मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वन्द्वमान और भौतिकवादका आपसमें कोई विरोध नहीं है । वास्तवमें द्वन्द्वमानकी बुनियाद ही भौतिकवाद है । यदि प्रकृतिकी भौतिकवादी धारणाका अन्त हो जाय तो साथ ही द्वन्द्वमानका भी अन्त हो जायगा । हीगेलकी प्रथा मे 'द्वन्द्वमान और अतिभौतिकवाद दोनो समानार्थसूचक हैं । मार्क्सय दर्शनमे द्वन्द्वमान प्राकृतिक सिद्धान्तके सहारे खड़ा है । हीगेलके अनुसार धारणाओमें जो विरोध है उनके आविष्कार और हलसे ही विचारधारा आगे बढती है । भौतिकवादी सिद्धान्तके अनुसार धारणाओमें अवस्थित विरोध उन विरोधोके प्रतिबिम्बमात्र हैं जो दृश्यगत जगत् वर्तमान हैं और जिनका मूल कारण प्रकृतिका अन्तर्विरोध यानी उसकी गति है ।' एफेशियसके प्राचीन दार्शनिककी दृष्टि भी इस सम्बन्धमें भ्रमात्मक ही है । सूक्ष्मकालभेदके अनुसार सूक्ष्मपरिवर्तित अवस्थाओका भी सुस्पष्ट अस्ति या नास्तिरूपसे निरूपण किया जा सकता है । अनिश्चित अवस्था सदा ही अज्ञानकी अवस्था है, प्राकृतिक एवं यान्त्रिक प्रत्यक्ष साधनो, अनुमानो या आर्षविज्ञानों अथवा अपौरुषेय आगमोके आधारपर उस अज्ञानको मिटाना ही उचित है । उभयतः आकर्षणकी स्थिरता एक गतिका प्रकार भले मान्य हो, परतु सब गतियो एवं गतिमानोकी अधिष्ठानभूत आत्मसत्ता गतिका प्रकारविशेष नहीं है । एकत्व-भ्रमके मूल कारण सादृश्य-ज्ञानके लिये 'तेनेदं सदृशम्' 'के ते नेदं सदृशम्' जाननेके लिये अनेककालावस्थायी द्रष्टाको स्वतः स्थिर मानना पड़ता है । इसीलिये सांख्योने सब पदार्थोंको क्षणपरिणामी मानते हुए भी चित्-शक्तिको कूटस्थ माना है— क्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्तेः । व्यवहारमे गतिमान, पशुपक्ष्यादि जंगम तथा स्थावर भूमि पर्वतादि स्वतन्तरूपसे मान्य है । अतः गतिविशेष ही स्थिरता है, यह दृष्टान्त ही असङ्गत है । इस तरह सत्को असत्, असत्को सत् कहनेवाला द्वन्द्वमान कोई तर्क ही नही है । नदीके प्रथम प्रवेगकालमें ही नहीं, किंतु प्रतिक्षण भिन्नता क्रैटिलससे बहुत पहले भारतीय दर्शनोंने बता रखा है— नित्यदा ह्यङ्ग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च । कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दृश्यते ॥ यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पतेः । तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादयः कृताः ॥ सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् । सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ( श्रीमद्भा० ११ । २२ । ४२—४४ )