मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिसे पूरे मुहूर्तका पता लगाना अभीष्ट है, उसे घडी लेकर त्राटक लगाकर बैठना ही पड़ेगा । जिसे गर्दभके बालोंकी जिज्ञासा है, उसे गिननेका श्रम करना ही पड़ेगा । जैसे अमुक वस्तुका अमुक गुण है या नहीं, इस प्रश्नका उत्तर हाँ या नहींमें ही देना उचित है, वैसे ही परिवर्तनकी हालतमें भी निश्चित उत्तर दिया ही जा सकता है । सांख्यीय सत्कार्यवादके अनुसार छोटे-से वटबीजके अंदर वटवृक्षकी सत्ता है तभी उसका प्रादुर्भाव होता है । फिर भी जबतक उसका आविर्भाव नहीं है तबतक अभावका व्यवहार चलता है ओर जिस कालमें अङ्कुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पल्लवादिकी अवस्था है उस कालमें स्पष्टतया उसी रूपमें उसका भाव, अन्य रूपमें अभाव कहनेमें कोई अडचन नहीं हो सकती । युवककी ठोढ़ीमें बालोंकी जो अवस्था है, उसी रूपमें उसका भाव अन्यरूपमें अभाव कहनेमें भी कोई अडचन नहीं । उसी भूतलपर देश-कालभेदसे, सम्बन्ध तथा रूपभेदसे, वटके भाव-अभावका व्यवहार होता ही है । वस्तुओं तथा उनके गुणके सम्बन्धमें यही स्पष्ट मत है । 'हाँ' नहीं है, 'नहीं' हाँ है, यह मत कभी भी स्पष्ट मत नहीं कहा जा सकता । कारणमें कार्यका अस्तित्व रहता है; इसलिये बीजमे भी अङ्कुर है । युवक क्या, शिशुकी भी ठोढीमे वालोका अस्तित्व है । जबतक आविर्भाव नहीं है तबतक अङ्कुरके तुल्य बालोका भी अभाव है । जितना प्रादुर्भाव है उतनेका भाव, जितनेका नहीं उतनेका अभाव है, इससे अधिक स्पष्टता क्या हो सकती है । एफीसियसका प्राचीन दार्शनिक कहता है कि 'सभी चीजे परिवर्तनशील हैं, सभी परिवर्तित हो रही हैं । जिन संयोगोंको हम वस्तु नाम देते हैं, वे सदा ही परिवर्तनकी स्थितिमें हैं।' जबतक ऐसे संयोगोंका अनुपात कायम रहता है, उनका विचार हम हाँ-हाँ ओर नहीं-नहींके संकेतसे कर सकतें हैं । लेकिन जिस समय उनमें ऐसा परिवर्तन होता है कि वह पहिला अनुपात नहीं रहता, तब उनका विचार विरोधके तर्कसे ही हो सकता है । हमें हाँ और ना दोनोंमें उत्तर देना पड़ेगा । वह है भी और नहीं भी है । 'जैसे स्थिरता गतिका एक विशिष्ट प्रकार है उसी तरह साधारण तर्कशास्त्र द्वन्द्वमान तर्कका एक विशेष प्रकार है।' प्लेटोके शिष्य क्रेटिलसके विषयमें कहा जाता है कि जब हेराक्लिट्सने कहा कि एक ही नदीमे हम दो बार प्रवेश नहीं कर सकते, तब उसने कहा कि एक बार भी हम उसमें प्रवेश नहीं कर सकते, क्योंकि प्रवेश करते-करते उसमें परिवर्तन होता रहता है । वह एक दूसरी नदी हो जाती है । ऐसी रायमें होनेकी क्रियाको उसके अस्तित्वसे अधिक महत्त्व दिया जाता है । यह द्वन्द्वमानका अपव्यवहार है । हेगेलका कहना है कि 'कुछ' सर्वप्रथम 'प्रतिषेधका प्रतिषेध' है ।