भी बिगाड, सुधार होता रहता है । पृथ्वी अनेक बार अनुर्वरा हो जाती है, उपज घट जाती है; पुनः उपचारसे उर्वरा बनायी जाती है । मार्क्स तथा लेनिनकी भविष्यवाणी थी कि ‘मजदूरोंद्वारा ही क्रान्ति होगी । किसान सामान्य पूँजीवादी भले ही संख्यामें अधिक हो और गरीब भी हों; तब भी वे कभी वर्धमान, विकासमान नहीं हैं, अतः उनकी कभी उन्नति होनेवाली नहीं।’ पर चीन और भारतमें ठीक इसके विपरीत हुआ, यहाँ किसानों, मध्यवर्गों, सामान्य उत्पादन साधनवालों अर्थात् साधारण पूँजीपतियो- द्वारा ही क्रान्ति हुई । इतना ही नहीं, भारतमें तो शान्तिपूर्ण अहिंसात्मक आन्दोलनद्वारा पर्याप्त सफलता मिली है, जिसकी मार्क्सवादमे कल्पना भी नही हो सकती । परिवर्तनसम्बन्धी एजिल्सकी बात अध्यात्मवादीके लिये कोई नवीन वस्तु नहीं है । हाँ, आत्मा कूटस्थ होनेसे अपरिवर्तनशील है, वह सब परिवर्तनोका द्रष्टा