मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१० मार्क्सवाद और रामराज्य काल वड़ा सूक्ष्म होता है, अतः किसी स्थलपर समकालमे गतिशील पदार्थका अस्तित्व, नास्तित्व नही कहा जा सकता । उसी वस्तुको रूपान्तरसे भाव एव रूपान्तरसे अभाव कहना सम्भव है । परंतु उसी रूपसे भाव अभाव—दोनो कोटि-कोटि प्रयत्नोसे भी सम्भव नहीं हैं, तीव्रगामी बाण या तलवारसे समवेत सहस्र कमलपत्रका छेदन समकालमें ही प्रतीत होता है । पापड़ खाते समय समकालमें ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धकी प्रतीति समकालमे मालूम पडती है, फिर भी सर्वत्र क्रमिकता ही है। हाँ, क्रम इतना सूक्ष्म है कि परिलक्षित नहीं होता, फिर भी उसका अनुमान तो होता ही है । इस तरह अति तीव्रगतिमे, अतिसूक्ष्मकालमें अस्तित्व-नास्तित्वका क्रम भी बदल जाता है । इसीलिये अस्तित्व- नास्तित्व एकत्र स्थलमे क्रमिक ही रहता है; समकालिक नही । सामान्य गतिमान् पदार्थका जब विभिन्न स्थानीय अस्तित्व, नास्तित्व, भिन्नकालिक है, तो इसी तरह तीव्र गतिमान् पदार्थोंका भी एकत्र अस्तित्व, नास्तित्व भिन्नकालिक ही मानना उचित है । इस तरह उसे अकाट्य तर्क समझना भ्रम ही है । युवेरवेग हो या कोई और हो, यौक्तिक विचारमे जिसका पक्ष उचित हो ग्रहण करना चाहिये । अयुक्तियुक्त किसीका भी मत त्याज्य होना चाहिये । किसी भी नियमसे सत् असत्, असत् सत् नही हो सकता । द्वन्द्वमानकी बाजीगरी भी इस सम्बन्धमे व्यर्थ ही है । सिर्फ घटका स्वेन रूपेण अस्तित्व है, अन्यरूपेण नास्तित्व है । इसके सिवा अस्ति, नास्तिकी एकत्र अवस्थिति सर्वथा असम्भव है । गतिशील परमाणुओके संयोगसे दृश्य वस्तुओका निर्माण हो अथवा प्रतिक्षण परिणामी प्रकृति-तत्त्वका परिणामस्वरूप दृश्य वस्तु हो उसकी अस्थिरता निश्चित है । फिर भी वस्तुके भाव-अभावमे संदेह नही होना चाहिये । संदेह होता है स्थिरता एवं अस्थिरतामे । नदीप्रवाह एव दीपशिखामें स्थूलदृष्टिसे स्थिरता एव एकता प्रतीत होती है, किंतु वस्तुतः उनमे स्थिरता-एकता सादृश्यमूलक भ्रम ही है । गगन, पर्वत, समुद्र, नक्षत्रादि—सभीमे स्थिरता, एकता, प्रत्यभिज्ञा इसी प्रकार सादृश्यमूलक भ्रम ही है । फिर भी अविचारित रमणीय एकता आदिका व्यवहार चलता ही है । सदृश परिणाम जबतक चलता है, तबतक एकता विसदृश परिणाम होनेसे ही भिन्नता, अनेकताकी प्रतीति होने लगती है । सदृश-विसदृश किसी भी परिणाममे अस्तित्व तो रहता ही है, आविर्भाव, तिरोभावके आधारपर होने- वाले भाव-अभावके व्यवहारमे भी क्रम अनिवार्य है । समकालमे, समदेशमे, समसम्बन्धसे, समरूपसे एक ही वस्तुका भाव या अभाव नही रह सकता । यह पर्वतवत् अकम्प्य विरोध है, यह कहा जा चुका है । प्रमाणकी दृष्टिसे सब स्पष्ट ही होता है, अस्पष्ट नही । सिरके अधिकांश बालोंके उड़ जानेपर भी हम यही कह सकते हैं कि 'वह खल्वाट हो रहा है ।'